





लगता है अष्टावक्र आत्मज्ञानी के लक्षण के रूप में बताते-बताते पाते हैं कि यह सब तो सापेक्ष है। अब वे निरपेक्ष शब्दावली ढूंढ़ते हैं। इस स्थिति में सिर्फ संकेत मात्र हैं। कुछ ऐसा ही होता है, निश्चित नहीं कहा जा सकता कि कैसा है वह कुछ ऐसा भाव है इन शब्दों में।
महर्षि कहते हैं कि वह मोक्ष भी नहीं चाहता। मोक्ष की इच्छा तो तब हो, जब बन्धन सत्य हो। असल में तो दोनों ही मिथ्या हैं। इसीलिये उसकी स्थिति की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। ब्रह्मवेत्ता अतुलनीय है। उस जैसा कोई नहीं।
आत्मोपलब्धि के बाद स्थिर बुद्धि वाले आत्मतत्ववेत्ता के लिये न कुछ प्राप्त करना शेष रहता है, न ही कुछ छोड़ना। जब सब उसी का है, तो किसे पाना और जब सब स्वप्नवत है, तो छोड़ने का सवाल कैसा।
दृश्य जगत स्वभाव से कुछ नहीं है। कुछ न होना स्वभाव है संसार का। लेकिन ऐसा उसके लिये है, जो जानता है इसे इसके असली रूप में।
इस श्लोक में प्रारब्धवश सामने आये विषयों का विवेचन किया गया है। कर्मों के सिद्धान्त की चर्चा करते समय इस बात को स्पष्ट किया जा चुका है कि प्रारब्ध कर्मों के फलों को भोगता-सा दिखता हुआ भी वह आत्मज्ञानी, जिसकी समस्त वासनायें नष्ट हो गयी हैं, जिसमें किसी प्रकार की कोई आशा नहीं है, असल में किसी भी वस्तु का उपभोग नहीं करता। जब उपभोग ही नहीं करता, तो आये विघ्न के परिणाम स्वरूप होने वाले दुख का, भोग के फलस्वरूप होने वाली संतुष्टि का प्रश्न ही कहां उठता है।
‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’ – ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है। ऐसा श्रुति वचन है। जनक आत्मतत्व को जान चुके हैं। वे यह जान चुके हैं कि जो दिख रहा है उसका असल रूप क्या है, इसलिये वे भी ब्रह्म रूप हो गये हैं। अब उनके वचनों में शिष्य सा दैन्य नहीं है। अब उनमें और अष्टावक्र में अन्तर नहीं रह गया हैं गुरु-शिष्य का भेद समाप्त हो चुका है। पिछले प्रकरण में व्यवहार को लेकर जो प्रश्न महर्षि अष्टावक्र ने उठाये हैं उनका स्पष्टीकरण करते हुये अब जनक विचलित नहीं हैं, वे अपना निर्णय सुनाते हैं।
लीला शब्द महत्वपूर्ण है यहां। इसकी व्याख्या पहले भी की जा चुकी है। इस शब्द में सब कुछ करते हुये भी खेल का भाव निहित है। लीला में ‘अहम्’ का भाव नहीं होता। लीला करने वाला कर्तव्य का अभिमानी नहीं होता। कर्म इसीलिये उसे बांधता नहीं। कुछ नहीं करता। जो आता है, वह जस का तस स्वीकार करता है उसे। उसके लिये न कोई अनुकूल है न ही प्रतिकूल। यही वजह है कि उसे न कोई वस्तु-परिस्थिति सुख देती है, न ही दुख। राम और कृष्ण के जीवन को इसीलिये लीला कहते हैं। जनक कहते हैं कि आत्मतत्व वेत्ता तो भोगों का उपभोग करता हुआ लीला करता है। वह उनसे जुड़ता नहीं। और दूसरी ओर अविवेकी, अज्ञानी? वह न तो संसार का रूप जानता है, न ही अपना। ऐसा जीव संसार को ढोता है। उसके माथे पर सवार रहता है यह द्वैतरूप संसार। संसारी तो धर्म और अध्यात्म के पथ पर चलता हुआ भी अभिमान से पीडि़त रहता है। मुक्ति के साधन भी अज्ञानी के लिये बंधन का कारण बनते हैं। आनन्द के मार्ग-अज्ञानी को सुख-दुख देते हैं। जनक निश्चय सुनाते हैं, इसीलिये दोनों को एक-सा नहीं कह सकते। दिखते दोनों एक-से हैं बाहर से, लेकिन भीतर से अलग-अलग होते हैं, बिलकुल अलग-अलग।
व्यवहार में एक-सा दिखने को लेकर महर्षि ने पीछे सूत्रों में आश्चर्य प्रकट किया था। अब जनक उसी भाषा-शैली में स्पष्टीकरण दे रहे हैं। देवता जिस पद को प्राप्त करने के लिये इधर-उधर भटका करते हैं, उसे प्राप्त किया हुआ योगी हर्ष को प्राप्त नहीं होता। इनका विस्तार आप प्राप्त करने से पहले के उतावलेपन से लेकर प्राप्त होने के सुख, उसे प्राप्त होने के बाद छिनने के भय और छिन जाने पर आक्रोश आदि के रूप में करके स्वयं जान सकते हैं।
यहां एक संकेत और दिया जनक ने। जिसका प्रतिबिम्ब मात्र हैं समस्त पद। उस असलरूप, बिम्ब को जिसने पा लिया, उसके लिये प्रतिबिम्ब के पीछे भागने वाले की स्थिति हास्यास्पद होने के अलावा और क्या हो सकती है।
जो जैसा दिखता है, वह वैसा ही हो, ऐसा जरूरी नहीं। आकाश में धुयें को देखकर प्रतीत होता है, आकाश काला हो गया और ऐसा ही व्यवहार में कहा भी जाता है जबकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं होता। आकाश को धुआं मलिन तो तब करे, जब वह उसका संस्पर्श करे। बिना संग के एक के दोष दूसरे में नहीं जाते। संग वस्तुओं का होता है। निर्विषयक से संसार का संग हो ही नहीं सकता। प्रतीति को कोई सच मान ले तो सत्य को क्या फर्क पड़ता है।
आत्म तत्व वेत्ता के लिये जब द्वैत ही नहीं, तो संग किसका और कैसे। जब संग नहीं तो क्या पाप और क्या पुण्य और कैसा पाप, कैसा पुण्य। पाप-पुण्य जैसे द्वैत परक शब्द उसके लिये हैं जो द्वैत को मानता हो। आत्म तत्व वेत्ता का इनसे क्या लेना-देना।
सांसारिक व्यवहार हो या कि शास्त्र व्यवहार, दोनों में निषिद्ध और विहित कर्मों की चर्चा है। विहित अर्थात् क्या करना चाहिये और अमुक कार्य न करें, यह निषिद्ध है। और इन विधि निषेध आदि का कोई न कोई प्रयोजन भी तो होना चाहिये। यदि प्रयोजन ही नहीं तो विधि-निषेध कैसे। जिसने परम पुरूषार्थ रूप लक्ष्य को साध लिया, उसके लिये कौन सा प्रयोजन शेष रहा। सब तो मिल गया उसे। जब तत्व ज्ञानी ने समस्त जगत को (जगत के विषयों को) आत्म रूप में जान लिया, और यह जान लिया कि वह आत्मा ही उसका स्वरूप है, जो सदैव उपलब्ध है, तो फिर उसके लिये क्या प्राप्त करना शेष रह गया। सब कुछ तो प्राप्त हो गया उसे। और जब कुछ प्राप्त ही नहीं करना, तो क्या करना चाहिये क्या नहीं करना चाहिये, ये आज्ञायें भी नष्ट हो गयीं।
समस्त सृष्टि इच्छा-अनिच्छा के द्वन्द्व में फंसी है। कीट से लेकर ब्रह्म पर्यन्त सभी इच्छाओं के दास हैं। इच्छा की बात तो समझ आती है। लेकिन अनिच्छा? इसकी व्याख्या यदि वर्तमान दृष्टि से की जाये तो बात ज्यादा स्पष्ट होगी। ऐच्छिक-अनैच्छिक दो तरह के कर्मों की बात आधुनिक मनोविज्ञान करता है। ऐच्छिक क्रियायें जीव के वश में हैं। वह उन पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियंत्रण कर सकता है, करता है। अनैच्छिक क्रियायें वे हैं जिन पर जीव का प्रत्यक्ष रूप से कोई वश नहीं। और मजे की बात यह है कि इन अनैच्छिक क्रियाओं पर ही जीवन पूरी तरह टिका हुआ है। प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है कि ये अनैच्छिक क्रियायें भी वास्तव में ऐच्छिक ही हैं।
अब सवाल उठता है कि अज्ञान और ज्ञानी में क्या अन्तर है। अज्ञानी इच्छाओं-अनिच्छाओं को नकार नहीं सकता जबकि आत्मज्ञानी में इन दोनों को नकारने की सामर्थ्य हैं प्रवृत्ति में इच्छा-अनिच्छा दोनों ही एक समान महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन ज्ञानी की प्रवृत्ति में इन दोनों की ही कोई भूमिका नहीं होती। वह ‘प्रारब्ध’ की गति को जानता हुआ, कर्मों में प्रवृत्त हुआ सा दिखता है।
इस सूत्र में अद्वैत ज्ञान का स्वरूप बताया गया है। और यह भी कि यह प्रत्येक को नहीं होता। इस अद्वैत ज्ञान का फल है कि न तो उसे किसी से डर होता है न ही उसका किसी को डर होता है अर्थात् तत्व ज्ञानी से कोई डरता नहीं। अद्वैत ज्ञान का अर्थ है ईश्वर और जीव की एकता। वेदांत के प्रक्रिया-ग्रन्थ इसे भाग-त्याग लक्षणा से कुछ इस प्रकार समझाते हैं। इस लक्षणा का अर्थ है दोनों का कुछ अंश लो और कुछ को छोड़ दो। जो उपाधि है वह मिथ्या है। वह मात्र प्रतीति है। सत् की स्वीकृति और असत् का त्याग यही इस लक्षणा का उपदेश है।
अद्वैत शास्त्र ईश्वर की परिभाषा करते हैं-सर्वज्ञत्वादि विशिष्ट चेतन और अल्पज्ञत्वादि विशिष्ट चेतन है जीव। चेतन सर्वज्ञत्व और अल्पज्ञत्व उपाधियां हैं। इन उपाधियों का जब परित्याग किया तो बचा चेतन मात्र। चेतन तत्व दोनों में समान है। इस चेतन तत्व का ज्ञान ही अद्वैत ज्ञान है।
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