





इस वर्ष गुरु पूर्णिमा महोत्सव में अनेक गुरु बहनों ने श्रेष्ठतम सेवा कार्य किया, भारत वर्ष के अनेक शहर, गांव, नगर के कार्यकर्ताओं ने अपना सहयोग, सेवा प्रदान किया। सही रूप में एक परिवार की एकजुटता भी यही दर्शाती है कि हम रहें कहीं भी, पर जब भी कोई आवश्यकता हो, तो परिवार के सभी सदस्य एकजुट होकर, एक लक्ष्य की ओर अग्रसर हों। फिर इस बात का कोई मायने नहीं है कि हम किस शहर, गांव, धर्म, जाति के हैं, शिष्य रूपी कार्यकर्ताओं को तो सिर्फ एकजुट होकर एक लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना ही उद्देश्य होना चाहिये। यह तुम्हारा अपना संगठन है, तुम ही इस संगठन के संचालक, कार्यकर्ता, सेवक हो। तुम्हें प्रत्येक क्षण अपने परिवार के विस्तार के लिये सजग रहना होगा, तुम निखिल ज्ञान के प्रचारक हो, सद्गुरुदेव ने यह बागडोर तुम्हें सौंपी है, यह अवसर प्राप्त हुआ है। यह उनका असीम प्रेम तुम्हारे लिये है——————-!
यह सुन्दर श्लोक अक्सर लोगों से सुनने को मिलता है, लोग कहते हैं, पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये होंगे, इसलिये यह मनुष्य शरीर मिला। ठीक है मान भी लेते हैं, हम पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये इसलिये हमको मनुष्य शरीर मिला। परंतु कोई ऐसा व्यक्ति है जिसको याद हो पिछले जन्म के पुण्य कर्म, वे क्या कर्म थे, जिससे यह मनुष्य शरीर मिला, क्योंकि अगर याद है तो एक बार और कर लेते, फिर एक और मनुष्य शरीर मिल जाता। किंतु कोई ऐसा है जिसे यह याद है, कोई ऐसा है जिसने इसका लेखा-जोखा रखा है अपने पास सुरक्षित। उसकी कृपा है यह मनुष्य शरीर, जिसे हम भूल जाते हैं, उस महान कृपा का हमें ध्यान ही नहीं रहता। जिसने यह मनुष्य शरीर दिया, चिंतन, विचार, मनन और कर्म करने की क्षमता दी। कृपायें चाहे कितनी भी हों और कृपा मांगने में हम चूकते नहीं, मौका देखा तपाक से कृपा मांग ली कि ऐसा-ऐसा हो जाये, पहले जितनी कृपायें है उनको तो देख लो, अब यह मनुष्य शरीर मिला, यह जन्म हुआ, यह जीवन मिला है, अनुभव करने का मौका मिला है और सबसे बड़ी बात जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होने का अवसर मिला, यह भी कृपा ही है। कितनी कृपा से, दया से यह शरीर, यह जीवन, यह सब कुछ हमें मिला है। अब बताओं कृपा कितने-कितने रूपों में प्राप्त हुयी। मैंने पिछली बार कहा था, फिर दोहरा रहा हूं, बिना कृपा के जीवन चल ही नहीं सकता, ब्राह्मण्डीय शक्ति द्वारा निरन्तर कृपा बरसती रहती है और उस कृपा का फल है, परिणाम है यह जीवन।
बस जीवन में यही समझना है, मनुष्य जीवन की महत्ता। यदि यह समझ गये तो भवसागर से पार हो जाओगे। परंतु कितने ऐसे लोग हैं, जो मनुष्य जीवन की महत्ता समझ पाते हैं, मनन करते हैं और क्रिया रूप में कार्य करते हैं, समझना और क्रिया रूप में धारण करना दोनों में डिफरेन्ट है, क्योंकि फिलॉसफी तो कोई भी सिखा सकता है, आज का हर व्यक्ति विद्वान है, दुनिया में विद्वानों की कमी नहीं। प्रत्येक व्यक्ति दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान स्वयं को समझता है, उससे किसी का ज्ञान पचता ही नहीं। किसी और के विचारों को अपने जीवन में आने ही नहीं देना चाहता। इसीलिये उसका दायरा सीमित होता है। क्योंकि ज्ञानर्जन उसके अहं को, उसके मैं को चोट पहुंचाता है।
जब हनुमान से पूछा गया राम कहां हैं? तब हनुमान ने अपना सीना चीरकर अपने हृदय में राम को दिखाया, बड़ी-बड़ी फिलॉसफियों से नहीं समझाया, साक्षात् अपने हृदय में राम के दर्शन करवा दिया। आज बड़ी-बड़ी यूनीवर्सिटीज में सुकरात की फिलॉसफी सिखायी जाती है। बड़े-बडे़ प्रोफेसर लोग आते हैं, समझाते हैं, सुकरात के जमाने में क्या-क्या हुआ, यह समझाने की कोशिश करते है सुकरात कैसा था। मोटी-मोटी किताबे पढ़ाते हैं, एक बात सभी यूनिवर्सिटीज में पढ़ायी जाती है, पढ़ने के बाद पुस्तक बंद की, एग्जाम दिया, डिग्री प्राप्त हो गयी। काला चोगा पहनकर फोटो खिचवा ली। अच्छी डिग्री मिली हुयी है, नौकरी मिल गयी और वह जो बात सुकरात ने कही वह सब भूल जाते हैं, अपने आपको जानने की किसको पड़ी है, अपने जानने को कोई नहीं लगता। बस तू-तू, मैं-मैं करते रहते हैं। जब भी सुकरात की चर्चा हुयी सभी डिग्री धारकों का तू-तू, मैं-मैं चालू हो जाता है, सुकरात ने ये किया, वो किया, चर्चा में सबने भाग लिया पर सुकरात के विचारों को धारण करने का साहस किसी से नहीं बना। फैन तो सब बन जाते हैं, पर फॉलोवर नहीं बनना चाहते या बनने का प्रयास नहीं करते।
आज मैं तुमसे कह रहा हूं, सैकड़ों बार मैंने कहा, फिर कह रहा हूं, कि तुम फॉलोवर बनो, सद्गुरुदेव के पद् चिन्हों का अनुसरण करो, उनके अनुगामी बनो। सद्-गुरु गीता का प्रतिदिन कम से कम पांच पाठ करो, इस सूत्र को तुम्हें जीवन में धारण करना ही चाहिये, यह शिष्य के जीवन का पहला कदम है, जिसका निरंतर चिंतन, मनन करने वाला शिष्य शीघ्र ही अपने दुर्गुणों पर विजय प्राप्त कर लेता है, हो सकता है, प्रारम्भ में तुम्हें सफलता ना मिले पर निरंतर एक-दो वर्ष अध्ययन करने वाले साधक के अन्तः मन में स्वतः ही ऐसी चेतना जागृत हो जाती है, कि वह अनेक गुणों से विभूषित होकर सभी सफलताओं को प्राप्त कर लेता है और अपने सद्गुरु का प्रिय बन जाता है। यदि एक-दो गुण भी तुममें विकसित हुये तो धीरे-धीरे शिष्यता के सभी कसौटी पर तुम परिपक्व हो सकोगे।
गणेश चतुर्थी का पर्व निकट आ रहा है, जीवन की बाधाओं पर विजय प्राप्त करने का यह श्रेष्ठतम पर्व है। जीवन के अष्ट पाशों से मुक्ति प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय गणपति साधना है। जिसे प्रत्येक साधक को समय-समय पर सम्पन्न करना चाहिये, कम से कम इस गणेश चतुर्थी पर तुम यह साधना अवश्य सम्पन्न करो, मैं यह तुम्हें आज्ञा दे रहा हूं, आदेश दे रहा हूं, कोई बहाना नहीं चलेगा। तुम्हें सभी परिस्थितियों से निकलते हुये हर हाल में साधना सम्पन्न करनी ही है। क्योंकि यह तो सामान्य रूप से सभी जानते हैं कि गणेश ही प्रथम पूज्य देव हैं, सभी बाधाओं के विनाशक हैं साथ ही वे रिद्धि-सिद्धि, नवनिधि के प्रदाता भी हैं, जिनकी आराधना, साधना, दीक्षा प्राप्त करने से नवनिधि स्वरूप में अनन्त द्वार खुलते हैं, किसी भी साधना में सफलता के लिये गणपति साधना उपयुक्त माना गया है।
जिससे अष्ट पाश की समाप्ति होती है और साधना में सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। तुम अपने जीवन के निर्माता स्वयं बन सकों, जीवन की सभी बाधाओं का विनाश गणपति साधना के माध्यम से कर, जीवन को निर्विघ्न बना सको, रिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ, लक्ष्मी, सफलता से तुम्हारा जीवन युक्त हो, ऐसा ही मैं तुम्हें आशीर्वाद् देता हूं, मंगल कामना करता हूं————-!
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