





कालिदास ने नाभि दर्शना को प्रत्यक्ष प्रकट कर दिखा दिया, वह रूप, सौन्दर्य और यौवन में छलकते हुये जाम की तरह थी, उसका सारा शरीर गौर वर्ण और चन्द्रमा की चांदनी में नहाया हुआ सा लग रहा था, पुष्प से भी कोमल और नाजुक नाभि दर्शना को कालिदास के कक्ष में थिरकते देख कर राजा भोज अत्यधिक संयमित होते हुये भी बेसुध से हो गये, उनकी आंखों के सामने हर क्षण नाभि दर्शना ही दिखाई देती रही।
नाभि दर्शना को सिद्ध कर ही कालीदास अपने जीवन में अटूट धन संपदा के स्वामी बने, वे नित्य नाभि दर्शना को साधना के बल पर प्रगट करते और उसके साथ उसी प्रकार से हास्य विनोद करते, मनोरंजन करते, जैसे कि कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को प्राप्त करने के बाद करता है। और नाभि दर्शना अत्यधिक प्रसन्न होकर बिना मांगे ही कालीदास को सोने के आभूषणों, स्वर्णमुद्राओं और विविध वस्त्रें और कीमती उपहारों का उस कक्ष में ढे़र लगा देती थी।
उसके स्पर्श और साहचर्य से कालीदास का शरीर यौवन से परिपूर्ण हो गया था, उनके चेहरे पर एक अजीब सा आकर्षण और सौन्दर्य उमड़ आया था पूरा शरीर रोग रहित हो कर थिरकने लगा था और काया कल्प होकर कालीदास जीवन भर चिर यौवनमय बने रहे। तन्मय होकर उसका संगीत सुनते रहते। अप्सरा के साहचर्य से उनकी काव्य प्रतिभा फूट पड़ी और उन्होंने मेघदूत जैसे अद्वितीय काव्य की रचना की। इस मेघदूत में जिस सौन्दर्यमयी नायिका का वर्णन है, वह नाभि दर्शना अप्सरा ही है।
108 अप्सराओं में से नाभि दर्शना अप्सरा श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण है, वह अद्वितीय सौन्दर्यमयी होने के साथ साथ दयालु है, और वह स्वयं बार बार पृथ्वी तल पर विचरण करना चाहती है, इसीलिये अन्य अप्सराओं की अपेक्षा नाभि दर्शना अप्सरा सिद्ध करना ज्यादा सरल है।
नाभि दर्शना, षोडश वर्षीय अत्यन्त सुकुमार और सौन्दर्य की स्रामाज्ञी है। उसका सारा शरीर कमल से भी ज्यादा कोमल, पुष्प से भी ज्यादा नाजुक और गुलाब से भी ज्यादा सुन्दर है, उसके सारे शरीर से खुशबू प्रवाहित होती है, उसकी उपस्थिति का भान कराती रहती है, अप्सरा की काली और लम्बी आंखें, लहराते हुये केश और चन्द्रमा की तरह ज्योतिस्नित चेहरा, और सुन्दरता से लिपटा हुआ पूरा शरीर एक अजीब सी मादकता बिखेर देता है, वह साधक को हीरे, मोती, स्वर्ण मुद्राओं एवं उपहारों से सिक्त कर देती है। जीवन भर उस पुरूष के अनुकूल रहती, वह पूर्ण रूप से रोगों से मुक्त होकर चिर यौवनमय बन जाता है, शरीर का काया कल्प हो जाता है, और पौरूष की दृष्टि से वह अत्यन्त प्रभावशाली बन जाता है।
अप्सरा साधना के लिये ‘ज्येष्ठा शक्ति दिवस’ अत्यन्त महत्वपूर्ण है, जो कि इस वर्ष 22 मई को श्रेष्ठतम योग बन रहा है, यह एक दिन की साधना है, और साधक इस साधना को सिद्ध कर सकता है। या किसी भी रविवार की रात्रि को यह साधना सिद्ध की जा सकती है। कभी कभी पहली बार में ही सफलता नहीं भी मिल पाती, तो साधक को चाहिये, दूसरी या तीसरी बार सम्पन्न करें, परन्तु अगले किसी भी रविवार की रात्रि को ही यह साधना सम्पन्न करें।
यह साधना रात्रि को ही सम्पन्न की जा सकती है, और साधक अपने घर में रात्रि को सुन्दर, सुसज्जित वस्त्र पहिने, वह उत्तर दिशा की ओर मुह कर आसन पर बैठे। अपने वस्त्रें पर सुगन्धित इत्र का छिड़काव करें और दो सुन्दर गुलाब की मालायें ला कर अलग पात्र में रख दें, यदि गुलाब की माला न मिले तो किसी भी प्रकार के पुष्पों की माला रख सकता है।
फिर सामने एक रेशमी वस्त्र पर अद्वितीय ‘नाभि दर्शना यंत्र’ को स्थापित कर केसर से तिलक करें और सामने सुगन्धित अगरबत्ती एवं घृत का दीपक लगावे। इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि मैं अमुक गोत्र अमुक पिता का पुत्र अमुक नाम का साधक नाभि दर्शना अप्सरा को प्रेमिका रूप में सिद्ध करना चाहता हूं, जिससे कि वह जीवन भर मेरे वश में रहे, और प्रेमिका की तरह सुख आनन्द एवं ऐश्वर्य प्रदान करें।
इसके बाद ‘अप्सरा माला’ से 21 माला मंत्र जप उसी रात्रि को सम्पन्न हो जाना चाहिये। अगर बीच में घुंघुरूओं की आवाज आये या किसी का स्पर्श अनुभव हो, तो साधक विचलित न हो और अपना ध्यान न हटावें, 21 माला मंत्र जप एकाग्र चित्त होकर करें, इस साधना में जितनी ही ज्यादा एकाग्रता होगी, उतनी ही ज्यादा सफलता मिलेगी। 21वीं माला पूरी होने से पूर्व साधक घुटना सटाकर बैठ जाय, मंत्र जप पूरा होने के बाद साधक अप्सरा माला को स्वयं धारण कर लें, और सामने रखी हुई अन्य माला उसके गले में पहिना दें, ऐसा करने पर नाभि दर्शना अप्सरा सामने रखी हुई दूसरी माला उठा कर साधक के गले में डाल देती है।
फिर साधक अप्सरा से वचन ले कि मैं जब भी अप्सरा माला से मंत्र जप करूंगा, तब तुम्हें मेरे सामने सशरीर उपस्थित होना है और मैं जो चाहूं वह मुझे प्राप्त होना चाहिये, पूरे जीवन भर मेरी आज्ञा का उल्लंघन न हो। तब नाभि दर्शना अप्सरा साधक के हाथ पर अपना हाथ रखकर वचन देती है, कि मैं जीवन भर आपकी इच्छानुसार कार्य करती रहूंगी। साधक साधना से सम्बन्धित घटना को केवल अपने गुरू के अलावा और किसी के सामने स्पष्ट न करे।
साधना सम्पन्न होने पर नाभिदर्शना अप्सरा महायंत्र को अपने गोपनीय स्थान पर रखें और जो गले में अप्सरा माला पहिनी हुई है, वह भी घर में गुप्त स्थान पर रख दें। जब साधक को भविष्य में अप्सरा को बुलाने की इच्छा हो तो महायंत्र के सामने अप्सरा माला से 21 माला मंत्र जप कर लें, अभ्यास होने के बाद तो अप्सरा प्रत्यक्ष प्रगट हो जाती है। यह साधना स्त्री-पुरूष कोई भी संपन्न कर सकता है, विश्वास एवं श्रद्धा के साथ इस साधना को सम्पन्न करें।
जीवन में हर दृष्टि से मनोकामना की पूर्ति हो सके, जिससे जीवन में रस, आनन्द, आकर्षण, सम्मोहन, ओज तथा वाणी में मधुरता का संचार होकर कार्य में सफ़लता की प्राप्ति हो सके,यह मात्र नाभि दर्शना अप्सरा शक्ति दीक्षा के माध्यम से पूर्णरूपेण सम्भव हो पाता है। तभी साधक जीवन में नूतनता और जोश से पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
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