





जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित है उसको बारम्बार प्रणाम है।
यह सारा जगत यह स्वीकार करता है कि अवश्य ही कोई सार्वभौम सत्ता अथवा कोई महाशक्ति इस ब्रह्माण्ड को गतिशील कर रही है। यह सारा जगत चारों ओर दिखाई पड़ने वाले दृश्यमान, महाशक्ति का एक लघु रूप है जिसके एक टुकडे़ का भी जब बड़े-बड़े विद्वान, ज्ञानी जन भी पार नहीं पा सकते फिर उस सर्वज्ञ महाशक्ति का पता अल्प ज्ञानी जीव कैसे पा सकते है?
शक्ति का अर्थ है बल, पौरूष अथवा सामर्थ्य! छोटे-से-छोटा काम करने के लिये, अपनी कानिष्ठिका उँगली उठाने के लिये भी हमें शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। जिस शक्ति से संसार का सारा काम, पशु पक्षी-वृक्ष आदि सबका कार्य सम्पन्न होता है, वह शक्ति आती कहाँ से है? वैज्ञानिक दृष्टि से, सारी शक्ति का मूल सूर्य है। यह शक्ति का एक बृहत् पुंज है। पौधों की पंक्तियों में जो हरियाली है, जो हरे-हरे सजीव अणु हैं, वे ही सूर्य की इस शक्ति को ग्रहण कर आत्मसात् करने का सामर्थ्य रखते हैं और ये ही सजीव हरे-हरे परमाणु सूर्य से इतनी अधिक शक्ति का संचय कर लेते हैं कि जिससे सारे पौधे का काम चल सके! प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वनस्पति खाकर जीने वाले प्राणियों के शरीर में यह शक्ति अप्रकट रूप से उस खाद्य पदार्थ में रहती है जिसे वे खाते हैं। प्राणी जब साँस लेता है तो साँस के साथ ऑक्सिजन गैस उसके भोजन में मिल जाता है, जिससे धीरे-धीरे भीतर की अग्नि प्रज्वलित हो उठती है और भोजन में जो शक्ति प्रच्छन्न रूप में विद्यमान रहती है वह ऑक्सिजन को पाकर उन्मुक्त हो जाती है और इसी उन्मुक्त शक्ति के द्वारा प्राणी अपना सब काम कर पाते हैं।
सृष्टि सृजन के बारे में हमें ग्रन्थों के माध्यम से जानकारी मिलती है कि प्रारम्भ में सफेद-सफेद वाष्पकी-सी एक वस्तु होती है, जिसे अंग्रेजी में ‘नेबुला’ (Nebula) कहते हैं। यह पहले-पहल निश्चल और निष्क्रिय होता है। धीरे-धीरे उसमें गति उत्पन्न होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऑक्सिजन के परमाणुओं के साथ मिलने से नेबुला में गति उत्पन्न हो जाती है अर्थात् कोई शक्तिदायी गैस अथवा पदार्थ नेबुला के अन्दर हलचल पैदा कर देता है। धार्मिक एवं वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार किसी वस्तु की उत्पत्ति अथवा रचना में दो वस्तुओं की आवश्यकता होती है-स्थूल प्रकृति और शक्ति की, जड और चेतन (आत्मा) की।
जगत् की उत्पत्ति में हमें यह पता ही है कि संसार में मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तथा वह दो चीजों को अपनी अंदर समाहित रखता है – जड और चेतन। अन्नमय और प्राणमय कोषों से बना हुआ उसका जो स्थूल शरीर है वह मोटी तौर पर उसका जड अंश है। सूक्ष्म शरीर उसका दिव्य अथवा चेतन अंश है। उसके भीतर जो शक्ति है वह भी मोटे रूपमें दो भागों में विभक्त की जा सकती है-स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति। इन दोनों प्रकार की शक्तियों की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं और वे श्रेणियाँ भी भिन्न-भिन्न परिमाण और शक्तिवाली हैं। जिस स्थूल शक्ति के द्वारा वह चलता, फिरता, दौड़ता और अन्यान्य काम करता है उसका मूल-स्त्रोत है उसका भोजन! भोजन में एक प्रच्छन्न शक्ति होती है जो सूर्य से हरे-हरे पौधों में सुनिश्चित होती है। उसके श्वास के साथ ऑक्सिजन का जो भाग जाता है वही इस प्रच्छन्न निष्क्रिय शक्ति को प्रसारित कर देता है। और इसी शक्ति के द्वारा मनुष्य अपना सब काम करता है।
यदि मनुष्य के सूक्ष्म शरीर की रचना की ओर ध्यान दें तो मानव की प्रकृति दो प्रकार की है-जो नीचे का तह है उसमें उसके स्थूल शरीर की वासनायें और विकार रहते हैं और जो ऊपरी तह है वह उसके दिव्य पुण्य-गुणों का बना हुआ है। जब मनुष्य अपनी आसुरी एवं तामसिक वृत्तियों पर जय प्राप्त कर लेता है और अपनी सात्त्विक, बौद्धिक अथवा उच्च वृत्तियों से परिचित हो जाता है और अपनी उदात्त शक्ति का विकास करने लगता है, तभी वह ईश्वर के साथ तादात्य स्थापित करने योग्य होता है।
मनुष्य के अंदर यह उच्च दिव्य शक्तियाँ हैं, उनकी समष्टिका नाम है ‘कुण्डलिनी-शक्ति।’ हम यों कह सकते हैं कि यह ‘कुण्डलिनी-शक्ति’ मनुष्य के अन्दर रहनेवाले जीवात्मा का नारी-रूप है-ठीक जिस प्रकार परमात्मा की महत् शक्ति का नाम ‘दैवी’ है। जब तक मनुष्य संसारिक विषयों में पूरी तौर से फँसा रहता है, जब तक वह अपने शारीरिक सुखों की चिन्ता में संलग्न है, जब तक वह अपनी विषय-वासनाओं की पूर्ति में ही व्यस्त है, तब तक यह कुण्डलिनी-शक्ति सोयी हुई और निश्चेष्ट रहती है।
इस प्रकार अनेक जन्मों तक सुख और दुःख का अनुभव करते-करते मनुष्य के अन्दर इस ज्ञान का उदय होता है कि वह केवल शरीर मात्र नहीं है, अपितु उसमें शरीर से परे भी कोई वस्तु है। इस सम्बन्ध में उपनिषद् में एक बड़ा सुन्दर रूपक मिलता है। संसार-रूपी वृक्ष पर परमात्मा और जीवात्मा-ये दो पक्षी बैठें हैं। इनमें से एक पक्षी, जो शान्त, स्वस्थ, प्रसन्न, सुन्दर और पवित्र है, उस विशाल वृक्षकी फुनगी पर बैठा है। दूसरी चिडि़या जो रूप-रंग में हू-बहू पहले पक्षी के समान है-ऐसा प्रतीत होता है मानों वह पहले पक्षी की प्रतिच्छाया अथवा प्रतिबिम्ब हो-शाखा से शाखा पर फुदकती फिरती है, अत्यधिक चपल है, और डाली-डाली के फलों को चखती फिरती है। जब-जब इसे कड़ुवे फल चखने पड़ते हैं, तब-तब यह फलों का खाना त्याग देती है और ऊपर के पक्षी की ओर देखती है, फलों को भूल जाती है और ऊपर की ओर उड़ने का मन में निश्चय करती है। किन्तु ज्यों ही ऊपर उड़ती है कि ऊपर की डाली का एक फल उसके मन को मोह लेता है और बेचारी चिडि़या ऊपर जाने के संकल्प को भूल जाती है।
इसी प्रकार मनुष्य संसार-वृक्ष पर बैठा हुआ जब किसी कड़ुवे फल को चखता है अर्थात् जब उसे कोई दुःखमय अनुभव होता है, कोई महान सन्ताप होता है, जब वह कोई हृदय-विदारक समाचार सुनता है, तब वह क्षणभर के लिये ठहर जाता है, रूक जाता है, सोचने लगता है कि सांसारिक भोगों से उच्चतर भी कोई है या नहीं? क्या ऐसी भी कोई वस्तु है जो उसे परम शान्ति और नित्य सुख दे सकती है? तब अपने अन्तर्जगत् का अध्ययन करने लगता है, अपनी प्रकृति का विश्लेषण करने लगता है और इस बात का अनुभव करता है कि उसके अन्दर एक महान, उच्च, दिव्य, उदात्त, शाश्वत-शक्ति है और यह निश्चय करता है कि उस शक्ति को जगाना चाहिये, उसका विकास होना चाहिये।
उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि वह शरीर मात्र अथवा पंचकोषों का पुतला मात्र नहीं है शरीर और अन्य कोष तो उसे अपने वास्तविक स्वरूप की उपलब्धि कराने के साधन अथवा उपकरण मात्र हैं। वह जान जाता है कि उसके भीतर जो ‘परमात्मा’ बैठा है, उसीका सब पर प्रभुत्व रहना चाहिये, शेष सभी उसकी अधीनता में रहें। अथवा संक्षेप में यों कह सकते हैं कि उसके भीतर जो शुद्ध आत्मा है, उसका जो उच्चतम स्वरूप है वही सर्वोच्च रहें और उसकी जो नीच वृत्तियां है उन पर निश्चित रूप से विजय मिले तथा उनकी समाप्ति हो जाये, वह प्रार्थना करता है तथा उसकी प्रार्थना यही होती है कि – हे देवता! मुझे असत्य से सत्य के मार्ग पर ले चलो, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
अब उसके भीतर की दिव्य चेतन-शक्ति जाग उठती है। यह कुण्डलिनी-शक्ति जागृत हो जाती है। उस शक्ति से हमारा संबंध एक हो जाता है शक्ति से सृजन भी होता है और विनाश भी होता है वह कल्याण करने में समर्थ है तो संहार करने में भी।
सृष्टि के प्रत्येक कण में शक्ति छुपी हुई है जो उत्पत्ति और संहार करती रहती है लेकिन जड एवं चेतन में रहने वाली शक्ति में भिन्नता होती है। एक को प्रकृति नियंत्रित करती है तथा दूसरी स्वतः नियंत्रित है। इसी कारण चेतन में रहने वाली शक्ति का दुरूपयोग प्रायः होता है। चेतन में समाहित शक्ति को विवेक होना आवश्यक है। इसी कारण अज्ञानता व बुद्धि हीनता के कारण ही चेतन प्राणी अपनी शक्ति का दुरूपयोग करता है अर्थात वह अपनी शक्ति का प्रयोग दूसरों की भलाई में अथवा अन्यों को कष्ट पहुंचाने में करता है, इसे ही दुष्टता कहा जाता है। मनुष्य की मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार ही शक्ति का प्रयोग हो जाता है।
शक्ति के उचित प्रयोग के लिये हमें उसकी जानकारी प्राप्त होनी चाहिये, लेकिन मनुष्य को अहंकार वश सही अथवा गलत का भान नहीं हो पाता तथा उसे इस प्रकार का ज्ञान देना अथवा सलाह देना भी बेकार हो जाता है। अतः बाल्य काल से ही हमारे जो संस्कार, आचार, विचार बन जाते है बड़ा होने पर वही संस्कार हमारे विचारों में रम जाते है और वह परिवर्तन करना, कराना असंभव सा ही होता है।
शक्ति का प्रादुर्भाव केवल पुरूषों में ही नहीं वरन् नारियों में भी महत्वपूर्ण है इस जगत में अनेकों नारियों ने अपनी शारीरिक व मानसिक शक्ति के कौशल से अपना प्रचण्ड प्रदर्शन किया है। परन्तु यह अवस्था तब आती है जब पुरूषों का पौरूष थक गया होता है तब वह महाशक्ति ही प्रकट होती है।
श्रीललिता-सहस्त्रनाम के चौथे मन्त्र में इसका बड़ी सुन्दरता से चित्रण किया गया है-
महाशक्ति देवताओं की उद्देश्यसिद्धि के लिये अर्थात् भण्डासुर, महिषासुर आदि असुरों के संहार के लिये ज्ञान रूप महावह्नि से प्रकट होती है। भण्डासुर शरीरधारी आत्मा है। यह शरीरबद्ध आत्मा, परमात्मा के साथ अपनी एकता को भूल जाता है-प्रत्युत यह अनात्म के साथ अपनी एकता का अनुभव करने लगता है और परिणाम स्वरूप अज्ञान, अनित्यता, दुःख आदि से क्षुब्ध और पीडि़त होता है। महिषासुर मनुष्य का पाशविक ज्ञान है, अपर ज्ञान है।
निधि श्रीमाली
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