





यह श्लोक अपने आप में कई सारे पहलुओं को स्पष्ट करता है। जिसका अर्थ है- ‘सिद्ध लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी, जय लक्ष्मी, सरस्वती अर्थात् विद्या लक्ष्मी, श्री लक्ष्मी, वर लक्ष्मी और प्रसन्न लक्ष्मी मुझ पर सदैव प्रसन्न रहें।’
देवी कमला, महालक्ष्मी का ही तांत्रिक स्वरूप हैं। वे दस महाविद्याओं में से दसवीं महाविद्या हैं। साधनात्मक दुनिया में एक ही देवी-देवता के कई स्वरूप होते हैं तथा इनका उद्देश्य भी अलग-अलग होता है। देवी महालक्ष्मी भौतिक सुख और धन, शक्ति और धर्म की अधिष्ठात्री हैं। इनका कार्य समृद्धि देना तथा जीवन की रक्षा और आध्यात्मिक संतुलन प्रदान करना है।
कमला देवी चार भुजाओं वाली हैं, जो कमल पर विराजमान रहती हैं और धन-धान्य प्रदान करती हैं। तंत्र शास्त्रों में लक्ष्मी की पूजा ‘कमला’ स्वरूप में की जाती है। देवी कमला महालक्ष्मी स्वरूपा जगत की आधार हैं, जिनके बिना सृष्टि के समस्त कार्य अपूर्ण रह जाते हैं। कमला आद्या शक्ति हैं, जिनकी कृपा दृष्टि से ही ब्रह्मा एवं अन्य देवता शक्ति प्राप्त करते हैं। जो साधक कमला संबंधित साधना-दीक्षा ग्रहण करता है, उसकी कभी भी दुर्गति नहीं हो सकती। ऐसा साधक निश्चित ही पूर्ण रुप से धन-धान्य प्राप्त कर अनन्त, अलौकिक वैभव, सम्मान, कीर्ति प्राप्त करता है।
भौतिक जीवन का प्रथम क्रम धर्म व अर्थ से प्रारम्भ होता है जिसकी मूलभूत आवश्यकता सुस्थितियों को धारण करना है। सांसारिक जीवन में अर्थ एक ऐसा तथ्य है, जिसकी आवश्यकता पूरे जीवन भर बनी रहती है। धन के माध्यम से ही जीवन की सर्वकामनायें सम्पन्न हो सकती हैं। अगर गहराई से देखें तो धन का सबसे बड़ा महत्व स्वतंत्रता से है। धन व्यक्ति को निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। धन के अभाव के कारण ही मनुष्य कभी-कभी झुकने को विवश हो जाता है। पर्याप्त धन व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है और उसे समाज में एक गरिमामय स्थान दिलाने में भी सहायता करता है।
धन अभाव से ही मनुष्य के जीवन में विषम परिस्थितियों का उदय होता है। विषम परिस्थितियों में व्यक्ति हताश व निराश होकर चिन्तन करता है कि वह कहाँ जाये, क्या करे? तब उसके मन में हीन भावना आने लगती है और वह कुण्ठित होकर आत्महत्या तक के बारे में विचारने लगता है। परन्तु क्या यह सही कदम है? कदापि नहीं! क्योंकि यदि मानव को ईश्वर ने जन्म दिया है, तो उसकी समस्या निवारण के लिए उपाय भी बनाया है। इसके लिए एक सुदृढ़ मार्ग यह है कि योग्य सद्गुरु के निर्देशन में उचित साधना-दीक्षा सम्पन्न की जाए।
मनुष्य के जीवन में आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त करना भी अपने आप में पूर्ण तपस्या है। साधना-दीक्षा ग्रहण करने का मूल भी यही है, यदि कोई हल्का सा व्यापार करके ही सफल हो जाता तो अधिकांश व्यक्ति सम्पन्न होते। यद्यपि धनोपार्जन के मूल में परिश्रम, मेहनत एवं पुरुषार्थ है, पर वह अत्यन्त कठोर है। साथ ही सही दिशा में किये गये परिश्रम से ही व्यक्ति सफल हो पाता है।
महालक्ष्मी दीक्षा के माध्यम से गुरु शिष्य के पूरे शरीर में लक्ष्मी का आवह्न कर उनकी स्थापना कर देता है। धन-धान्य, कीर्ति, आयु, वैभव, पुत्र-पौत्र, आरोग्य, कार्य-व्यापार लक्ष्मी आदि सैकड़ों प्रकार की लक्ष्मी हैं। इन सभी प्रकार की लक्ष्मीयों को शरीर में स्थापित करने से ही इस विशिष्ट दीक्षा का क्रम पूर्ण हो पाता है।
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