





उन्होने कहा कोई किसी के साथ सदा नहीं रहता, केवल आत्मज्ञान का प्रकाश ही शाश्वत् रूप से तुम्हारे साथ रहेगा वही तुम्हें सत्य की मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है।
भगवान बुद्ध ने आगे कहा- तुम मुझे अपनी बैशाखी मत बनाना, आज मैं साथ हूं, कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने पैरों पर चलना है, मेरे साथ की रोशनी से मत चलना क्योंकि थोड़ी देर के लिये यह रोशनी तुम्हे चला सकती है, मेरे बाद भी फिर अंधेरा होगा, इसलिये अपनी रोशनी उत्पन्न करो, अपना प्रकाश स्वयं बनो।
महान दार्शनिक सुकरात ने कहा था- ‘‘अपने आपको जानो’’ उन्होंने यह वाक्य एक मंदिर के मुख्य द्वारा पर लिखवा दिया था। जिसका कारण यह था कि अपनी सफलता की कामना लेकर जो भी व्यक्ति मंदिर में भगवान के दर्शन करने आये, उसे सबसे पहले अपने बारे में जानना चाहिये। वास्तव में सुकरात का यह अनुभव था किसी भी क्षेत्र की उपलब्धि और जीवन जीने की कला, दोनों ही अपने बारे में सही ज्ञान पर निर्भर करते हैं।
उपनिषदों में कहा गया है- कि सत्य का अर्थ होता है, जीवन का सर्वोच्च रहस्य और उसी को पाने के लिये समस्त जीवन का उपयोग निश्चय करना, वह परमात्मा ही परम सत्य है, वही हमारे हृदय में आत्मा के रूप में विद्यमान है। इस आत्म शक्ति को जागृत करके परमात्मा के साथ एक रूप हो जाना ही सत्य और जीवन योग है।
जो अपनी आत्म ज्ञान शक्ति को जाग्रत कर लेता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है और आत्मशक्ति को जाग्रत करने के लिये जरूरी है कि पहले हम खुद को जाने। बाईबल में कहा गया है कि- हमें ईश्वर की सूरत जैसा बनाया गया है, इसका तात्पर्य यह है कि हम में ईश्वरीय गुण होने चाहिये। हमें सर्वज्ञ, स्वेच्छज्ञ से निर्माण करने में सक्षम, क्षमाशील और सर्वगुण सम्पन्न होना चाहिये। हमारे भीतर अभूतपूर्व शक्ति है, परन्तु हम अपनी शक्ति के एक छोटे से हिस्से का ही उपयोग करते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि एक मनुष्य अपनी शक्ति का बीस प्रतिशत ही उपयोग करता है, शेष शक्ति व्यर्थ चली जाती है। महाभारत में वेदव्यास कहते हैं- आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है। स्वामी रामतीर्थ ने भी कहा- आत्मज्ञान का संपादन करना और आत्मकेन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य का सबसे पहला और प्रधान कर्तव्य है।
सद्गुरुदेव नारायण ने कहा- ‘‘हंसा उड्हू गगन की ओर’’ उन्होंने ने अपने शिष्यों का उद्घोष करते हुये कहा कि तुम राज हंस हो—-हिमालय के राजहंस हो——तुम बगुले नहीं हो —–अपने पंखों में शक्ति सृजन कर——-साहस का—- ज्ञान का——संचार कर इस मुक्त गगन को छू लो—- आसमान की ऊंचाई को नाप लो—–!! प्रत्येक शब्द पर गहराई से चिंतन कर यह सरलता से समझा जा सकता है, कि उन्होंने भी स्वयं के पंखों पर भरोसा करने की बात कही, उन्होंने कहा कि तुम इस मरघट तालाब पर रहते-रहते उड़ना भूल गये, तुम उड़ सकते हो, तुम्हारे पंखों में वह क्षमता, साहस है, तुम शक्ति को पहचानो, जानो, समझो और उसका उपयोग कर जीवन को उर्ध्वमुखी बनाओ।
रवीन्द्रनाथ की एक लघुकथा है- एक बार मनुष्य ने कटाक्ष करते हुये धरती से कहा, हे धरती! तू बहुत कंजूस है। हम दिन-रात मेहनत करते हैं, तब तू हमें अन्न के कुछ दाने देती है। अगर तूं हमें बिना मेहनत कराये ही अन्न के दाने दे दे, तो तेरा क्या बिगड़ जायेगा? धरती ने कहा- मेरा तो कुछ न बिगड़ेगा, बल्कि मेरी तो महिमा और बढ़ जायेगी। लेकिन तब तेरा बहुत कुछ बिगड़ जायेगा। तब तेरा मस्तक, तेरे महल, तेरी शानो-शौकत सब मिट जायेंगे, क्योंकि ये सब तेरे परिश्रम, तेरे प्रयासों से ही है।
व्यक्ति जब आत्म ज्ञान से परिचित हो जाता है, जब उसे आत्मज्ञान हो जाता है, तब वह अपने सामर्थ्य का पूर्ण उपयोग कर पाता है। अपनी इच्छा अनुसार अपने जीवन का स्वरूप निर्मित करता है। वास्तव में मानव को यदि अपना जीवन सार्थक बनाना हो तो, उसे स्वयं को जानना चाहिये, अपने आत्मज्ञान को प्रकाशित करने के मार्ग का चुनाव करना चाहिये। पूज्य गुरुदेव कहते हैं- तुम्हारा जीवन आश्चर्य भरा संतोषजनक हो सकता है, तुम अपनी अनेक असमानताओं और विभिन्नताओं के बाद भी सुखद जीवन प्राप्त कर सकते हो, यदि तुम स्वयं पर विश्वास करना सीख जाओ, तुम अपना सारथी अपनी आत्मशक्ति को बना लो तो तुम्हारा जीवन संवर सकता है।
बुद्ध पूर्णिमा जो बोधत्व प्राप्ति अर्थात स्वयं का बोध करने का दिवस है, इस दिव्य सुअवसर पर अपने जीवन को आत्म-प्रकाश की ओर अग्रसर करने की चेतना से युक्त करने का प्रयास सभी श्रेष्ठ साधकों के लिये आवश्यक है। इस साधना के द्वारा साधक के भीतर की चेतना का उदय होता है और वह अपने सामर्थ्य, शक्ति से परिचित होने की क्रिया प्रारम्भ कर पाता है। जिससे उसके आत्म-शक्ति में वृद्धि होती है, निरन्तर प्रयासरत साधक धीरे-धीरे आत्म ज्ञान युक्त होते हैं और जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि केवल और केवल आत्म ज्ञान युक्त होना है, स्वयं को परमार्थ की ओर अग्रसर करना है। यही जीवन का शाश्वत सत्य है।
बुद्धि पूर्णिमा 30 अप्रैल प्रातः 6 बजे स्नानादि से निवृत्त होकर अपने साधना कक्ष में प्रवेश करें, पूर्व दिशा की ओर मुंह कर पीले आसन पर बैठ जायें, सामने चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर कुंकुम से ऊँ बनायें, उस पर निखिल दिव्य चैतन्य यंत्र स्थापित करें, बायीं ओर अष्टगंध की छोटी सी ढ़ेरी पर आत्म ज्ञान शक्ति विग्रह स्थापित कर दें, इसके पश्चात् गणपति व गुरुदेव का संक्षिप्त पूजन कर, सद्गुरुदेव का ध्यान-प्रार्थना करें-
पश्चात् यंत्र व विग्रह का पूजन कुंकुम, अक्षत, पुष्प से करें और घी का बड़ा दीपक प्रज्ज्वलित करें, जिसकी ज्योति का प्रकाश अपने चेहरे पर स्पष्ट से पड़ती रहे, साधना काल तक दीपक प्रज्ज्वलित रहना अनिवार्य है। 5 मिनट तक प्राणायाम कर मन को शांत करें, फिर ज्ञान शक्ति माला से 5 माला मंत्र जप सात दिन तक करें-
सात दिन पश्चात् ज्ञान शक्ति माला धारण कर लें, अन्य सामग्री किसी जलाशय अथवा नदी में विसर्जित कर दें। गुरु पूर्णिमा दिवस पर गुरुदेव से मिलकर आशीर्वाद् प्राप्त कर माला गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर दें।
मुझे पता है, तुमने जीवन कहां से शुरु किया है, कहां के लिये प्रयाण किया था, क्योंकि मेरे ही मानस की तो एक सृजना हो तुम। मैं तुम्हें उड़ान भरने को तत्पर करता रहा और तुम जमीन पर बिखरे कंकड़-पत्थर चुनने में खो गये। मैं तुम्हें उस मान-सरोवर तक चलने की बात करता रह गया और तुम पता नहीं किन-किन पोखरों में स्नान करके अपने आपको धान्य मानने लगे, किन्तु जान लो कि वह अनिर्वचनीय तृप्ति तुम्हें तभी मिल सकेगी, जब तुम मान सरोवर का स्पर्श कर लोगे। पोखरों में वह तृप्ति मिल ही नहीं सकती। पोखर तो अनेक होंगे तुम्हारे जीवन में, किन्तु वे पोखर तुम्हारी नियति नहीं हो सकते। मैंने अपने मानस के राजहंसों की भाग्य लिपि में पोखरों का स्नान लिखा ही नहीं था। तुम्हारे सामने अथाह मानसरोवर झील फ़ैली हुयी है, ज्ञान का जल उसमें अगाध रूप से भरा हुआ है, जो कि स्वच्छ है, निर्मल है, पवित्र है, जिसमें डुबकी लगाना तुम्हारे जीवन का अहोभाग्य होगा।
सद्गुरु निखिल
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