





बंसत का तात्पर्य है ताजगी, उत्साह, उमंग, जोश, सौन्दर्य। इन सब की पूर्णता को रस कहा गया है। रस से ही नीरस पड़े जीवन में मस्ती, प्रेम का संचार होता है।
जो समस्त धातुओं को अपने में समाहित कर लेता है और जो बुढ़ापे, निराशा, रोग व मृत्यु के भय को समाप्त कर लेता है, वही रस की संज्ञा से विभूषित है।
रस का संचार होने पर व्यक्ति अपने आप में प्रसन्नचित हो जाता है। उसके तनाव, चिंता, व्याधि सभी गायब हो जाते हैं, उसके अंदर एक नवीन तरंग और मस्ती का संचार हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आना, तनाव में आ जाना सब दूर हो जाता है। यदि घर में किसी भी प्रकार का क्लेश हो, लड़ाई-झगड़ा हो, तो वह सब समाप्त हो जाता है, पति-पत्नी के मध्य आत्मीयता बढ़ती है। व्यक्ति स्वयं तो प्रसन्न रहता ही है, उसके सम्पर्क में आने वाले लोग भी उससे खुश रहते हैं, क्योंकि उसके जीवन में साधना की विशेष क्रियाओं द्वारा रस पूर्ण रूप से समाविष्ट हो जाता है।
जीवन निरंतर आगे बढ़ते रहने की एक ऐसी घटना होती है, जिसमें व्यक्ति का कोई बस ही नहीं चलता और जब उसका कोई वश नहीं, तो वह विवश ही होता है, कि उम्र के किसी मन चाहे मोड पर अपनी इच्छा से रूक सके। कौन है जो इस जीवन में वृद्ध होना चाहता है? कौन है जो नहीं चाहता, कि उसकी युवावस्था हमेशा ही बनी रहे? चाहे स्त्री हो या पुरुष, सभी के मन की यह इच्छा रहती है। यह बात और है कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ समाज उन्हें कई-कई छलावों के साथ जीने के लिये विवश कर देता है।
उदास, गम्भीर, बोझिल और जिदांदिली से विरक्त होकर रहने के लिये मजबूर सा कर देता है। यूं न हंसो लोग क्या कहेंगे, यूं न कपड़े पहनों अच्छा नहीं लगा, ऐसी आदतें रही तो कौन सम्मान करेगा-जैसे कई वाक्य किसी भी स्त्री या पुरूष को वृद्ध होने से पहले ही सुनने पड़ते हैं। यानि कि भले ही मन वृद्ध ना हुआ हो, लेकिन तन के वृद्ध होने से पहले ही मन को वृद्ध बना दिया जाता है और जब मन में वृद्धावस्था का भान होने लगे, तो तन तो वृद्ध होगा ही। तन तो मन का गुलाम होता है। जो मन की गति होगी, तन उन्हीं गतिविधियों का संचालन करेगा। यह कैसे हो सकता है कि किसी का मन अशक्त हो जाये और उसका तन अशक्त ना हो? और आज की जो स्थितियां हैं, उनमें मन बस अशक्त ही नहीं हो रहा, बल्कि अशक्त होते-होते जर्जर हो चुका है।
जीवन एक उछाह से बनता है, लेकिन जिसके मन में कोई उछाह ही ना बचा हो, वह जीवन में कैसे उछाह पैदा कर सकता है, जीवन केवल कर्त्तव्यों की गठरी को सिर पर रखकर बेबसी से ढ़ोते रहने से जीवन की श्रेणी में नहीं आ जाता। जीवन तो उमंगो और खिल-खिलाहटों के ताने-बाने पर बुनकर तैयार होता है और जहां ऐसा सहज सम्भव न हो रहा हो, वहां स्वयं के प्रयास द्वारा कुछ पैदा करना पड़ता है।
हर एक इंसान अपने तरीकों से अपने सीमित साधनों में भी, अपने जीवन में रंग घोलने की कोशिशें करता ही रहता है लेकिन एक मुकाम ऐसा भी आ जाता है, जहां सपने भी बेजान होने लग जाते हैं और तब उदासियों का जो सिलसिला कायम हो जाता है, वही इंसान को मनहूसियत के ऐसे काले दायरे में फेंक देता है, जहां से बेबसी का मानों कभी न खत्म होने वाला सिलसिला चल पड़ता है और आखिरकार इन्हीं सब में उलझते-सुलझते इंसान का मन जर्जर हो जाता है।
उसी धरती में कोई बीज अंकुर बन सकता है, जो पानी से भीगी होती है, सूखी धरती में क्या कभी किसी ने किसी पौधे को जन्म लेते देखा है? सूखी रेतीली जमीन में तो बस कंटीले झाड़ो वाले कैक्टस ही उग सकते हैं और जिनका मन नाउम्मीद हो चुका होता है, उन्हीं के मन में ईर्ष्या के, द्वेष के, आलोचना के, बैर के कई-कई कैक्टस उग कर चुभने लग जाते हैं, दूसरों को भी और खुद उनको भी।
शरीर तो अपनी गति से चलेगा। जो आज पच्चीस वर्ष का है, वह एक दिन पैंतीस-चालीस और उससे भी आगे के वर्षों में जायेगा ही। यह तो एक सहज गति है, लेकिन जीवन-रस का मुर्झा जाना सहज गति नहीं हो सकती। वास्तव में जब जीवन में सरसता का एक अविरल प्रवाह होता है, तभी जीवन के प्रति एक स्वस्थ और सकारात्मक दृष्टिकोण बनता है और तभी लक्ष्य निर्धारित होते हैं, तभी स्वप्न उपजते हैं और ऐसी गति का निर्माण होता है, जिस गति का पीछा वृद्धावस्था कभी कर ही नहीं सकता। ऐसी स्थिति होने पर ही जीवन में कोई बोझिलता नहीं रह पाती और न तब कर्त्तव्य किसी भारी गठरी की तरह लगते हैं।
जीवन की मूल सरसता तो सभी आवश्यकताओं, कामनाओं से मुक्त आनन्द और खुमारी का ऐसा प्रवाह होता है। जिसमें व्यक्ति खुद किसी और के मन में हिलोर पैदा करने में समर्थ होने लग जाता है और ऐसा ही व्यक्ति सही अर्थो में युवा होता है, भले ही उम्र के किसी भी पड़ाव पर क्यों न पहुंच चुका हो।
जीवन की प्रत्येक हीन भावना, जड़ता, आनन्द के विखंडित हो जाने की आशंका या ऐसी ही कई स्थितियां ये सब जीवन की नीरसता ही है। सरस्वती अनंग साधना जीवन की ऐसी स्थितियों से मुक्त कर साधक को वेगवान, ओजवान व रस से परिपूर्ण करती है।
वसंत पर्व की मूल भावना सरस्वती व अनंग दोनों की साधनाओं को एक विशिष्ट क्रम में तादात्म्य के साथ सम्पन्न करने पर ही प्राप्त हो सकती है, जिससे न केवल साधक बाह्य रूप से उल्लासमय, यौवनवान और चिरनूतन बना रह सके वरन उसके हृदय में भी आनन्द की मधुर स्वर लहरी सदैव तरंगित बनी रह सके। भौतिक जीवन का आधार साहस, जीवंतता और नित्य नूतनता का इस साधना से पूर्ण समावेश होता है।
यह साधना प्रत्येक वर्ग के साधक-साधिका के लिये उपयोगी है। जीवन से निराश, कुंठित व्यक्ति के लिये यह साधना वरदान स्वरूप है, जिसे सम्पन्न करने पर साधक का जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही परिवर्तित हो जाता है, वह एक नवीन आशा, उत्साह, मस्ती के साथ जीवन को पूर्ण रूप से भोग पाता है।
बंसत पंचमी दिवस पर प्रातः काल में स्नानादि से निवृत्त हों। फिर पूर्व की ओर मुंह कर पीले आसन पर बैठें। सामने चौकी पर सरस्वती देवी का चित्र स्थापित करें, चित्र के सामने रति अनंग यंत्र किसी ताम्र पात्र में रखें, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद से यंत्र का स्नान करायें। अब यंत्र को शुद्ध जल से स्नान कराकर किसी दूसरे पात्र में ऐं बीज मंत्र कुंकुम से अंकित कर उस पर यंत्र स्थापित कर दें। यह ऐं बीज मंत्र ज्ञान स्वरूप में आन्तरिक चेतना को जाग्रत करता है। यंत्र के सामने घी का दीपक जलायें, फिर अक्षत, चंदन अर्पित कर, सुंगन्धित धूप प्रज्ज्वलित करें और नैवेद्य के साथ गुलाब पुष्प माला अर्पित करें।
अपने सामने अनंग शक्ति सरस्वती माला रखकर उस पर 11 बार इस मंत्र का उच्चारण कर जल से अभिषेक करें।
दोनों हाथों में माला लेकर आज्ञा चक्र व नेत्रें में स्पर्श करायें। पश्चात् निम्न मंत्र का 8 माला जप करें।
साधक इस विशिष्ट साधना को सम्पन्न कर ही यह अनुभव कर सकता है, कि किस प्रकार आनन्द के उछाह में भी गरिमा की समायुक्ति हो सकती है।
साधना के उपरांत माला को पूरे शरीर पर स्पर्श करायें, फिर सभी सामग्री को जल में विसर्जित कर दे।
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