





अष्टावक्र कहते हैं कि मनुष्य अपना संसार स्वयं बनाता है। मनुष्य की तृष्णा ही उसका संसार है। परमात्मा ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है, आत्मा एवं शरीर जैसी बहुमूल्य वस्तु उसे दी है किन्तु इस आत्मा के अज्ञान से वह भिखारी की तरह संसारी विषयों की चाह करता है, उनको प्राप्त करने की अन्धी दौड़ में पड़ जाता है जिससे वह निरन्तर दुःखी होता जाता है। वह प्राप्त पदार्थों से अधिक प्राप्त करने की इच्छा करता है और अप्राप्त की प्राप्ति की इच्छा में वह निरन्तर दौड़-धूप करता रहता है। उसकी यह तृष्णा कभी शान्त नहीं होती जिससे वह संसार में सुख-दुःखों का अनुभव करता है। अष्टावक्र कहते हैं कि जहाँ-जहाँ तृष्णा है वहाँ-वहाँ ही संसार जान। यदि मनुष्य की तृष्णा शांत हो जाये, यदि उसे जितना प्राप्त है उसी में संतुष्ट हो जाये तो वह सुखी हो सकता है। इसी को अष्टावक्र वीत-तृष्णा कहते हैं। इस वीत-तृष्णा की उपलब्धि प्रौढ़-वैराग्य को आश्रय करके स्थित होने को कहते हैं जिससे वह सुखी हो सकता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि यह तृष्णामात्र ही बन्धन है। अन्यथा संसार में कोई बन्धन नहीं है। यह संसार, नाते-रिश्ते, देहाभिमान, धन, सम्पत्ति आदि बन्धन इसलिये हैं कि इनसे कुछ पाना चाहते हैं। इनसे अपने को अधिक से अधिक भरना चाहते हैं। इन सबके मूल में तृष्णा ही है। यदि तृष्णा का नाश हो जाये तो वह मुक्ति ही है। मुक्ति के लिये और कुछ करना नहीं पड़ता। अष्टावक्र इस तृष्णा-नाश का भी उपाय बताते हुये कहते हैं कि संसारमात्र से अनासक्त होने से तृष्णा का नाश हो जाता है एवं इसके नाश से निरन्तर प्राप्ति और तुष्टि होती है। संसार से तृष्णा छोड़ने से ही भीतर का जो बहुमूल्य है वह ज्ञात होने लगता है। उसी से मनुष्य की तुष्टि होगी। संसारिक पदार्थों से तुष्टि हो ही नहीं सकती। सब कुछ प्राप्त करके भी भीतर खालीपन का अनुभव होता रहेगा। अनासक्त का अर्थ है न आसक्ति न विरक्ति, न ग्रहण न त्याग की इच्छा करना, यथा प्राप्त में संतुष्ट होना, उपेक्षा भाव रखना, यही अनासक्ति है।
ब्रह्म अथवा आत्मा एक है, चैतन्य है, शाश्वत है इसलिये वही सत्य है। यह सृष्टि उस की अभिव्यक्ति मात्र है, उसी एक का फैलाव मात्र है, उसी का विस्तार है। वही एक असंख्य नाम-रूपों में प्रकट हुआ है। किन्तु यह संसार जड़ है, अनित्य है, क्षण-क्षण बदलता रहता है। संसार एक प्रवाह है, धारा है, चैतन्य स्थिर है, संसार गतिशील है। इस ब्रह्म में दो प्रकार की सनातनी शक्तियाँ हैं – विद्या और अविद्या। अविद्या संसार का हेतु है एवं विद्या अमृत तत्व की। अविद्या के प्रभाव से जीव उनके पास से दूर हटते हैं एवं विद्या-शक्ति के प्रभाव से समीप खिंचते हैं। इस अविद्या के प्रभाव से ही मानव का मलिन अन्तःकरण बहुमुखी वासना द्वारा चलित होकर भोग के मार्ग पर प्रवृत्त होता है और बन्धन दशा को प्राप्त होता है किन्तु मानवमात्र के हृदय में सत्य, प्रेम, पवित्रता, साधुता, त्याग, वैराग्य, करूणा, दया आदि के जो भाव हैं वे विद्या शक्ति के कारण हैं और यही अमृतत्व है।
अष्टावक्र जनक को यही कह रहे हैं कि तू शुद्ध चैतन्य है, आत्मस्वरूप है इसलिये तू नित्य एवं शाश्वत है तथा यह संसार जड़ है, और असत् है, नष्ट होने वाला है, यह अविद्या भी संसार की हेतु होने से असत् है। ऐसा जानकर भी तू इस असत् से क्या जानने की इच्छा रखता है अर्थात् अब तेरे लिये जानने को कुछ शेष नहीं बचा है, तू पूर्ण ज्ञान को प्राप्त हो चुका है।
मनुष्य पैदा होता है बड़ा होता है, पढ़ता है, नौकरी करता है, धन कमाता है, विवाह करता है, बच्चे पैदा करता है, घर बसाता है एवं इन सब में उसकी आसक्ति रहती है क्योंकि इन्हें वह अपना समझता है। इनके साथ उसकी अनेक अपेक्षायें जुड़ी रहती हैं किन्तु इस आसक्ति के होते हुये भी मृत्यु के साथ ही सब छूट ही जाते हैं। इन्हें बचाने का कोई उपाय मनुष्य के पास नहीं है। फिर नये जन्म में यही सब कुछ करता है किन्तु अज्ञानवश वह यह नहीं समझ पाता कि मेरी आसक्ति का त्याग ही ज्ञान है। अष्टावक्र जनक को यही उपदेश देते हैं कि तेरे अनेक जन्म हुये हैं, हर जन्म में तुझे राज्य, पुत्र, पुत्रियाँ, शरीर और सुख मिले हैं किन्तु वे सब तेरे आसक्त होते हुये भी नष्ट हुये हैं। ये तेरे कभी हुये नहीं हैं इसलिये तेरी आसक्ति मिथ्या है। इसी आसक्ति के कारण तुझे बार-बार जन्म लेना पड़ा एवं इस आसक्ति के कारण ही उनसे छूटने में दुःख होता है, अन्यथा दुःख का कोई कारण नहीं है। इसलिये इन पूर्व जन्मों के अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करके अब तो तू इस आसक्ति का परित्याग कर जिससे इस बार-बार जन्म लेने और दुःखों से तेरी मुक्ति हो सके।
अष्टावक्र जनक को फिर यही उपदेश देते हैं कि धन सम्पदा, काम और अच्छे कर्म जो तूने अनेक जन्मों में किये हैं और अब भी वही कर रहा है किन्तु इनसे भी तेरा मन इस संसार में विश्रान्ति को प्राप्त नहीं हुआ। यदि इनमें कहीं सुख होता, यदि इनमें आनन्द होता, यदि इनमें संतोष मिलता, यदि इनमें दुःखों का नाश होता तो इन सबको प्राप्त करके तुझे निश्चित ही शान्ति और आनन्द मिल जाना चाहिये था, किन्तु इनको पाकर भी तेरा मन विश्रान्ति को प्राप्त नहीं हुआ इसका कारण यही है कि इनमें सुख नहीं है। तू भ्रान्तिवश इनमें सुख देख रहा था। अब तो इस अज्ञान एवं भ्रान्ति का त्याग कर।
अष्टावक्र फिर कहते हैं कि तूने अनेक जन्मों तक शरीर, मन और वाणी से दुःखपूर्ण और श्रमपूर्ण कर्म किये हैं किन्तु फिर भी तेरी इनमें आसक्ति बनी हुई है जिससे तेरा जन्म-मरण का चक्र चल ही रहा है। इसलिये अब तो तू इस आसक्ति का त्याग कर जिससे तुझे शान्ति प्राप्त हो।
विज्ञान की सारी खोज जड़ प्रकृति से सम्बन्धित है। वह पदार्थ को ही सत्ता मानता है। पदार्थ की खोज में वह उसके अन्तिम तत्व विद्युत तक पहुँचा एवं उसी को समस्त सृष्टि का कारण मानता है किन्तु अध्यात्म इससे भी पार एक चैतन्य तत्व की बात कहता है कि आरम्भ में वह चैतन्य तत्व ही था। यह विद्युत जड़ है जो उस चैतन्य की ही शक्ति है। यह सम्पूर्ण सृष्टि इस शक्ति का ही फैलाव है, इसी का रूपान्तरण है। इसके सारे क्रिया-कलाप इसी जड़ प्रकृति के स्वभाव से हो रहे हैं। वह चैतन्य आत्मा कर्त्ता नहीं है, वह निर्विकार है, शुद्ध है। किन्तु उसकी उपस्थिति आवश्यक है। उसकी उपस्थिति के बिना शिव भी शव हो जाता है, मनुष्य लाश बन जाता है। सृष्टि में जहाँ भी गति है, विकास है, प्रवाह है, निरन्तरता है वह इस चैतन्य आत्मा के कारण है। जिस प्रकार चन्द्रमा की उपस्थिति मात्र से ही समुद्र में ज्वार-भाटा आता है, चुम्बक लोहे को अपनी उपस्थिति मात्र से अपनी ओर आकर्षित करता है, उसी प्रकार ईश्वरीय चेतन सत्ता व उसके चुम्बकीय आकर्षण कारण ही प्रकृति के कार्य होते हैं किन्तु वह स्वयं कर्त्ता नहीं है। यह आत्मा नित्य है, चेतन है जबकि प्रकृति अनित्य व जड़ है।
आत्मा निर्विकार है एवं प्रकृति विकारजन्य है। अष्टावक्र कहते हैं कि ये भाव और अभाव के समस्त विकार प्रकृतिजन्य हैं जो उसके स्वभाव से अपने आप हो रहे हैं जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, पानी का ठंडा करना है, गुरुत्वाकर्षण का खींचना है, विद्युत का प्रकाश व चुम्बकत्व है इस प्रकार सभी पदार्थ अपने गुण-धर्म के अनुसार कार्य करते हैं। बीज से वृक्ष बनने की क्रिया भी प्रकृतिजन्य है। इस प्रकार सृष्टि के समस्त कार्यों का संचालन प्रकृतिजन्य ही है। उस चैतन्य की मात्र उपस्थिति से ही सब होता है वह स्वयं करती नहीं है। इस प्रकार जो व्यक्ति आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो गया वह अपने को प्रकृतिजन्य समस्त कर्मों से ऊपर चैतन्य आत्मा मान कर निर्विकार और क्लेश रहित होकर सुखपूर्वक ही शांति को उपलब्ध होता है। आत्म-ज्ञान के बाद ही उसे ऐसा निश्चय होता है इससे पूर्व ऐसा मान लेना भी भ्रान्ति है। मानने से भ्रम या अज्ञान दूर नहीं होता, जानने की चेष्टा व उसमें श्रम के भाव से ही बोध होता है।
आसक्ति का कारण संसार नहीं है बल्कि स्वयं की वासना है, तृष्णा है, कामना है, कुछ प्राप्त करने की इच्छा है। स्वयं का यह स्वार्थ ही आसक्ति का कारण है। आसक्ति में दो का होना आवश्यक है। यह शरीर, मकान, स्त्री, पुत्र, सम्बन्धी आदि को हम भिन्न मानते हैं जिससे आसक्ति होती है। यदि एक ही है तो कौन किससे आसक्ति रखे। इसलिये अष्टावक्र कहते हैं कि इस सृष्टि में कही भिन्नता है ही नहीं। वही एक चैतन्य सत्ता विभिन्न रूपों में प्रकट हुई है अतः यह सम्पूर्ण सृष्टि ही ईश्वर है, सभी उस एक चैतन्य का ही विकास एवं फैलाव है इसलिये सबको बनाने वाला वह ईश्वर ही है, दूसरा कोई नहीं है। किन्तु जिसे आत्मा का अनुभव हो गया वही ऐसा निश्चयपूर्वक जान सकता है। अज्ञानी को भ्रम बना रहता है। अतः ऐसा निश्चयपूर्वक जानने वाला ज्ञानी ही शांत हो सकता है। जब उसे सम्पूर्ण सृष्टि में एकत्व का बोध हो गया तो उसकी सब आशायें, तृष्णा आदि सब जड़ से नष्ट हो जाती हैं। फिर वह कहीं भी आसक्त नहीं होता। ईशावास्य उपनिषद् भी कहता है कि ‘इस संसार में जो भी है सब ईश्वर का ही है इसलिये त्याग पूर्वक इसका भोग कर—।’ जो ईश्वर को जान लेता है कि वही सब है, जो मिला है वह भी उसी का है, जो छूटता है वह भी उसी का है तो त्याग अपने आप हो जाता है, द्वन्द्व मिट जाते हैं, अशांति मिट जाती है, आशायें मिट जाती हैं, जो मिला है, जो हो रहा है उसमें व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है फिर आसक्ति का कोई कारण नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति ही परम शक्ति व शांति को उपलब्ध होता है।
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