





यह साधना अपने-आप में श्रेष्ठ और अद्वितीय है, यह एक तीक्ष्ण प्रभावकारी साधना जो कई जन्म के समस्त पापों से मुक्त कर जीवन को प्रभावशाली और सर्वश्रेष्ठ बना देती है। जब शक्ति तत्व जागृत होता है तब पापों का क्षय होता ही है। पापों का क्षय होने से जीवन में एक शुभ्रता आती है और व्यक्ति अपने जीवन में तीव्र गति से कार्य करने में समर्थ हो जाता है।
जीवन वह नहीं है, जो जन्म से लगाकर मृत्यु तक होता है। हमने काल खण्ड को देखा नहीं, और इस सम्बन्ध में कभी चिन्तन नहीं किया। समय तो अजस्र प्रवाह है, जिसके न हमें ओर का पता है, और न छोर का। इस बीच हम कई बार जन्म लेते हैं और कई बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यह हमारी अज्ञानता है, कि हमने जीवन का आरंभ उस दिन से मान लिया, जिस दिन हमने जन्म लिया और जीवन को उतना ही मान लिया है जिस दिन हमारी मृत्यु होती है। सामाजिक दृष्टि से तो निश्चय ही यही जीवन है, पर शास्त्रीय दृष्टि से यह जीवन का मात्र एक भाग है। इससे पहले भी कई बार जन्म लिया होगा। और हमारी मृत्यु हुई होगी। यह तो प्रकृति का विधान है।
प्रभु ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर दी है, कि हमें अपने बाद जीवन का स्मरण नहीं रहता और ऐसा इसलिये किया गया है, जिससे पिछले जीवन के मोह, हिंसा, वैरी आदि से वर्तमान जीवन ज्यादा अशांत न हो। आप कल्पना करें, कि यदि व्यक्ति को पिछला जीवन याद हो और यह भी स्मरण हो, कि अमुक ग्राम या शहर में अमुक व्यक्ति ने उसकी हत्या कर दी थी, तो वह क्रोध और बदले की भावना में जलता रहेगा और तब तक वह शांति से नहीं बैठ सकेगा जब तक वह अपनी मौत का बदला न ले ले।
पूर्व जन्म को नकारा नहीं जा सकता है, पूर्व जन्म में किये गये कर्मों की श्रृंखला इस जीवन में भी प्रभावी रहती है। पूर्व जन्मों में जाने-अनजाने में हुये किसी पाप-शाप का भोग तो मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। तथा बिना इन शापों का शमन हुये व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में सफल भी नहीं हो सकता, चाहे वह आध्यात्म जीवन हो या भौतिक जीवन हो। हमारा जीवन स्वतन्त्र नहीं है, अपितु पूर्व जीवन से पूर्णतः जुड़ा हुआ है, पिछले जीवन के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये ही इस जीवन का सृजन हुआ है। हम इसमें तब तक शान्ति प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक हम अपने पिछले जीवन मे किये गये कार्यों को देख न लें तब तक अवलोकन नहीं होता और इस जीवन को समझा भी नहीं सकते।
जन्मों की ये श्रृंखला और कर्मफल का रहस्य अत्यन्त पेचीदा हैं। इन्हीं के संयोग से व्यक्ति का अगला जीवन निर्धारित होता है। जगत में शिशु जब मां के गर्भ से उत्पन्न होता है, तो वह अकेले ही नहीं उत्पन्न होता है, उसके साथ होता है, हजारों मन का वह बोझ, जो कि उसके पूर्व जन्मों के कर्म का पुंजीभूत स्वरूप है। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है, वैसे -वैसे उसके संचित कर्म उसके जीवन पर प्रभाव दिखाते हैं।
सत्य तो यह है, कि कर्मफल की एक बहुत बड़ी राशि पूर्व जन्मों से सम्बन्ध होती है। इस जन्म में आने वाली असफलताओं, परेशानियों का, बाधाओं का, रोग-शोक, निर्धनता एवं अपमान का कारण पूर्व जन्म में किये हुये पाप ही होते हैं अथवा किसी आत्मा का शाप होता है, जिसका प्रायश्चित इस जीवन में हमें करना पड़ता है।
जाने-अनजाने पूर्व जन्मों में हमसे किसी जीव को अथवा किसी मनुष्य को कष्ट पहुंचता है, अथवा उसके साथ दुर्व्यवहार होता है, तो उसकी आत्मा का वह शाप निरन्तर हमारा पीछा करता ही रहता है। और समय आने पर वह पाप राशि, वह अभिशाप हमारे मार्ग में एक दैत्य की तरह आ खड़ा होता है, और हमें विवश हो जाना पड़ता है, विधि के विधान के आगे।
सभी प्रकार के पाप-दोष निवारण के लिये गायत्री मंत्र को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जिसके निरन्तर जप से जन्मों के पाप-दोष निवारण होकर यह और आने वाला जीवन सुमंग और सुखद निर्मित होता है। परन्तु भौतिकतावादी समाज में निरन्तर जप करना किसी भी साधक के लिये असंभव प्रतीत होता है।
आध्यात्म की देवी भगवती छिन्नमस्ता जो सभी कष्टों को हर कर साधक को श्रेष्ठता प्रदान करती हैं। दस महाविद्या में भगवती छिन्नमस्ता ही ऐसी देवी जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों को अपने में समेटे हुयी हैं। इनकी साधना साधक एक भौतिक जीवन में सफलता प्राप्त करने के साथ ही साथ आध्यात्मिक पथ पर भी श्रेष्ठता अर्जित करने में सफल होता है।
इस हेतु प्रथम बार प्रस्तुत गायत्री मन्त्र से सम्पुटित पापमोचनी छिन्नमस्ता साधना साधक के जीवन को नवीन आयाम और पूर्ण सफल जीवन प्रदान करने में समर्थ है।
साधक को पाप मोचनी छिन्नमस्ता माला, पाप दोष शमन गुटिका और पापाकुंशा यंत्र ये सामग्री पहले से ही प्राप्त कर लेनी चाहिये।
साधक पापमोचनी सिद्धि दिवस या किसी भी गुरूवार को इस साधना को सम्पन्न कर सकता है अथवा गुप्त नवरात्रि में किसी भी दिवस में सम्पन्न किया जा सकता है। यह साधना सायं कालीन है। साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर पीली धोती धारण कर, ऊपर गुरू चादर ओढ़ कर पीले आसन पर पश्चिम की ओर मुख कर बैठ जाये। अपने सामने एक लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र विछाकर उस पर किसी पवित्र पात्र में यंत्र को स्थापित करें। इसके पश्चात् यंत्र को जल से स्नान कर कुंकुम का तिलक करें। गुटिका को भी यंत्र के सामने स्थापित कर दें और उसका भी कुंकुम, अक्षत, पुष्प आदि से पूजन करें। फिर धूप और दीप दिखाकर यंत्र और गुटिका का पूजन करें।
इसके पश्चात साधक आसन पर खड़े होकर ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं का क्रमशः पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण चारों दिशाओं की ओर मुख करके माला से एक-एक माला मंत्र जप सम्पन्न करें।
इसके बाद पहले की तरह पश्चिम की ओर मुख करके आसन पर बैठकर मूल मंत्र की 11 माला मंत्र जप करें-
फिर एक माला गुरू मंत्र जाप करें तथा गुरू से साधना की सफलता का आशीर्वाद प्राप्त करें। जप समाप्ति के बाद समस्त सामग्री को दूसरे दिन किसी नदी या कुंए में विसर्जित कर दें तथा वापिस घर की ओर लौटते समय मुड़कर नहीं देखे। फिर घर आकर, हाथ-पैर धोकर तीन बार आचमन करें।
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