





मानव आज अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी संस्था में कार्यरत हो या व्यवसाय कर रहा हो अथवा स्वतंत्र क्षेत्र में कार्य कर रहा हो, हर क्षेत्र में कठिनाई, बाधायें, शत्रु बाधा एवं प्रतिस्पर्धा आदि चुनौतियां हर पल व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिये तत्पर रहती हैं। इन सब कारणों की वजह से व्यक्ति हर पल अपने सम्मान की रक्षा के लिये चिन्तित रहता ही है। इसके समाधान एवं अपने क्षेत्र में निष्कंटक प्रगति के लिये प्रबल दैवीय संरक्षण प्राप्त होना, आज के इस भौतिकवादी वातावरण में नितांत आवश्यक हो गया है।
दैवीय संरक्षण कैसे प्राप्त हो, इसके लिये साधक को थोड़ा सा प्रयास करने की एवं उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इन दोंनों की समन्वित क्रिया से साधक दैवीय कृपा प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। वैसे भी प्रत्येक देवी, देवता मनुष्य को हर पल, हर क्षण, रक्षा-सुरक्षा प्रदान करने के लिये तत्पर रहते हैं, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि हम उनसे सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रबल भावना एवं पात्रता रखें। जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की बात हो, उसमें महाविद्या साधना का महत्व सर्वोपरि है। अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के वरदान स्वरूप उनकी शक्ति स्वरूप से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिये उचित मुहूर्त पर सम्पन्न कर सफल व्यक्ति बनकर अपने जीवन में निरन्तर प्राप्त हो रही बाधाओं को शमन कर उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।
दस महाविद्याओं में भगवती धूमावती दीक्षा और साधना स्थायी सम्पत्ति की प्राप्ति, प्रचण्ड शत्रुनाश, विपत्ति निवारण, संतान की रक्षा के लिये महत्वपूर्ण है। वास्तव में इस दीक्षा को प्राप्त करना जीवन की अद्वितीयता है। इस दीक्षा और साधना को सम्पन्न करने के उपरान्त व्यक्ति भौतिक समृद्धि के साथ-साथ जीवन में पूर्णता प्राप्त कर लेता है। शत्रु बाधा व अन्य कोई भी बाधा उसके सम्मुख टिक नहीं पाते है।
यह युग केवल ऊपरी तौर पर ही आधुनिक तौर तरीके अपनाये हैं अन्यथा आज के युग में तो तांत्रिक प्रयोग, मारण या उच्चाटन प्रयोग पहले की अपेक्षा कई गुना अधिक बढ़ चुके हैं।
धूमावती सिद्ध करने से साधक पृथ्वी लोक के अलावा अन्य लोकों में रहने वाले प्राणियों से संबंध स्थापित कर सकता है, साथ ही साथ वह किसी भी मनोवांछित आत्मा को वायुमण्डल से बुला कर अपने सामने उपस्थित कर उससे मनोवांछित जानकारी प्राप्त कर सकता है, इन आत्माओं में उच्चकोटि के वैज्ञानिक, संगीतज्ञ, विद्वान और कलाकार भी शामिल है।
भूत-प्रेत साधक के अधीन हो जाते है इस संसार में भूत-प्रेतों का अस्तित्व है, और जिस प्रकार पृथ्वी तल पर मानव जाति विचरण करती रहती है, ठीक उसी प्रकार हमारे चारों और भूत-प्रेत भी निरन्तर विचरण करते रहते हैं। भूत-प्रेत साधक के लिये ज्यादा विश्वास पात्र अनुकूल एवं सुखदायक है। जीवन में आदमी तो धोखा दे सकता है, पड़ोसी तो विश्वासघात कर सकता है, परन्तु ये भूत-प्रेत अत्यन्त ही सरल, निष्कपट और मददगार होते है। ये कभी भी जीवन में साधक को न तो धोखा देते है, और न विश्वासघात ही करते है। भूत-प्रेत छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कार्य करने की क्षमता रखते है। सफाई करना, पानी भरना, गायों का दूध दुहना, बहुत लोगों के लिये भोजन पकाना और रात को पूरे मकान की देख भाल करना आदि सब कार्य का जिम्मा इन भूत-प्रेतों को सौंपा जा सकता है व किसी काम में कोई न्यूनता नहीं रखते।
किसी प्रकार की याचना से आय का कोई साधन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती। साधक को धन की कोई कमी नहीं रहती। इन भूत-प्रेतों से सैकड़ों लोगों को भोजन कराया जा सकता है साथ ही कम्बल, वस्त्र और आभूषण भी प्रदान कर सकता है। इतना करने के बाद भी धन की कोई कमी नहीं रहेगी, बजाय यह चिन्ता रहेगी कि जो बेतहासा धन निरन्तर भूत-प्रेतों के माध्यम से मिलता है उसको व्यय कहां और कैसे किया जाय।
धूमावती दीक्षा और साधना के माध्यम से साधक ज्यादा अच्छे तरीके से इस कार्य को सम्पन्न कर सकते है, आज पश्चिम में धूमावती साधना पर 75 से ज्यादा अंग्रेजी में लिखी हुई पुस्तकें बाजार में उपलब्ध है, और वहां के वैज्ञानिक, वहां के लोग और वहां के बुद्धिजीवी इस साधना को सिद्ध करने के लिये बेताब है।
जिस साधक ने जीवन में भले ही अन्य साधनायें, सम्पन्न की हो, भले ही वह उच्चकोटि का योगी और सिद्ध रहा हो, पर उसे अपने जीवन में तब तक पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक कि वह धूमावती को सिद्ध न कर दें।
इसी हेतु पूज्य सद्गुरुदेव ने सिद्धाश्रम दिवस के श्रेष्ठतम सुअवसर पर सिद्धाश्रम में होने वाले कई उत्सवों में से एक महोत्सव ‘दिव्यपात समारोह’ है जो सिर्फ सिद्धाश्रम दिवस पर ही सम्पन्न होता है। इस दिवस पर सिद्धाश्रम शक्तिपात दीक्षा की क्रिया ‘परम पूज्य योगीराज स्वामी सच्चिदानन्द जी’ के द्वारा दिव्यपात सम्पन्न किया जाता है। ऐसे श्रेष्ठतम अवसर पर दीक्षा प्राप्त करने पर जीवन का सौभाग्य और सिद्धि दोनों ही साधाक प्राप्त कर सकता है।
साधाक अपने जीवन में चार पुरूषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कर पूर्णत्व की ओर अग्रसर होने के लिये हर समय तत्पर रहता है किन्तु अर्नगल लोगों द्वारा षड्यंत्र, तंत्र प्रयोग आदि बाधायें शत्रुरूप धारण कर सामने खड़ी होता है। जब तक साधक इस शत्रु को समाप्त नहीं करेगा तब तक जीवन में सुख, शांति, उत्साह, आनन्द ये सब कल्पना सी रह जाती है। सिद्धाश्रम दिवस के चैतन्य अवसर पर सर्वशत्रुहन्ता धूम्र धूम्र क्रिया दीक्षा प्रदान की जा रही हैं, जिससे साधक जीवन में बाधा रूपी शत्रुओं को समाप्त कर सुख, शांति, ऐश्वर्य, निर्भीक जीवन की प्राप्ति कर पूर्णत्व की ओर अग्रसर होता ही है। अक्षय तृतीया व वैशाख पूर्णिमा पर सिद्ध किया हुआ धूमावती लॉकेट व साधना सामग्री दीक्षा के साथ उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी। जिससे साधक को जीवन में तंत्र प्रभाव से पूर्ण रक्षा हो सकेगी।
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