





प्राचीन समय में इन सभी देव पूजन का विशेष महत्व था। यही कारण है कि पहले लोगो में इतनी वैमनस्यता और आर्थिक हानि, व्याधि की पीड़ा नहीं होती थी। लेकिन अब स्थिति विपरीत है, निकटतम शत्रु हावी रहते हैं, लौकिक जगत में जिस तरह वैमनस्यता का घोर संकट है, इसका मूल कारण हमारे देवत्व शक्तियों का असंतुष्ट होना। जिनकी क्षुधा के कारण व्यक्ति को अनेक कष्ट, पीड़ा सहन करनी पड़ रही है। इसका आभास कर ही हमारे ऋषियों ने श्राद्ध कल्प में पितर शांति का विधान बनाया। जिससे व्यक्ति वर्ष में एक बार अपने निकटतम सम्बन्धियों के आत्मा के शांति हेतु साधनात्मक क्रिया, पूजन सम्पन्न कर सके।
आज का मनुष्य भले ही इसे स्वीकार ना करें, परंतु यह सत्य है कि अतृप्त आत्माओं का अतृप्त होने का प्रभाव हमारे जीवन में पूर्ण रूप से बना होता है।
कहा गया है कि-
अन्त समय में जैसे विचार एवं चिन्तन होते हैं, उसी के अनुरूप व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है। जब व्यक्ति विभिन्न इच्छाओं के साथ मरता है, तो कुछ देर तो उसे विश्वास ही नहीं होता, कि वह मर गया उसकी देह उसके समक्ष होती है और वह अचम्भित सा देखता रहता है, क्योंकि उसकी कई अपूर्ण इच्छायें होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिये उसे भौतिक शरीर की आवश्यकता होती है, इसलिये वह अपनी देह के आसपास ही मंडराता रहता है और जब देह जला दी जाती है, तो हताश हो जाता है और इच्छाओं की पूर्ति हेतु भटकता रहता है।
आकस्मिक मृत्यु प्राप्त व्यक्ति की आत्माये अत्यधिक क्षुधा पूर्ण होती हैं, क्योंकि कालखण्ड की विवशता में उनकी आकस्मिक मृत्यु तो हो जाती है, परंतु वो भटकती रहती हैं, काल बाध्यता के कारण उनका पुर्नजन्म नहीं हो पाता है, जिसके कारण उन्हें कई वर्षों तक प्रेत-योनि की पीड़ा सहनी पड़ती है। ऐसे में ये अतृप्त आत्मा मुक्ति हेतु अपने परिवार जनों की ओर आशातीत होती हैं, जिनकी पूर्ति ना होने पर उनके कोप का भी प्रभाव सहन करना पड़ता है। जिस प्रकार व्यक्ति को अपने भौतिक जीवन में परिवार के प्रति कर्तव्य वहन करना पड़ता है, उसी प्रकार यह भी है कि वह अपने पितरों के मुक्ति हेतु विशेष साधनायें सम्पन्न करें। जिससे उनके पितर अपने आगे के क्रमों में प्रवेश कर सके। साधनात्मक क्रियायें ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
कर्तव्य इतिश्री हेतु ब्राह्मणों को भोजन, दान करने से पूर्णतः अनुकूलता नहीं मिलती।
प्रथम- आपके पूर्वज या पितृ के कारण ही आप को यह मानव देह प्राप्त हुआ है। अतः यह आपके ऊपर उनका पितृ ऋण है और अगर आप साधना के माध्यम से उनके पुनर्जन्म का मार्ग प्रशस्त करते हैं, तो इस ऋण से और पितृ कोप के प्रभाव से बच जाते हैं।
द्वितीय- जब तक पितृ का पुनर्जन्म नहीं होगा, उसका सही मार्ग दर्शन नहीं होगा, उनकी इच्छायें अतृप्त रहेंगी। इस दशा में उसे देह की तलाश रहती है, जिसकी मदद से वह इच्छाओं को भोग सके और चूंकि उसी के संस्कार आपके शरीर में हैं, अतः वह आत्मा अपने द्वेष, क्रोध, काम, मोह आदि (अपनी विभिन्न कामनायें) को आसानी से आप पर प्रक्षेपित कर सकती है, जिसके फलस्वरूप आलस्य, प्रमाद, काम, क्रोध, लालच की मात्रा बढ़ जाती है और आप समझ नहीं पाते, कि यह क्या हो रहा है?
परन्तु आप साधना द्वारा यदि उनके पुर्नजन्म में सहायक बनते हैं, तो अपनी इच्छायें पूरी करने के लिये उन्हें देह मिल जायेगी, जिससे वह नये संस्कारों के अनुसार जीवन जीने लगेगा और आप भी उनके कुप्रभावों से मुक्त हो जायेंगे।
इसके अलावा नवीन देह देने के लिये आपके पूर्वज जो आपको आशीर्वाद देंगे, वह तो अपने आप में ही अनिवर्चनीय होगा, क्योंकि तब आप अपने जीवन में दिनों-दिन प्रगति की ओर अग्रसर हो सकेंगे और जीवन में हर प्रकार की श्रेष्ठता, धन, वैभव एवं सफलता प्राप्त कर सकेंगे। क्योंकि फिर आपके प्रगति में पितृ दोष बाधक नहीं बनेगा।
यह भी हमारे अनिवर्चनीय ऋषियों की अद्वितीय व्यवस्था है। किसी कार्य को इस प्रकार से सम्पन्न करने का विधान है जिसमें सर्वजन हिताय की स्थिति बन सके। हमारे शास्त्रों में पितृ दोष निवारण से सम्बन्धित कई विशिष्ट साधनायें उल्लिखित हैं। उनमें से मुख्य है पितृ शांति साधना जो कि अत्यधिक तीव्र है और तुरन्त प्रभाव देती है। यह साधना जहां हाल ही में दिवंगत लोगों के लिये उपयोगी है, तो वही उन पूर्वजों के लिये भी उपयुक्त है, जो बहुत पहले मृत्यु को प्राप्त हुये हैं।
यह साधना 17 सितम्बर से 1 अक्टूबर के मध्य कभी भी सम्पन्न कर सकते हैं। यह एक दिवसीय साधना है और इसमें पितृ दोष निवारण यंत्र, पितृ शांति माला एवं प्रायण गुटिका की आवश्यकता होती है। साधक ब्रह्म मुहूर्त में उठे और सफेद धोती पहन कर दक्षिणाभिमुख हो सफेद आसन पर बैठें।
साधक को चाहिये, कि अपने सामने सफेद वस्त्र पर यंत्र स्थापित करें, उसके चारों ओर दिव्य माला को रखे। कुंकुम से पितृ या पितरों का नाम या दिवंगत व्यक्ति का नाम यंत्र पर लिखें। अगर साधना सभी पितरों लिये कर रहे हों, तो सर्व पितृ लिखें। यंत्र और माला का पूजन करें, यंत्र पर गुटिका स्थापित करें और उसका भी पूजन करें। पितृ शांति माला से निम्न मंत्र की 51 मालायें जप करें-
साधना से पूर्व संकल्प में पितृ या पितरों के नाम अवश्य लें और यंत्र पर भी नाम अंकित करें। साधना समाप्ति के उपरान्त दक्षिण दिशा में किसी निर्जन स्थान में गड्ढ़ा खोद कर यंत्र, माला एवं गुटिका दबा दें अथवा किसी जलाशय में अर्पित कर दें।
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