





सदा प्रसन्न रहो——!
आज प्रातः जब तुम अपने बिस्तर से उठे, मैंने तुम्हें अत्यन्त स्वस्थ, प्रसन्न और प्रमुदित मुद्रा में देखा। मुझे लगा कि आज तुम सदैव की भाँति मेरी अनदेखी नहीं करोगे और मुझसे कुछ बातें अवश्य करोगे, भले ही थोड़ी-सी, पर कुछ विचारों का आदान-प्रदान जरूर होगां मुझे यह भी अपेक्षा थी कि अपनी खुशियों एवं सफलताओं का पिटारा खोलने से पहले तुम शायद मुझे औपचरिकतावश ही सही इस बात के लिये धन्यवाद दोगे कि तुम्हारा पिछला दिन बहुत अच्छा व्यतीत हुआ। परंतु भक्त! मेरी यह आस पहले की तरह निराशा में बदल गयी। मैंने देखा कि तुम मेरी ओर देखे बिना ही स्नानगृह में प्रविष्ट हो गये और नहा-धोकर बाहर आ कर और वस्त्र पहन कर टेबल पर पड़े समाचार-पत्र पर अपनी नजरें गड़ाने लगे।
थोड़ी देर बाद जब तुम्हारी धर्मपत्नी ने नाश्ते के लिये तुम्हें आवाज दी तो एकबारगी मेरे मन में फिर आशा की किरण जाग उठी कि अब की बार तुम ‘सुप्रभात’ कहकर मुझे मेरी उपस्थिति का एहसास कराओगे, लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। तुम झट से आज्ञाकारी पति की तरह डाइनिंग टेबल पर आ धमके और चटकारे लेकर नाश्ता करने लगे। तुमने मेरा भाग निकालने की भी आवश्यकता नहीं समझीं। मैं मन मसोसकर रह गया। इसके पश्चात् जब तुम आफिस हेतु तैयार होने के लिये घर में इधर-उधर घूम रहे थे तब मुझे लगा कि तुम्हारे पास इतना समय तो अवश्य है कि तुम मुझे हाथ जोड़कर ‘अभिवादन’ कह सको।
पर तुम व्यस्त रहे। एक समय तो तुम यूँ ही कुछ न करते हुये आरामकुर्सी पर दस-पन्द्रह मिनट तक सुस्ताते रहे। तभी मैंने देखा कि तुम अचानक उठे, मुझे लगा कि शायद अब तुम मुझसे बात करना चाहते हो, परंतु मेरा यह अनुमान गलत निकला क्योंकि तुम फोन की ओर बढ़े थे और अपने मित्र से व्यर्थ की ऊलजलूल बातों में व्यस्त हो गये।
अब तुम्हारा ऑफिस का समय हो चला था। मेरे मन में विचार आया कि घर से बाहर निकलने से पहले तुम मेरे ‘पादसेवन’ करने का धर्म निभाओगे अर्थात् मेरे चरणस्पर्श करोगे अथवा ‘नमस्कार’ तो कहकर ही जाओगे, पर ऐसा नहीं हुआ। मैंने मन को सान्त्वना दी कि शायद जल्दी के कारण तुमने मेरा आशीर्वाद नहीं लिया। यह भी झूठी दिलासा ही थी, जो मन को शान्त करने के लिये थी। जब तुम ऑफिस जा रहे थे तो रास्ते में मुख्य मार्ग पर ही एक मन्दिर के आगे फटेहाल भिखारी के रूप में मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। आज रामनवमी का दिन था। लोग मन्दिर में मेरे दर्शनों के लिये आ-जा रहे थे। भिखारी के रूप में मैंने तुम्हें ‘राम-राम’ भी कहा, पर तुम तो मेरे अभिवादन को अनसुना करते हुये मेरी ओर देखे बिना ही सरपट आगे निकल गये। भीड़ के कारण जब तुम्हारे वाहन की गति धीमी हुई तब तुम्हारा ध्यान मन्दिर की ओर गया तो सही, पर तुम रूके नहीं। शायद तुम्हें ऑफिस में पहुँचने की जल्दी थी। यही सोचकर इस बार भी मैंने अपने मन को समझा लिया।
दोपहर में लंच के समय तुम टिफिन लेकर दोस्तों के साथ कैण्टीन में गये। तब तुमने अपने चारों ओर नजर दौड़ायी। दीवार पर टँगे मेरे चित्र की ओर भी देखा, और इस बात पर तुम्हारा ध्यान गया कि तुम्हारे मित्रों ने भोजन करने से पहले मुझसे थोड़े समय के लिये बात की, लेकिन तुमने नहीं की। कोई बात नहीं, मैंने विचार किया कि अभी भी बहुत समय है और मुझे आशा थी कि तुम बाद में मुझ से अवश्य बात करोगे। अब शाम हो चली थी। तुमने दफ्तर का सब काम समेटा और घर की ओर चल दिये। घर पहुँचने पर रिलैक्स होने के लिये तुमने अपने कपड़े बदले और कुर्सी पर पसर गये। तुम्हारी पत्नी चाय बनाकर ले आयी और तुम चाय की चुसकियाँ लेते हुये बातचीत में मशगूल हो गये।
चाय-पान के बाद तुम कुछ कामों में व्यस्त हो गये। काम निबटाने के बाद तुमने टी-वी- चला दिया। उस पर कोई घर-परिवार का सीरियल आ रहा था, जिसे तुम आनन्दपूर्वक देखने लग गये। टीवी- देखते हुये ही डिनर का समय हो गया। तुम अँगड़ाई लेते हुए उठे, मुझे लगा कि शायद तुम मेरी ओर आ रहे हो और भोजन करने से पूर्व मुझसे कुछ कहना चाहते हों मैंने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की, लेकिन तुम तो वाशबेसिन की तरफ बढ़ गये, हाथ धोये और डाइनिंग टेबल पर गये भोजन पर झपट पड़े। तुमने मेरी ओर झाँका तक नहीं और बच्चों के साथ भोजन का स्वाद लेने लगे। इस बार फिर मुझे निराशासे दो-चार होने पड़ा।
खाना खाने के बाद तुमने फिर टी-वी- खोल लिया और रात्रि के ग्यारह बजे तक एक के बाद एक विभिन्न कार्यक्रम देखते रहे। अब तुम थक गये थे और निद्रादेवी की गोद में चले जाना चाहते थे। ऐसा ही हुआ। मैं सोच रहा था कि परिवार के सदस्यों को ‘शुभ-रात्रि’ कहने के साथ मुझे भी याद कर लोगे, लेकिन तुमने मुझसे शुभ-रात्रि कहना जरूरी नहीं समझा और सीधे अपने शयन-कक्ष की ओर रूख किया। मैं फिर निराश हुआ, परंतु नाराज नहीं हुआ_ क्योंकि शायद तुम्हें इस वास्तविकता का ज्ञान नहीं है कि तुम मेरे कितने प्रिय हो? तुम तो अच्छी तरह से जानते हो वत्स! कि प्रेम में नाराज होना प्रेम का अपमान करना होता है। तुम मुझे भूल सकते हो, पर मैं नहीं। मैं सदैव तुम्हारे साथ रहता हूँ, एक क्षण के लिये भी अलग नहीं होता हूँ। मेरा तुम्हारे प्रति इतना प्रेम है कि मैं प्रतिदिन तुम्हारे हृदय में व्यक्त एक आभार, एक प्रार्थना, एक स्वीकृति, एक अपनत्व की झलक की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करता रहता हूँ। मेरी यह हार्दिक इच्छा रहती है कि तुम कम-से-कम दिन में एक या दो बार तो मुझसे बात कर लिया करो और नहीं तो ‘नमस्कार’ ही कर लिया करो। मैं तो तुम्हारी इतनी निष्ठा से ही सन्तुष्ट हो जाया करूँगा। मेरे लिये इतना ही पर्याप्त है कि मेरा पुत्र अपने पिता के अस्तित्व को स्वीकार तो करता है।
प्रिय पुत्र! तुम नहीं जानते कि मेरे और तुम्हारे बीच एक पवित्र और अटूट सम्बन्ध है। तुम यह भी नहीं जानते कि मैं तुमसे कितना गहरा प्रेम करता हूँ। तुम जानो या न जानो, लेकिन सत्य यह है कि मैं अत्यन्त समीपता के साथ्र माता की भाँति तुम्हारी निरन्तर परिचर्या कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे रोम-रोम में रमा हुआ, एक-एक श्वास के साथ आता-जाता हुआ, तुम्हारे मन के एक-एक चिन्तन के साथ तद्रूप हुआ, तुम्हारी आत्मा की आत्मा होकर एक अकल्पनीय एकता के साथ तुमसे जुड़ा हुआ हूँ। तुम्हें इस संसार में जो कुछ प्रेम, आराम, वात्सल्य, भोग, सेवा, सुख आदि मिल रहा है, वह किन्हीं इष्ट-मित्रों या प्राकृतिक वस्तुओं से नहीं मिल रहा है अपितु सब मेरे से ही मिल रहा है। फिर भी पुत्र! तुम मुझसे किंचिन्मात्र भी प्रेम, अनुराग क्यों नहीं करते? जहाँ कहीं मेरी कथा होती है, वहाँ से तुम चुपके से भाग आते हो जब कि विषयों की चर्चायें सुनने के लिये तुम सदा लालायित रहते हो।
तुम्हें अपने पिता से इतना हटाव-दुराव क्यों है, यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। जितना प्रेम मैं तुमसे करता हूँ, उसका यदि लेश मात्र प्रेम भी तुम मुझसे करते तो सब प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर मेरे पास परमधाम में पहुँच जाओगे और परमानन्द की अनुभूति करोगे। पिता का घर छोड़कर तुम पराये देश में क्यों कष्ट, क्लेश, दुःख, उपेक्षा, शोक, भय और अपमान सहन कर रहे हो? सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान पिता की संतान दुःख पाये, यह उचित नहीं लगता, युक्ति संगत नहीं होता, जरा विचार करो वत्स! और अपने घर लौट आओ। तुम नहीं जानते कि मैं कब से तुम्हारी बाट जोह रहा हूँ।
ओह पुत्र! अब फिर प्रभात हो गया। तुम एक बार पुनः उठ रहे हो। एक बार फिर मैं प्रतीक्षारत हूँ। तुम्हारे प्रेम से पूर्ण इस विश्वास से कि आज तुम अपने व्यस्त पलों में से कुछ पल मेरे लिये भी अवश्य बचाकर रखोगे। तुम्हारा दिन अच्छा व्यतीत हो, यही कामना करता हूँ।
‘‘मानव जीवन प्राप्त होने के पश्चात् हमारा जितना कर्तव्य परिवार, समाज के प्रति है, जिस प्रकार हम प्रातः परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों का अभिवादन करते हैं, उसी तरह ईश्वर के प्रति भी हमारा यह प्रथम कर्तव्य है, कि उनका हम प्रतिदिन अभिवादन करें, प्रार्थना करें, क्योंकि मानव जीवन में प्राप्त हुयी प्रत्येक वस्तु परमेश्वर की दी हुयी है और अन्त में हम सबको उसी के पास जाना है ’’
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