





लेकिन मैं जिस दूसरे ज्ञान की बात कर रहा हूं, वह प्रज्ञावान का ज्ञान है, वहां प्रज्ञावान अपने ज्ञान का मालिक नहीं होता है, जबकि ज्ञान ही प्रज्ञावान व्यक्ति की मालिक होती है। प्रज्ञावान ज्ञान को संग्रहित नहीं करता, उसकी तो आंधी आती है, जो सब उड़ा ले जाती है। सही ज्ञान तो एक तूफान है, एक आत्म क्रांति है।
और जब आत्म क्रांति आती है, तो जीवन में परिवर्तन शुरू हो जाता है, पुराने राग-लपेट छूटने लगते हैं, बचना मुश्किल हो जाता है। याद रखना जिस ज्ञान से जीवन बच जाये, परिवर्तन प्रारम्भ ना हो, वह ज्ञान धोखा है। जो अहंकार को छूता ही नहीं वरन् और भी बढ़ा देता है। वह ज्ञान बड़ा ही खतरनाक है, बहुत ही झूठा छलावा है, उससे तो अज्ञान ही बेहतर है, कम से कम अज्ञान अहंकार से तो बचाता है, अज्ञान का कोई पाखण्ड नहीं होता। पंडित यानी पाखंड, वह पाखंड की जीती-जागती प्रतिमा है। भीतर तो अज्ञान है, बाहर उसने ज्ञान और शास्त्रों की दीवाल खड़ी कर रखी है, भीतर तो दीया जला ही नहीं है, लेकिन उसने अपने घर के चारों तरफ वेद-वचन इकठ्ठे कर रखे हैं। स्वयं तो अछूता रह गया है। वह तो वैसा ही है, जैसा कि पहले था, उसमें रंच मात्र परिवर्तन नहीं हो पाया। बल्कि और भी अधिक शापित हो गया है, और अधिक पाखण्डी और धूर्त हो गया है। ज्ञानी पंडित मुझसे ज्यादा मिलते हैं, मैं जानता हूं कि यह ज्ञानी पंडित है, बाहर से दिखावा कर रहा है, अन्दर खोखला है, पूरी तरह खाली है, कोई एक लात मार दे तो 500 सौ फीट दूर गिरेगा। इसका अंहकार सातवें आसमान पर है, मैं लाख मना करूं पंडित मत बनो, प्रज्ञावान बनो पर कोई सुने तब ना, सबको मजा आता है पंडित बनने में। मजा इसलिये आता है कि पंडित बन गये तो चापलूसी करने वाले दो-चार चाटुकार मिल जायेंगे और मुझे प्रसिद्धि मिल जायेगी, यहां पर जो प्रयास कर रहें हैं, वो प्रसिद्धि के लिये है, सब प्रसिद्धि के पीछे पड़े हैं।
पंडित का ज्ञान बड़ा सुरक्षा से भरा है, तुम वही रहते हो, जो थे, तुम अपने को बचाते हुये ज्ञान को इकठ्ठा करते हो और ज्ञान इकठ्ठा करने से अंधकार नहीं मिटता। पंडित के ऊपर एक बड़ा बोझ इकठ्ठा हो जाता है। पंडित भी कोशिश करता है, कभी-कभी ज्ञान के अनुसार चलने की, लेकिन जो कोशिश करनी पड़ती है, वह सहज नहीं है, चेष्टा करनी पड़ती है, जबरदस्ती करना पड़ता है, अनुशासन में रहना पड़ता है। ज्ञान तो वह जो अंदर के तार झनझना दे, सहज ही समाधि मिल जाये, जिसको जानने के बाद आचरण अपने आप आ जाये, लेकिन पंडित बनकर ज्ञान प्राप्त करना कठिन है, क्योंकि पंडित फूंक-फूंक कर पैर रखेगा, कि चीटी न मर जाये, रात में भोजन न करेगा, पानी छान कर पीयेगा, सब ठीक कर रहा होगा, लेकिन कहीं गहराई में कोई गलती हो रही है।
वह गलती यह है कि वह जो कर रहा है, वह योजना है, इसमें भविष्य का विचार है, इसमें पाप-पुण्य का लेखा-जोखा है, गणित है। उसके अन्दर चींटी के प्रति प्रेम का उदय नहीं हुआ है। सिर्फ शास्त्र को पढ़कर चालाकी उत्पन्न हुयी है कि अगर चींटी मरेगी तो तुम्हें इसका फल मिलेगा, चींटी को दुख दोगे तो तुम्हें दुख भोगना पड़ेगा, चींटी से उसे कोई लेना-देना नहीं है, चींटी मरे, न मरे, बस चिंता यही है कि मुझसे ना मर जाये, क्योंकि अगर मुझसे मर गयी तो फिर पाप हो जायेगा ओर मेरे जीवन में संकट आ जायेगा। यह एक पंडित का हिसाब-किताब होता है। इसी पंडिताई ज्ञान से बचना है, तुम अज्ञानी हो, तो चलेगा, कोई समस्या नहीं है, पर तुम अपनी ये पंडिताई बंद करो, इससे तुम्हारा भला नहीं होने वाला, यह निश्चित है। अगर कोई शास्त्र ये बता दे कि मारो चींटी को, जितनी चींटियां मारोगे, उतने ही जल्दी सिद्धि मिलेगी, तो यही आदमी खोज-खोज कर चींटिया मारने लगेगा। यदि शास्त्र सिद्ध कर दे कि अनछना पानी पीना ही पुण्य है, इसमें कोई अड़चन नहीं है।
पहले मैं जिस जगह रहता था, वहां मेरे पड़ोस में एक जैन परिवार था, उस घर की जो गृहिणी है, वह सामने के कुएं से पानी भरती, जोधपुर में पहले ऐसी सुविधा नहीं थी, अब तो हर घर में पानी का सप्लाई होता है, फिर पानी को छानती, फिर कपड़े मे जो भी बच जाता, कूड़ा-करकट, अदृश्य जीव, उन सबको उल्टा कर वह कुएं में झड़ा देती। इसलिये कि कुएं से निकाला है प्राणियों को, वे कुएं के बाहर मर न जाएं। मैंने उससे एक दिन कहा, ऐसे ही मजाक में कहा, यह तो ठीक है, लेकिन इतने ऊपर से कीडे़-मकोड़े तू गिरा रही है वापस, जो किसी को दिखाई भी नही पड़ते, वे सब मर जायेंगे, इतने छोटे जीव इतनी ऊंचाई से गिराओंगी वे तो रास्ते में चोट से ही मर जायेंगे। वह एकदम से घबड़ा गई, मैं तो यह जन्म भर से कर रही हूं, तो अब तक न मालूम कितना पाप हुआ होगा! अभी तक पुण्य ही सोच कर कर रही थी, अब वह पाप हो गया। घबड़ा गई मुझसे पूछने लगी, तो फिर क्या करना है? पानी छान कर बचा हुआ का क्या करना है?
मैंने कहा जो आंख से दिखाई नहीं पड़ते, वे तो छानने में ही मर जायेंगे, तो उसने कहा क्या बिना छाने पानी पीना है? अब तुम खुद ही समझ लो, उसे जीवाणुओं से कोई प्रयोजन नहीं था, उनसे कुछ लेना-देना नहीं है, फिक्र सिर्फ अपनी है, अपने अहंकार की है, अपने सुख-दुख की है। जो व्यक्ति अहिंसा को साधता है, वही प्रज्ञावान है। वही ब्रह्मचर्य को साध सकता है, वह उपवास भी कर सकता है, लेकिन उसके पहले उपवास को समझना होगा, नहीं तो उपवास के आनंद से वंचित रह जायेंगे। फिर तो उपवास सिर्फ परेशान करेगा, भूखा मारेगा, उसका उपवास तो सिर्फ भूखा मरना होगा, और उसके चेहरे पर उसका सारा विषाद लिखा हुआ पाओगे।
बड़ी विचित्र बात है कि किसी ने उपवास किया हो और बिना नाचे कर ले तो समझना कि उपवास बेकार था, अब तुम कहोगे गुरु जी ये क्या कह रहे हो आप! एक तो मैंने सुबह से कुछ खाया नहीं, अन्न का एक दाना भी अन्दर गया नहीं और आप नाचने के लिये कह रहें हैं? तुम जो उपवास रहते हो, वह स्वयं को जलाने का उपवास है और मैं जिस उपवास की बात कर रहा हूं, वह शरीर को, मन को, तन को ऐसा ताजा कर देता है, ऐसा स्वस्थ कर देता है, कि तुम बिना नाचे रह न पाओगे। तुम्हारे पैरों में पंख लग जायेंगे। तुम्हारे अंतर मन में तृप्ति आ जायेगी।
जहां समझ है, जहां प्रज्ञा है, जहां वास्तविक ज्ञान है, वहां आचरण ऐसे ही आता है, जैसे तुम्हारे पीछे तुम्हारी छाया आती है, उसको लाना थोड़े ही पड़ता है, बांध-बांध कर! पीछे लौट-लौट कर देखना थोड़े ही पड़ता है कि छाया आ रही है कि नहीं आ रही है। छाया तुम्हारे पीछे आती ही है। आचरण छाया है, वास्तविक ज्ञान का। लेकिन झूठे ज्ञान का आचरण जबरदस्ती आग्रह है, आरोपण है। वास्तविक ज्ञान आंधी की तरह आती है और मिटा देती है, सभी परम्पराओं को, दम्भ को, अज्ञान को और तुम मिट जाते हो, आंधी सब मिटा देती है।
इसलिये ध्यान रखना ज्ञान की आंधी लानी है तुम्हे! जीवन में पंडिताई मत करने लगना जिस दिन ज्ञान की आंधी आये, उसमें अपनी सुरक्षा मत खोजना, अपना गणित मत लगाना, वह वास्तविक ज्ञान झंझावात है, वह तुम्हें बचाने नहीं आयेगा। ज्ञान की आंधी को निमंत्रण देना जरूरी है, जो तुम्हें निखार जाये, जो तुम्हें धो जाये, जो तुम्हें साफ कर जाये, जो तुम्हें स्नान करा दे, स्नान कोई साधारण जल का स्नान नहीं है, अग्नि स्नान, यह तुम्हें साफ ही नहीं करेगा, जलायेगा भी, क्योंकि जलाने से ही तुम शुद्ध हो सकोंगे, तुम स्वर्ण अग्नि में तप कर ही बन पाओगे।
मेरे पास दो तरह के लोग आते हैं, एक वे जो मेरे पास आते हैं, कि उन्हें मैं कुछ सहारा दूं कि वे जैसे भी हैं, उनमें थोड़ी मजबूती और शक्ति आ जाये, मेरे साथ तो वही चल सकता है, जो मिटने को तैयार हो, जिसने तय ही कर लिया हो कि चाहो कोई भी कीमत हो, अब दांव पूरा लगा देना है, कुछ बचाना नही है। क्योंकि जरा सा भी तुमने बचाया, कि पूरा बच जायेगा। जुआरी चाहिये, व्यवसायी नहीं, व्यवसायी पूरे पंडित हो जाते हैं, जुआरी ही ज्ञान को उपलब्ध होते हैं, जुआरी का मतलब यह है, कि जो बिना फिक्र सब कुछ लगा देता है, इस पार या उस पार, होशियारी से नहीं चलता, चालाकी से नहीं चलता, गणित से नहीं चलता।
संसार के घर को तुम कितना ही मजबूत बनाओ, उसमें से दुख तो छूता ही रहता है। कितना ही बनाओ सुंदर घर पर स्वर्ग नहीं हो पाता। इसलिये तुम्हे अपने जीवन में एक बार ज्ञान की अग्नि से स्नान करना है, स्वयं को जलाना है, उसी में तुम्हारी तृष्णायें जल कर खाक होंगी। तभी तुम स्वर्ण की भांति दैदीप्यमान हो पाओंगे। जीवन के मूल तत्व को समझ पाओगे और यही तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है, अब तुम्हें यह निश्चित करना ही है कि तुम पंडित बनोगे या प्रज्ञावान। गुरु के साथ चलना है या ऐसे ही जीवन बिता देना है और गुरु के साथ पंडित चल नहीं सकता, प्रज्ञावान ही गुरु का हाथ पकड़ पाता है। तुम वास्वविक ज्ञान को जान सको, समझ सको, अपना लक्ष्य निर्धारित कर सको, यही मंगलकामना करता हूं।
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