





यदि साधक के पास साधना का तेज, मंत्र-बल हो, तो वह जीवन की किसी भी परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर ही लेता है। और यह संभव होता है माँ आद्या शक्ति के चैतन्य स्वरूपों की आराधना करने से, क्योंकि शक्ति के सभी स्वरूप आद्या शक्ति से ही उत्पन्न हैं, इसीलिये भारत के सभी प्रांतों में शक्ति चैतन्य दिवसों पर विशेष पूजा-अर्चना प्रत्येक घर में सम्पन्न किया जाता है।
लेकिन पूजा-अर्चना का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है, जब उसे पूर्ण विधि-विधान, प्रामाणिक साधना सामग्री और सिद्ध मंत्रों द्वारा श्रेष्ठ मुहुर्त में सम्पन्न किया जाये। जिसका सहस्र गुणा फल साधकों को प्राप्त होता ही है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुये भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के लिये महत्वपूर्ण और शीघ्र फलदायी साधनायें प्रस्तुत की जा रहीं है। जिससे साधक अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर सके। साथ ही निरंतर उर्ध्वगामी बन सके। कहा जाता है शक्ति सम्पन्न व्यक्ति अपने अधिकार को हर हाल में प्राप्त करता ही है। ऐसी ही प्रखर पौरूषता की विशिष्ट साधनायें।
जहां जीवन में प्रणय अर्थात् प्रेम है, वहीं सौन्दर्य, कान्ति, सम्मोहन होता है। प्रणय और प्रेम की अधिष्ठात्री देवी महागौरी को माना गया है, क्योंकि गौरी का स्वरूप ही यौवनमय, कान्तिमय तथा प्रणय से ओत-प्रोत है। ये सब एक-दूसरे के पूरक हैं, जिसकी साधना सम्पन्न कर साधक प्रणय से ओत-प्रोत हो जाता है, साथ ही सौन्दर्य, कान्ति, सम्मोहन, आकर्षण, पौरूषता से सभी को वशीभूत कर लेता है, एक तरह से यह कहना अनुचित ना होगा कि यह सम्पूर्णता वशीकरण की साधना है, जिसके द्वारा व्यक्तित्व में प्रखरता आती ही है और साधक-साधिका जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता अर्जित करते ही हैं। पति-पत्नी के लिये यह सर्वश्रेष्ठ साधना है क्योंकि प्रणय का तात्पर्य ही होता है प्रेम! जिस प्रणय में शिव-गौरी सदा से लीन हैं। इस साधना से आत्मीयता का भाव जागृत होता है, जो गृहस्थ जीवन के लिये संजीविनी है। साथ ही जिस शक्ति के द्वारा भगवान शिव पूर्ण पौरूषवान हो सकें, आद्या शक्ति उसी चेतना से साधक को परिपूर्ण करती हैं। इस साधना के द्वारा स्त्रियों में अनिन्द्य सौन्दर्य की वृद्धि होती है।
नवरात्र के प्रथम दिवस अथवा किसी भी शनिवार को यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। सांय 9 बजे के पश्चात् स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पवित्र आसन पर पूर्व की ओर मुख करके बैठ जायें। सामने धूप-दीप जलाकर एक पात्र में चावल भरकर उस पर मांगल्य राज को स्थापित करके संक्षिप्त पूजन करें। गुरु और गणपति पूजन सम्पन्न करें। फिर महागौरी शक्ति युक्त प्रिया आकर्षण यंत्र को बायें हाथ में रखकर दाहिने हाथ से ढक करके 5 मिनट तक ऊँ नमो शिवाय गौरी प्रियाय नमः मंत्र का जप करें। इसके बाद यंत्र को सामने किसी प्लेट पर रखें और शुद्ध जल से स्नान कराकर तिलक करें।
इसके बाद यंत्र पर संक्षिप्त पूजन कर खीर का भोग लगायें, फिर निम्न मंत्र का 20 मिनट तक मानसिक जप करें।
मंत्र जप के बाद दोनों हाथों में खुले पुष्प लेकर मूल मंत्र का 5 बार उच्चारण करते हुये पुष्पांजलि समर्पित करें। साधना समाप्ति के बाद सभी सामग्री को जल में विसर्जित कर दें। इस साधना से प्रणय, प्रेम, सौन्दर्य और आनन्द प्राप्त होता है तथा जीवन में निरन्तर श्रेष्ठ स्थितियां बनती हैं।
यह ठीक है कि जीवन है तो बाधायें आती ही रहती हैं और मनुष्य अपनी शक्ति से उन बाधाओं का सामना करता है लेकिन यदि निरन्तर एक के बाद दूसरी बाधा आ जाती है अथवा बाधाओं का हल प्राप्त नहीं होता है तो मनुष्य क्या कर सकता है?
ऐसी स्थिति में मनुष्य को दैवीय शक्तियों का उपयोग अवश्य ही करना चाहिये। देवता-देवियां मनुष्य की आंतरिक शक्ति का ही वायुमण्डल में विस्तार है। जो व्यक्ति इन दैवीय शक्तियों को अपने भीतर की शक्ति से मिलन करवा देता है वह जीवन में प्रत्येक बाधा पर सरलता से विजय प्राप्त कर लेता है, बाधाओं का कोई एक रूप नहीं होता, वह अनेक रूप में आकर जीवन की सकारात्मक स्थितियों में उथल-पुथल मचा देती हैं, ऐसे में आवश्यक है कि साधक प्रत्येक परिस्थिति को अपने नियंत्रण में रखें और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त करे। उससे जीवन सरल हो जाता है। वाराही अपने आप में आत्म उन्नति की तीव्र शक्ति साधना है।
दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें-
नवरात्रि द्वितीय दिवस पर यह साधना सम्पन्न करें अथवा किसी भी रविवार को कर सकते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके लाल आसन पर रात्रि दस बजे साधना के लिये बैठें। सामने किसी पात्र में शत्रु बाधा निवारण यंत्र व तांत्रोक्त वाराही गुटिका को स्थापित करके स्नान, तिलक, धूप दीप एवं पुष्प से पूजन करें। इसके बाद काली हकीक माला से निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप करें।
यह मंत्र अत्यंत तीक्ष्ण और प्रभावकारी हैं, अतः शुद्ध उच्चारण आवश्यक है। साधना समाप्ति पर सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें।
इस साधना की पूर्णता से साधक को मुकदमे इत्यादि में विजय प्राप्त होती है तथा शत्रु अपने आप परास्त होने लगते हैं, इसके साथ ही कार्य, व्यापार, नौकरी में आ रही कोई भी बाधा समाप्त हो जाती है।
सम्मोहन तो किसी भी साधक के अन्दर साधनात्मक बल द्वारा प्राप्त की गयी तेजस्विता होती है। उसके नेत्रों का तेज है, जिससे लोग सम्मोहित होते ही हैं। सम्मोहन वह शक्ति है जिसके प्रभाव से आपका घोर शत्रु भी मित्र बन जाता है, तथा आपके अनुकूल हो जाता है। सम्मोहन वस्तुतः सभी प्रकार की शत्रु बाधाओं से मुक्त कर देता है। सम्मोहन सिद्धि साधक-साधिका की यह विशेषता है कि लोग स्वतः ही उसके पास आकर बैठते और उससे बात करने को लालायित रहते हैं।
साधक को यदि सम्मोहन आंशिक रूप से भी सिद्ध हो जाये तो भी कार्यालय, घर, समाज आदि जगह पर उसे सम्मान, प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। लोग समर्थन करने लगते हैं, शीर्ष व्यक्तियों से भी सरलता से अपना कार्य सम्पन्न करवाया जा सकता है।
इस साधना को नवरात्र की नवमी 10 अक्टूबर अथवा किसी भी सोमवार को सम्पन्न करें, दैनिक क्रिया से निवृत होकर लाल रंग के आसन पर अक्षत से स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर सम्मोहन वशीकरण यंत्र का स्थापन करें। उसके सामने एक तेल का दीपक प्रज्ज्वलित कर दें। फिर सर्व सम्मोहन माला से निम्न मंत्र की 7 माला जप करें।
जप करने के पश्चात् साधक के अन्दर आणुविक क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। जिसका प्रभाव साधक स्वयं अनुभव कर सकता है। साधना माला को एक माह तक 20 मिनट शुद्धता से धारण करें व यंत्र को जल में विसर्जित कर दें।
वशीकरण देवी-देवताओं पर भी संभव है, यदि आपके पास हो सही साधना, प्रामाणिक उपकरण और कुछ कर गुजरने का हौसला। लक्ष्मी को वश में कर लेने की एक अघोर पद्धति की प्रमाणिक विधि है, जो नवरात्रि में साधकों द्वारा अवश्य सम्पन्न की जानी चाहिये। वशीकरण केवल मनुष्यों-स्त्रियों पर ही नहीं अपितु लक्ष्मी को भी अपने वश में किया जा सकता है। जिससे निरंतर धन वर्षा होती है, और साधक अपने सभी मनोरथों को पूर्ण करने में समर्थ होता ही है। यह तीव्र लक्ष्मी वशीकरण की अघोर पद्धति की साधना है, जिसे प्रत्येक साधक को इस नवरात्रि पर सम्पन्न करना ही चाहये।
यह साधना नवरात्र के किसी भी दिवस को सम्पन्न कर सकते हैं, लेकिन नवरात्र अष्टमी 09 अक्टूबर रविवार को सम्पन्न करना श्रेयष्कर होगा। रात्रि को 10 बजे के पश्चात् स्नान कर पीले आसन पर बैठ जायें और सामने कुंकुम से पन्द्रह बिन्दियां लगा लें, ये बिन्दियां एक सीध में होनी चाहिये। फिर इनके सामने तीन त्रिकोण बनावें, बीच के त्रिकोण में कुंकुम से लक्ष्मी लिखें, दायें त्रिकोण के मध्य में कुबेर और बायें त्रिकोण के मध्य में श्रीं लिखें, फिर पन्द्रह तेल के दीपक लगाकर प्रत्येक बिन्दी पर तेल का दीपक रख दें, दीपक का मुंह साधक की तरफ होना चाहिये और फिर पहले त्रिकोण के सामने पांच चिरमी के दाने रख दें, दूसरे त्रिकोण के सामने पांच हकीक नग रख दें और तीसरे त्रिकोण के सामने पांच इन्द्रजाल के टुकडे रख दें। इसके बाद लक्ष्मी वशीकरण माला से 5 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप पूरा होने के बाद हकीक, चिरमी तथा इन्द्रजाल के टुकड़ों को एक लाल पोटली में बांध कर अपने पास रख लें, तो निश्चय ही लक्ष्मी की निरंतरता बनी रहती है। लक्ष्मी पर पूर्ण रूप से सम्मोहन हो जाता है।
लक्ष्मी प्राप्ति की यह दुर्लभ साधना साबर पद्धति से है जिसका प्रभाव अचूक है। इस साधना से अनायास धन प्राप्ति होने लगती है, कई वर्षों से रूके हुये, फंसे हुये धन भी आकस्मिक रूप से प्राप्त होने लगते है। साधक को आश्चर्य होने लगता है कि जिस धन प्राप्ति की उसे कोई संभावना नहीं थी, वह भी प्राप्त होने लगता है। यही इस साधना का अनुभव है।
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