





ईश्वर द्वारा प्रदान देह को सजाने-संवारने में मनुष्य जितना समय लगाता है, उतना समय किसी अन्य कार्य में नहीं लगाता। जहां पुरूष का सौन्दर्य उसकी पौरूषता, बलिष्ठता, ज्ञान, आत्म विश्वास, कार्य क्षमता, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता इत्यादि है, वहीं ऊंचा कद, चौड़ा भाल, बलिष्ठ हाथ, गेहुंआ रंग, चौड़ा सीना, दबा हुआ पेट, बलिष्ठ कंधे, दृष्टि में तेज इत्यादि शारीरिक सौन्दर्य के अन्तर्गत आते हैं। चाल और वाणी में गंभीरता भी पुरूष-सौन्दर्य का ही एक स्वरूप है।
वहीं स्त्री-सौन्दर्य की परिभाषा में बाह्य बनावट हाव- भाव मुद्रा पर विशेष बल दिया गया है। आकर्षित चेहरा, कोमल त्वचा, लम्बी गर्दन, कमल नेत्र, पुष्ट उरोज, पतली कमर, भारी नितम्ब, लम्बी सुड़ौल छरहरी देह बताया गया है। इसीलिये स्त्रियां अपने रूप-श्रृंगार पर विशेष ध्यान देती हैं। आंतरिक गुणों में स्त्रियों में दया, ममता, मोह, ममत्व, शालीनता विशेष गुण माने गये हैं। उपनिषद कार कहते हैं कि मनुष्य को अपने आंतरिक गुणों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये क्योंकि अंततः मनुष्य का लक्ष्य अहम् ब्रह्मस्मि स्वरूप की प्राप्ति करना है, साथ ही बाह्य रूप पर भी विशेष बल दिया गया है। यह मनुष्य जीवन अपने आप को आंतरिक तौर पर श्रेष्ठ बनाने के लिये तथा बाह्य रूप में सुन्दर बनाने के लिये भी प्राप्त हुआ है।
सौन्दर्य तत्व क्या है- सौन्दर्य अर्थात् सुन्दरता एक ऐसा तत्व है, जिसे आप उपेक्षित नहीं कर सकते हैं, उसमें तो एक ऐसा आकर्षण होता ही है, कि मन रोकते हुये भी नहीं रूकता, यह केवल शरीर के माध्यम से पूर्ण स्पष्ट न हो बल्कि हाव-भाव, व्यवहार, वाणी, वस्त्र आदि से भी स्पष्ट हो, पूर्ण रूप से लयबद्ध हो, वाणी में संगीत का अनुभव हो, नेत्रों में ऐसी दृष्टि हो, जो हृदय के भीतर समा जाये, यही तो सौन्दर्य का आकर्षण है, जीवन की जो सौन्दर्य के प्रति स्वाभाविक प्रकृति है, वह रोकने पर भी नहीं रूकती।
यह तो निश्चित सत्य है कि सुन्दरता सब को अपनी ओर सहज आकर्षित कर लेती है, इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति रूप-सौन्दर्य को अपने वश में कर लेने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, वह साधना का एक विशेष स्तर पूरा कर लेता है, उसके आत्म-विश्वास में कई गुना वृद्धि हो जाती है, उसकी कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है और बड़ी चुनौतियों को पार करने के लिये तत्पर हो जाता हैं।
इसी कारण रूप-सौन्दर्य की पूजा-अर्चना और उसे दैहिक अथवा मानसिक रूप से प्राप्त करने की इच्छा अदम्य रूप से रही है और यह इच्छा एक ऐसी इच्छा है, जिसे जब तक सम्पूर्ण रूप से प्राप्त न कर लिया जाय, तब तक शान्ति नहीं मिलती। श्री कृष्ण के समय का काल तो नारी-सौन्दर्य की पूजा-अर्चना, साधना का सर्वोत्तम काल कहा जा सकता है, स्वयं श्री कृष्ण ने अपने पूरे जीवन में उसको पूर्ण महत्व दिया है, रूप-सौन्दर्य उनके वश में था, और इसीलिये वे विभिन्न योग-माया स्वरूप में भी ‘योगेश्वर श्रीकृष्ण’ कहलाये।
सौन्दर्य और स्त्री- सौन्दर्य शब्द कहते ही किसी के भी मानस में जो बिम्ब सर्वप्रथम आता है वह किसी स्त्री का होता है। सौन्दर्य व स्त्री मानो एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हों, और यह असहज भी नहीं है क्योंकि इस सृष्टि में सौन्दर्य का सर्वाधिक स्पन्दनशील रूप एक स्त्री ही हो सकती है, मात्र दैहिक रूप के साथ-साथ कोमल भावनाओं के अभिव्यक्तिकरण के रूप में भी होता है।
भावनाओं के सौन्दर्य से जो उत्पन्न होता है उसे ही लास्य अर्थात् नर्तन कहा गया है और ऐसे नर्तन में कोई आवश्यक नहीं कि हाथ-पांव की गतिशीलता हो, एक नर्तक की स्थिति वह भी होती है जहां मन नृत्य कर उठता है और ऐसा तब होता है जब मन में सौन्दर्य बोध की कोई धारणा निर्मित हुई हो। जीवन का नव निर्माण करें- जीवन का उत्स काल अर्थात् जिस काल में मनुष्य अपने जीवन का निर्माण सतत् रूप से करता रहता है, वह 21 से 50 वर्ष के मध्य का होता है। पचास वर्ष के बाद किसी नवीन भाव को स्वीकार करने की चेतना या किसी नये कार्य को हाथ में लेने की क्षमता कम होने लग जाती है। जीवन की संध्याकाल में भी जीवन को क्षमतावान बनाये रखने की दृष्टि से महत्वपूर्ण काल होता है।
जीवन के ऐसे ही क्षणों में ऐसी विशेष साधना को सम्पन्न कर लेना चाहिये, वह होती है, अप्सरा रूपी रम्भा साधना से शरीर को जो ऊर्जा और शारीरिक ऊर्जा से भी अधिक आवश्यक मानसिक उल्लास प्राप्त होता है, उससे आकर्षणता, देह की बलिष्टता और सौन्दर्यता प्रौढ़ अवस्था के लिये अनेक रूपों में लाभप्रद सिद्ध होती है। यह एक अनुभूत तथ्य है कि यदि अप्सरा साधना को सम्पन्न करने के उपरान्त अन्य साधनाओं को प्रारम्भ किया जाये तो उनके अपेक्षाकृत अधिक तीव्रता से सफलता प्राप्त होने की स्थिति बन जाती है क्योंकि अप्सरा साधना करने के पश्चात निश्चय ही साधक के शरीर में ऐसे परिवर्तन हो जाते हैं, जो आन्तरिक रूप से नित्य यौवनवान बनाये रखने में सहायक सिद्ध होते हैं।
उच्चकोटि की अप्सराओं की श्रेणी में रम्भा का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मानी जाती हैं, सौन्दर्य की दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती हैं। शारीरिक सौन्दर्य, वाणी की मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन की मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो रम्भा हैं, रम्भा साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है, योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करता है। इच्छित पौरूष एवं सौन्दर्य प्राप्ति के लिये प्रत्येक पुरूष एवं नारी को इस साधना में अवश्य ही करनी चाहिये। सम्पूर्ण प्रकृति-सौन्दर्य को समेट कर यदि साकार रूप दिया जाय तो उसका नाम रम्भा होगा। सुन्दर मांसल शरीर, उन्नत एवं सुडौल वक्षस्थल, काले, घने और लम्बे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आंखों का जादू, मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान, दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज, यौवन भार से लदी हुई रम्भा बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचलित कर देती है। जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिये लालायित देखे जाते हैं।
सुन्दरतम वस्त्रलंकारों से सुसज्जित चिरयौवना, जो प्रेमिका के रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती हैं, साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ शारीरिक बल एवं वासन्ती सौन्दर्य से परिपूर्ण कर देती हैं।
इस साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साथ छाया की तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रह कर उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है।
रम्भा साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वयं खिंचा चला आये, यही तो चुम्बकीय व्यक्तित्व है।
इस साधना से साधक के शरीर से रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है।
यह जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है, जिसे देवताओं ने सिद्ध किया, इसके साथ ही ऋषि-मुनि, योगी संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया, यह सौम्य साधना है।
इस साधना से प्रेम और समर्पण की कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुटित होती है क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों से, बीमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जायेगा। प्रेम की अभिव्यक्ति करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है रम्भा साधना। जिन्होने रम्भा साधना नहीं की है, उसके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रफुल्लता भी नहीं है।
साधना-विधान
इस साधना में प्राण प्रतिष्ठित मनोवांछित सौन्दर्य आकर्षण बलिष्ठता प्राप्ति रम्भा यंत्र, तेजस्व यौवनमयी माला तथा शिव-गौरी शक्ति मुद्रिका होना आवश्यक है। यह रात्रिकालीन 9 दिन की साधना है। इस साधना को 24 मई की रात्रि 9 बजे के पश्चात अथवा किसी भी शिव-गौरी प्रदोष पर्व से प्रारंभ करें।
साधना प्रारंभ करने से पूर्व साधक को चाहिये कि स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीले आसन पर बैठें, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें, पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें, घी का दीपक जला लें, सामने चौकी पर एक थाली या प्लेट रख लें, दोनों हाथों में गुलाब की पंखुडि़यां लेकर रम्भा का आह्वान करें।
यह आवश्यक है कि यह आह्वान कम से कम 15 मिनट तक अवश्य हो। प्रत्येक आह्वान मंत्र के साथ एक पंखुड़ी थाली में रखें इस प्रकार आह्वान से पूरी थाली पुष्प-पंखुडियों से भर दें।
अब तेजस्व यौवनमयी माला को पंखुडियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसन पर और अपने ऊपर इत्र छिड़कें।
मनोवांछित सौन्दर्य आकर्षण बलिष्ठता प्राप्ति रम्भा यंत्र को माला के आसन पर स्थापित करें तथा शिव-गौरी शक्ति मुद्रिका को यंत्र के बांयीं ओर स्थापित करें। सुगन्धित अगरबत्ती एवं घी का दीपक साधना काल तक जलते रहना चाहिये।
सबसे पहले गुरु पूजन और गुरु मंत्र कर जप लें। फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें। इसके बाद बायें हाथ में गुलाबी रंग से रंगे हुये चावल रखें, और निम्न मंत्रों को बोलकर यंत्र पर चढ़ावें।
ऊँ दिव्यायै नमः। ऊँ प्राणप्रियायै नमः।
ऊँ वागीश्वर्यै नमः। ऊँ ऊर्जस्वलायै नमः।
ऊँ सौन्दर्य प्रियार्यै नमः। ऊँ बलिष्ठायै नमः
ऊँ देवप्रियायै नमः। ऊँ आकर्षणायै नमः
ऊँ यौवनप्रियायै नमः। ऊँ अप्सरायै नमः
ऊँ ऐश्वर्यप्रदायै नमः। ऊँ सौभाग्यदायै नमः।
ऊँ आरोग्य प्रदायै नमः। ऊँ धनदायै रम्भायै नमः।
इसके बाद तेजस्व यौवनमयी माला से निम्न मंत्र का 1 माला प्रतिदिन जप करें।
प्रत्येक दिन रम्भा अप्सरा का आह्वान करें और प्रत्येक दिन दो गुलाब की माला रखें। एक माला स्वयं पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगंध एक दम बढ़ने लगे, अप्सरा का बिम्ब स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यंत्र पर पहना दें।
9 दिन की साधना में प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं चित्त में सौन्दर्य भाव बढ़ने लगता है। कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर अद्वितीय ताजगी प्राप्त होती है। साधना के पश्चात् सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। यह सुपरीक्षित साधना है। पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है।
देह की रूग्णता, जर्जरता, आंखो में शुष्कता, आत्मीय रूप से नपुंसकता, स्वयं के प्रति हीन-भावना की समाप्ति के लिये आवश्यक है कि इस साधना को पूर्ण रूपेण जीवन के उक्त अधोगति स्थितियों को समाप्त करने का भाव होना चाहिये, इसी हेतु आवश्यक है कि बलिष्ठ सौन्दर्य, आकर्षण पूर्ण जीवन्त रम्भा शक्ति प्राप्ति दीक्षा प्राप्त कर साधना सम्पन्न करने से निश्चिन्त रूप से जर्जर देह में पौरूषता, काम शक्ति भाव की पूर्णता प्राप्ति सुनिश्चित होती है।
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