





दस महाविद्याओं की साधना करना जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानी जाती है, ये दस प्रकार की शक्तियों की प्रतीक हैं, और महत्त्वपूर्ण अवसर पर जीवन में जिस शक्ति तत्त्व की कमी होती है, उस कमी को पूरा करने के लिये महाविद्या की साधना, उपासना करना जीवन का सौभाग्य माना जाता है।
धूमावती दस महाविद्याओं में से एक हैं, जिस प्रकार तारा बुद्धि और समृद्धि की, त्रिपुर सुन्दरी पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं। इसी प्रकार धूमावती शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम प्रदान करने वाली देवी हैं, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ धूमावती साधना को सम्पन्न कर लिया जाये तो।
सांसारिक सुख भी अनायास ही प्राप्त नहीं हो जाते, उसके लिये भी साधना का बल और मंत्र की सिद्धि आवश्यक है, सुख प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण है, किन्तु उन सुखों का उपभोग करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है। आज के इस प्रतिस्पर्धावादी युग में यह कहां सम्भव है, कि व्यक्ति कुछ क्षण सुख से, आनन्द से व्यतीत कर सके, उसे तो आये दिन कोई न कोई समस्या घेरे ही रहती है और उन्हीं से जूझते हुये उसकी शक्ति समाप्त होती जाती है, ऐसी परिस्थिति में उसे शारीरिक शक्ति के साथ-साथ दैविक बल की भी आवश्यकता पड़ती है। यह मानव मात्र का स्वभाव है, कि जब चारों ओर परेशानियों के, बाधाओं के, अड़चनों के बादल मंडरा रहे होते हैं, तभी व्यक्ति ईश्वर की अभ्यर्थना करने के लिये, समय निकालने के लिये विवश होता है।
शारीरिक शक्ति अच्छे खान-पान और योग द्वारा प्राप्त की जाती है, किन्तु दैविक शक्ति को साधना के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरूष सभी के लिये साधना का द्वार खुला है। प्रत्येक गृहस्थ व संन्यासी के लिये शक्ति-साधना विशेष महत्त्वपूर्ण होती है, इसके बिना तो जीवन अभावपूर्ण ही होता है। शक्ति-साधना की तीन श्रेणियां होती हैं-पशु, वीर और दिव्य। घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील और जाति इन आठ पाशों से आबद्ध जीव पशुवत् होता है, परन्तु शक्ति साधना को सम्पन्न कर वह जीव पाश मुक्त हो पशुपति हो जाता है।
दस महाविद्याओं के क्रम में धूमावती सप्तमी महाविद्या हैं, ये शत्रु का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली हैं। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से प्राप्त होती है। कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है, और उसके आगे सबको हार माननी पड़ती है, किन्तु जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है।
शक्ति सम्वलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही सम्भव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो भय ग्रस्त, दीन-हीन और अभाव ग्रस्त जीवन जीते हैं, वे कायर और बुजदिल कहलाते हैं, किन्तु जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं और यदि साधना हो किसी महाविद्या की, तो उसके भाग्य के क्या कहने, क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता है।
आज समाज में जरूरत से ज्यादा द्वेष, ईर्ष्या, छल, कपट, हिंसा और शत्रुता का वातावरण बन गया है, फलस्वरूप यदि व्यक्ति शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो वह नहीं रह सकता, अतः जीवन की असुरक्षा समाप्त करने की दृष्टि से वर्ष में दो-तीन बार ऐसी विशिष्ट साधना सम्पन्न करनी ही चाहिये।
धूमावती ‘दारूण विद्या’ हैं, सृष्टि से जितने भी दुःख हैं, व्याधियां है, बाधायें हैं, इनके शमन हेतु इनकी साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, इसीलिये इन्हें लक्ष्मी के नाम से भी पूजित किया जाता है, अतः लक्ष्मी प्रप्ति के लिये भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहनी चाहिये।
महाविद्याओं में धूमावती की साधना बहुत ही क्लिष्ट मानी जाती है। इसके लिये साधक को बहुत ही पवित्रता का ध्यान रखना चाहिये। इस साधना से पूर्व तत्सम्बन्धित दीक्षा लेने का प्रयास करना चाहिये, इससे साधना काल में किसी प्रकार का भय आदि होने की सम्भावना नहीं रहती। शक्ति-साधना प्रवृत्ति और निवृत्ति उभय मार्ग के लिये विहित है। जिसमें शरीर के गौरव का ही नहीं, अपितु शक्ति के संचार का महत्त्व है, वस्तुतः शक्ति-साधना प्रत्येक गृहस्थ के लिये अनिवार्य है। जीवन में भाग्य में जो कुछ न हो, उसे प्राप्त कर लेना ही शक्ति साधना का प्राप्तव्य है।
इस प्रयोग में निम्न सामग्री अपेक्षित होती है- प्राणश्चेतना युक्त धूमावती यंत्र, दीर्घा माला तथा अघोरा गुटिका। 12 मार्च 2017 फाल्गुल पूर्णिमा रविवार के दिन इस महाविद्या साधना को सम्पन्न करें या फिर किसी भी रविवार को। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे 9 बजे से 12 बजे के मध्य सम्पन्न करें। साधक स्नान आदि से पवित्र होकर, साधना कक्ष में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर, ऊनी आसन पर बैठकर साधना सम्पन्न करे। लाल वस्त्र, लाल धोती और गुरू चादर का प्रयोग करे। यह साधना शून्य स्थान में, श्मशान में, जंगल में, गुफा में या किसी भी एकांत स्थल पर, जहाँ कोई विघ्न उपस्थित न हो, करना श्रेयस्कर रहता है।
अपने सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती चित्र स्थापित करें, फिर किसी प्लेट में यंत्र को स्थापित करें। यंत्र को जल से धोकर उस पर कुमकुम से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें, जो सत्व, रज एवं तम गुणों के प्रतीक स्वरूप हैं। धूप व दीप जला दें और पूजन प्रारम्भ करें-
विनियोग दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़ें-
अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद, र्निवृच्छन्दः, ज्येष्ठा
देवता, धूं बीजं, स्वाहा शक्तिः, धूमावती कीलकं
ममाभीष्ट सिद्ध जपे विनियोगः।
जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।
कर न्यास
धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः।। धूं तर्जनीभ्यां नमः।।
मां मध्यमाभ्यां नमः।। वं अनामिकाभ्यां नमः।।
तीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।।
ऋष्यादि न्यास
पिप्पलाद ऋषये नमः शिरसि (दायें हाथ से सिर स्पर्श करें)
निवृच्छन्द से नमः मुखे (मुख को स्पर्श करें)
ज्येष्ठादेवतायै नमः हृदि (हृदय को स्पर्श करें)
धूं बीजाय नमः गुह्ये (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)
स्वाहा शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें)
धूमावती कीलकाय नमः नाभौ (नाभि को स्पर्श करें)
विनियोगाय नमः (सभी अंगों को स्पर्श करें)
स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः (दोनों हाथों को स्पर्श करें)
संकल्प लेकर, दोनों हाथ जोड़े व भगवती धूमावती का ध्यान करें-
अत्युच्चा मलिनाम्बराखिलजनोद्वेगावहा दुर्मना,
रूक्षाक्षित्रितया विशालदशना सूर्योदरी चंचला।
प्रस्वेदाम्बुचिता क्षुधाकुलतनुः कृष्णातिरूक्षाप्रभाः
ध्येया मुक्तकत्व सदाप्रिय कलिर्धूमावती मन्त्रिणा।।
भगवती धूमावती के स्वरूप का चिन्तन करते हुए बायें हाथ में गुटिका को लेकर मुट्ठी बांध लें और दीर्घा माला से निम्न मंत्र का 5 माला नित्य तीन दिन तक जप करें-
जप समाप्ति के बाद सभी सामग्रियों को चौकी पर बिछे कपड़े में ही लपेट कर चौथे दिन शाम को किसी जन-शून्य स्थान में जाकर, गड्डा खोदकर दबा दें और पीछे मुड़कर न देखें।
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