





लेकिन वास्तव में संसार ने केवल उनको ही सराहा है, जाना है, पूजा है, सम्मान दिया है, जिन्होंने अपने भाग्य का निर्माण स्वयं किया हो तथा विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में जूझते हुये भी अपने लक्ष्य का ध्यान रखा और उसकी ओर बढ़ते हुये निरन्तर प्रयासरत रहें।
व्यक्ति के जीवन में समस्यायें मुख्यतः सांसारिक ही होती हैं। ये समस्यायें उसे इस संसार में अन्य व्यक्तियों द्वारा उत्पन्न की गयी परिस्थितियों के फलस्वरूप प्राप्त होती हैं। परिस्थितियों को अपने अनुरूप ढ़ालना ही व्यक्ति की विशेषता कही जाती है और वही व्यक्ति पूर्ण पुरूष बन सकता है, जिसके जीवन में निरन्तर साहस, बल, बुद्धि, पराक्रम, शक्ति का उद्वेग संचारित होता है। वह व्यक्ति जीवन में निरन्तर कुछ नवीन करने का विचार करता रहे, अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपना मार्ग स्वयं बनाने के लिये निरन्तर प्रयासरत रहे।
संसार में व्यक्ति को जीवन तो जीना ही है और जीवन के साथ बाधायें और कष्ट जुड़ेंगे ही। कुछ बाधायें परिवार द्वारा आरोपित होंगी, जिन्हें जिम्मेदारियां कहा जा सकता है और कुछ बाधायें जिस प्रकार का भी कार्य कर रहें हैं, उसके द्वारा आयेंगी। क्योंकि किसी भी व्यक्ति के लिये जीवन मार्ग पर फूल बिछे नहीं होते। इस पथ पर पुष्प भी हैं, तो कांटे भी हैं, कंकड़ भी हैं, तो समतल धरती भी है, तो फिर किस प्रकार व्यक्ति अपने आपको किन शक्तियों के माध्यम से ऐसा बनें, जिससे कि वह जीवन में पराक्रम शक्ति युक्त हो जाये और निरन्तर विजय प्राप्त करता रहे।
विजय का तात्पर्य है, कि जो भी जीवन में कांटे हैं, जो भी जीवन में कंकड़ है, जो भी जीवन में न्यूनतायें हैं, जो भी जीवन में शत्रु हैं, उन सब से पार होना और उन सबको समाप्त कर देना। यदि जीवन में विजयी बनना है, तो मनुष्य को कुछ ऐसा कार्य करने के लिये निरन्तर प्रेरित होना पड़ेगा। जीवन में मुख्य समस्यायें जिनके कारण व्यक्ति को पराजय प्राप्त होती है, इसके मूल में तीन प्रकार के शत्रु मुख्य हैं।
दैहिक शत्रु अर्थात् शरीर की कृषकायता, शरीर की क्षीण शक्ति, शरीर में रोग, कष्ट।
दूसरा शत्रु है, जो कि आपके कार्य में आपकी आलोचना करते हैं, आपको आगे बढ़ने से रोकते हैं, और आपकी उन्नति का मार्ग अवरूद्ध करते हैं।
तीसरे प्रकार के शत्रु मानसिक शत्रु होते हैं, जो कि आपके विचारों को जड़ कर देते हैं, आपके उत्साह की गति को मंद कर देते हैं, आपकी आन्तरिक शक्ति को क्षीण कर देते हैं, जिसके कारण आपके अपने जीवन में कोई भी कार्य करने का उत्साह ही नहीं बचता हैं।
यदि आपका जीवन मार्ग केवल कण्टकाकीर्ण ही है, और जीवन में शत्रुओं की प्रबलता है, भय ने इस प्रकार से जीवन को घेर लिया है, कि किस प्रकार से जीवन व्यतीत किया जाये, वह उपाय ही नहीं मिलता, तो जीवन में निराशा आती है और निराशा व्यक्ति को उसकी आत्मा से तोड़ने का प्रयास करती है, उसे जीवन की निरर्थकता का अनुभव होने लगता है कि ऐसा जीवन जीने से क्या लाभ है, जिसमें केवल जीवन को भार समझ कर ढ़ोया जाये, कि उसमें और पशु में कोई अन्तर ही ना रह जाये।
यदि व्यक्ति प्राण ऊर्जा से संचारित है, यदि व्यक्ति के जीवन में चेतना है, विशेष संस्कार हैं और एक अजस्त्र शक्ति का भण्डार जागृत है, जो वह व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी परिस्थिति में भी हार नहीं मान सकता, उसे विषम से विषम परिस्थितियों में भी ऐसा ही लगता है, कि मैं इस पराजय की स्थिति को विजय की स्थिति में बदल दूंगा और वह प्राणवान ऊर्जा से संचारित होकर अति तीव्र गति से कार्य करता है, जिससे वह परिस्थितियों को अपना दास बना लेता है और फिर वही व्यक्ति जीवन को अपनी इच्छानुसार जी सकता है।
पुराणों में वर्णित है कि एक युग में पार्वती द्वारा घोर तपस्या कर भगवान शिव से कहा कि मैं जन्म-जन्म से शिव की अर्द्धांगिनी हूं और इस जन्म में भी शिव पत्नी बनना चाहती हूं। भगवान शिव की इच्छा अनुरूप सप्त ऋषियों ने हिमाचल पुत्री पार्वती और शिव का विवाह सम्पन्न कराया तथा शिव पार्वती कैलाश पर्वत पर निवास करने लगे। सांसारिक जगत से दूर शिव और पार्वती प्रेम में रत रहते थे। बहुत काल बीत जाने पर भी जब गर्भ धारण की स्थिति नहीं बनी तो देवताओं में चिंता होने लगी और विचार करने लगे कि किस प्रकार गर्भ की स्थिति बने। देवताओं ने विचार कर यह निश्चय किया कि शिव पार्वती रमण के पश्चात् यदि अग्नि देव उनके समक्ष उपस्थित हो जाते हैं तो श्रेष्ठ स्थिति बन सकती है।
देवताओं की इच्छानुसार अग्निदेव रमण के समय कैलाश पर्वत पहुंचे लेकिन थोड़ा जल्दी पहुंच जाने के कारण भगवान शिव स्खलित हो गये और उनका वीर्य गंगा में गिरा। जिसे पत्तों ने धारण कर लिया, यह स्थिति देखकर ब्रह्मा ने इसके छः भागों को जोड़कर बालक की रचना की और उसे षड़ानन कार्तिकेय नाम दिया। बालक छोटा ही था कि एक दिन माता पार्वती और भगवान शिव गंगा किनारे भ्रमण कर रहे थे तब बालक को देखकर मां पार्वती के स्तनों में मातृत्व जागृत होकर दुग्धधारा बहने लगी और मां पार्वती ने अपने पुत्र को गोद में लेकर दूध पिलाया और उसे बड़ा किया, भगवान शिव को भी अपने त्रिनेत्र से यह ज्ञान हुआ कि यह बालक मेरा ही अंश है, इस पर उन्होंने वरदान दिया कि- बड़ा होकर यह बालक असीम पराक्रम के आधार पर देवताओं का सेनापति बनेगा तथा पूरे संसार में भगवान शिव के प्रथम पुत्र के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। भगवान शिव की शक्ति, तपस्या, पराक्रम, तेजस्विता, दयालुता के साथ माता पार्वती का सौन्दर्य, सौरभ, माधुर्यता कार्तिकेय में प्रकट हुयी।
इसी कारण वैवाहिक स्त्रियां श्रेष्ठ संतान प्राप्ति के लिये कार्तिकेय की साधना करती है तथा पुरूष पूर्ण पौरूषता के साथ-साथ बल, बुद्धि, विजय, वीर्य, पराक्रम के लिये भगवान कार्तिकेय की साधना करते हैं। इस साधना से साधक को देखते ही शत्रु स्वतः भयभीत व निस्तेज हो जाते हैं। इसी कारण पूरे दक्षिण भारत में शिव के साथ मुरूगन कार्तिकेय की विशेष मान्यता है। जो जीवन की सभी बाधाओं पर विजय प्रदान कर निश्चिंतता प्रदान करते हैं।
कार्तिकेय, भगवान शंकर के ज्येष्ठ पुत्र हैं और देवताओं के रक्षक, रक्षा, विजय, संहार, पराक्रम के देव एवं शीघ्र प्रसन्न होने वाले, निश्चित सिद्धि प्रदाता माने जाते हैं, दक्षिण भारत में विशेष मन्दिर तथा तीर्थ स्थान हैं, जहां उन्हें प्रधान देव माना गया है, भगवान सुब्रमण्यम् के नाम से इनकी विशेष पूजा-साधना की जाती है, जिस प्रकार उत्तर भारत में श्री गणेशाय नमः अथवा किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजा का विधान है। उसी प्रकार पूरे दक्षिण भारत में श्री मुरूगन नमः जन-जन में व्याप्त है, इनके अन्य नाम हैं- स्कन्द, षडानन, षड्मुख, शक्तिधर, आग्नेय, कुमार इत्यादि प्रमुख है।
शारदा तिलक तथा श्री तत्व निधि ग्रन्थों में इनकी उपासना का विस्तृत वर्णन दिया गया है, कार्तिकेय के मुरूगन नाम में मुरूगु शब्द का तात्पर्य है, सौन्दर्य, ताजगी, सौरभ, माधुर्य, दिव्यता तथा आनन्द और सुब्रमण्यम का तात्पर्य है ज्ञान, लक्ष्मी, शत्रुनाश, मृत्युंजय, निरोगता और इन सब तत्वों की प्राप्ति कार्तिकेय साधना से होती है। कार्तिकेय के छः मुख- ऐश्वर्य, वीर, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य के प्रतीक हैं और यह सिद्ध बात है कि जहां सुब्रमण्यम् अर्थात् कार्तिकेय की पूजा होती है, वहां ज्ञान है, वर प्राप्ति है, ग्रह रक्षा है, धर्म और वेद है, बल है, दुष्टों का नाश है, शक्ति है।
गृहस्थ साधक के लिये कार्तिकेय साधना आवश्यक है, क्योंकि कार्तिकेय रक्षाकारक देव हैं और गृहस्थ साधकों के लिये रक्षात्मक क्रिया अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि आज की परिस्थितियों में बिना किसी दैवीय शक्ति के अपने को सुरक्षित रखना संभव ही नही है। इसलिये कार्तिकेय साधना प्रत्येक गृहस्थ को अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये, जिससे वर्तमान परिस्थति के साथ भविष्य में भी किसी गंभीर बाधा का सामना ना करना पड़े। साथ ही जीवन धन-धान्य, यश, कीर्ति, बल, बुद्धि, पौरूषता बनी रहे।
कार्तिकेय पूजा साधना से संतान, विजय, आयु, शक्ति, निर्भयता, लक्ष्मी, यश इत्यादि की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है, इसीलिये इनका स्वरूप सम्पूर्ण प्रसन्न अत्यन्त पुण्यमय एवं समस्त मंगल प्रदान करने वाला है।
कार्तिकेय साधना हेतु षष्ठी तिथि उत्तम मानी गयी है। जो 7 सितम्बर, बुधवार को है, इस को इस विशिष्ट दिवस अथवा किसी भी बुधवार को सम्पन्न कर सकते हैं। इस साधना हेतु ताम्रपात्र में शुद्ध जल, तेल, चंदन, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) तुलसी पत्र तथा विभूति आवश्यक है, कार्तिकेय को नैवेद्य में शहद तथा पीसा बाजरा अर्पित किया जाता है।
साधना क्रम में एक विशेष पीठ बना कर उस पर कार्तिकेय पराक्रम शक्ति युक्त शत्रु विजय यंत्र स्थापित करें, इसके साथ-साथ एक ओर अग्नि दीप अर्थात् तेल का दीपक, दूसरी ओर लाल रंग के कपड़े से बनायी हुयी पताका (ध्वज) अवश्य स्थापित करना चाहिये, पताका विजय का प्रतीक है।
सर्वप्रथम पूजा स्थान में एक ओर सुपारी स्वरूप में गणपति स्थापित कर पूजन करें, फिर कार्तिकेय यंत्र के चारों ओर चावल की आठ ढे़री बना कर आठ सुपारी रखें, और क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निट्टति, वरूण, वायु, कुबेर और ईशान की स्थापना कर, प्रत्येक को हाथ जोड कर नमस्कार कर कुंकुंम तथा पुष्प अर्पित करें, तत्पश्चात् कार्तिकेय विजयश्री गुटिका, पताका तथा दीप का पूजन करें, इसके पश्चात् भगवान कार्तिकेय का ध्यान करते हुये उनके रक्त वर्णीय अर्थात लाल वस्त्र, रक्त मुख का ध्यान करते हुये आह्नान करें, सर्वप्रथम शुद्ध जल यंत्र के सामने पात्र में अर्पित करें, फिर तेल अर्पित करें, पश्चात यंत्र स्वच्छ कर एक-दूसरे पात्र में यंत्र रखकर भस्म लगायें तथा कार्तिकेय मंत्र का जप करते हुये पंचामृत चढ़ायें।
कार्तिकेय विजयश्री माला धारण कर 25 मिनट मंत्र का जप करते हुये निरन्तर पंचामृत को यंत्र पर अर्पित करते रहें, इस पंचामृत को परिवार के सभी सदस्यों को ग्रहण करना चाहिये, पूजन का यह पंचामृत सर्व रोगनाशक है।
शरीर से निर्बल, निरन्तर बीमार रहने वाले व्यक्ति द्वारा यदि सात दिन निरन्तर पूजन कर यह पंचामृत ग्रहण किया जाये तो उसका रोग चाहे वह शारीरिक हो अथवा मानसिक शांत हो ही जाता है। पूजन के पश्चात् लाल रंग की पुष्प माला तथा पुष्प कार्तिकेय देव को अर्पित करें और पात्र में रखा जल पूरे घर में थोड़ा-थोड़ा अवश्य छिड़के, विजय पताका अपने घर के ऊपर लगानी चाहिये, इससे कभी भी घर पर शत्रु प्रभाव अथवा तांत्रिक क्रिया दोष नहीं पड़ता।
भगवान कार्तिकेय इच्छा शक्ति क्रिया शक्ति तथा ज्ञान शक्ति के स्वरूप हैं, कार्तिकेय शिव और शक्ति के मिलन का विशुद्ध रूप है, जहां कार्तिकेय है वहीं शिव-शक्ति भी हैं।
अधिाकांश व्यक्ति सोचते हैं, पहले जीवन जीने के साधन जुटा लें, फि़र सेवा, साधना कर लेंगे। लेकिन तैयारियां करते-करते दुनिया से जाने की तैयारी होने लगती है पर सेवा, साधना कर नहीं पाते।
जीवन उन्हीं का सार्थक है जो अपने अमूल्य समय को सत्प्रवृत्तियों में लगाते हैं।
लोग अपने जूते चमकाने के लिये प्रतिदिन पॉलिश करते हैं, पर आत्मा को चमकाने के लिये उनके पास समय का अभाव होता है। ये वही लोग हैं, जो सोशल मीडिया, सिनेमा घरों में घटों बिता देते हैं।
आप सोचते होंगे कि इन पुस्तक की बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन आप इतिहास उठाकर देखिये जितने भी महान व्यक्ति हुये उनके पीछे ऐसी ही पुस्तक का हाथ होता। उनके स्वर्णिम जीवन का निर्माण ऐसी ही किसी पुस्तक के सिद्धान्तों पर आधारित होता है।
जब आंधा चलती है तो अपने रास्ते की हर बाधा को उखाड़ फ़ेकती है। बहता हुआ जल चट्टान को काटकर भी अपना रास्ता बना लेता है और जो नहीं कटते उन्हें साथ बहा ले जाता है। यही होता है, जब किसी के पास अटल इरादों और बुलंद हौसले की शक्ति होती है।
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