





किसी भी देव साधना को सम्पन्न करने के लिए स्वयं भी देवमय विचारों से युक्त होना होता है, देवाधिदेव भगवान शिव की साधना में यह बात नितान्त आवश्यक हो जाती है, क्योंकि शिव एक देवत्व से भी कहीं ऊंची भावना एवं आत्मगत स्थिति है। केवल शिव कहने से ही शिवत्व की प्राप्ति नहीं होती, यद्यपि भावना के वशीभूत होकर उनका नाम श्रद्धा और विश्वास से भक्तगण लेते ही रहते हैं।
किन्तु साधक उसको कहा जा सकता है, जो श्रद्धा व विश्वास को ग्रहण करते हुए भी उससे आगे बढ़कर शिवत्व को समझने एवं आत्मसात करने का उपाय करता है। इसी कारणवश शिव एक देव मात्र ही नही वरन आत्मगत स्थिति है। साधक ज्यों ही शिव की उपासना से आगे बढ़कर शिवत्व को समझने व आत्मसात् करने का प्रयास करता है, त्यों ही वह विष में प्रवेश कर जाता है, क्योंकि महादेव शिव का सम्पूर्ण अस्तित्व विष में ही तो निमग्न है और वे निरन्तर इसे ग्रहण भी करते हुए अमृतत्व में बदलने की क्रिया में संलग्न है। जिस प्रकार इस सृष्टि का चक्र निरन्तर गतिशील है, उसी प्रकार उनके समक्ष विष का उद्भव भी निरन्तर हो रहा है। इस संसार के चक्र में प्राय अमृत का उद्भव नहीं होता। यदि इस मंथन में अमृत मिल भी जाता है, तो जीवन के विविध विषमता रूपी राहू-केतु उन्हें लेकर चले जाते है और तब त्रण पाने का एक मात्र उपाय शिव ही शेष रह जाता है।
भगवान शिव योग-अमृत व परम आनन्द में लीन न होकर विष अर्थात् जीवन की विषमताओं में लीन हो जाते हैं। इसी कारणवश वे योगीराज एवं देवाधिदेव की संज्ञा से विभूषित है। यहीं स्वरूप सद्गुरु का भी होता है। इसी कारणवश उन्हें भगवान शिव का प्रकट स्वरूप भी कहा जाता है। स्वयं अमृतमय होते हुए भी विष में निमग्न रहना यह लक्षण केवल किसी विराट सत्ता में ही हो सकता है। इसके उपरान्त भी शिव नृत्यमय, मग्न, आनन्दित एवं संतुष्ट है।
भारतीय चिन्तन में किसी भी अन्य देव की धारणा नृत्यमग्न स्वरूप में नहीं की गयी है, केवल महादेव शिव ही इस अनोखे स्वरूप में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं और यह नृत्य भी कोई सामान्य नृत्य नहीं वरन ताण्डव है, अर्थात् दिग्-दिगान्तरों को अपनी ऊर्जा से स्पन्दन देने की क्रिया है, प्राण संयम करने की, विष के मध्य भी अमृतत्व का बोध कराने का आनन्द ताण्डव की दशा है। इसी कारणवश भगवान शिव लोक देव हैं, सहज ग्राह्य और वन्दनीय है। भगवान शिव के इसी विलक्षण स्वरूप को शास्त्रकारों ने साकार रूप में नटराज शिव की संज्ञा दी है तथा मूर्तिकारों ने उन्हें चतुर्भुज अथवा द्विभुज स्वरूप में, आनन्द के साथ, नृत्य में तल्लीन उत्कीर्ण किया है। पूज्यपाद गुरुदेव ने इस तथ्य को बार-बार स्पष्ट किया है, कि किस प्रकार मनुष्य जब उर्ध्वगामिता ग्रहण करता है, तब स्वतः ही नृत्य में लीन होने लग जाता है।
नृत्य अपने शुद्ध अर्थों में देह तत्व से आनन्द तत्व की यात्रा ही है। यही इस साधना की व्यावहारिकता है, कि विष के मध्य आनन्द युक्त रहने का सामर्थ्य विकसित कर देती है। आध्यात्मिक अर्थों में यह साधना कुण्डलिनी जागरण से सम्बन्धित है। यह अपने आप में कला, विलास, सौन्दर्य और ऐश्वर्य की भी साधना है। योग अभ्यासी साधक इस साधना के द्वारा शून्य एवं आकाश गमन की सिद्धि प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
इस साधना को आप श्रावण माह के चतुर्थ सोमवार 20 अगस्त या किसी भी सोमवार को कर सकते हैं। रात्रि दस बजे के बाद साधक स्नान आदि से शुद्ध होकर आसन ग्रहण करें पवित्रीकरण, आचमन व आसन शुद्धि सम्पन्न करें।
फिर अपने समक्ष किसी पात्र में अघोर शिव यंत्र स्थापित करें, कुंकम एवं अक्षत अर्पित कर, सोलह बिन्दु ऊँ नमः शिवाय मंत्र के साथ यंत्र पर लगायें। प्रत्येक बिन्दु अर्पित लगाते समय भावना रखें कि मुझे षोड़श कलाओं में एक-एक कर सभी कलाएं प्राप्त हो रही है। इसके उपरान्त रूद्राक्ष माला से निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप सम्पन्न करें, जप के काल में दीपक का जलना आवश्यक है।
मंत्र जप के उपरान्त दूसरे दिन समस्त सामग्री को किसी सरोवर या नदी में विसर्जित कर दें। प्रत्येक साधक को यह साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए, क्योंकि जब तक जीवन में आनन्द ताण्डव जैसी मनोदशा नहीं आती, तब तक कोई नव निर्माण सम्भव नहीं हो पाता।
पिप्पलाद महर्षि दधीचि के पुत्र थे। इन्हें भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है। पिप्पलाद का शाब्दिक अर्थ है- पीपल के पत्ते खाकर जीवित रहने वाला। देवताओं को वज्र निर्माण के लिये अपनी हडि़यां देने वाले महर्षि दधीचि के देहावसान के समय उनकी पत्नी सुवर्चा गर्भवती थी, जब उन्हें यह समाचार मिला तो उन्होंने अपना पेट चीरकर गर्भ को बाहर निकाला तथा उसे पीपल वृक्ष के नीचे रख दिया, इसके पश्चात् वे सती हो गई। उनके इस गर्भ का वृक्षों ने संरक्षण किया। आगे चलकर इस गर्भ से जो शिशु बाहर निकला वही पिप्पलाद कहलाया। पशु-पक्षियों ने इस शिशु का पालन पोषण किया तथा सोमदेव ने उसे सभी विधायें सिखाई।
पिप्पलाद के पिता दधीचि ऋषि ने जिस स्थान पर देह त्याग किया था, वहाँ पर कामधेनु ने अपनी दुग्ध धारा छोड़ी थी। अतः उस स्थान को दुग्धेश्वर कहा जाने लगा। थोड़े बड़े होने के पश्चात् पिप्पलाद उसी स्थान पर तपस्या किया करते थे, इसलिये उस स्थान को ‘पिप्पलाद तीर्थ’ भी कहा जाता है। बड़े होकर जब पिप्पलाद को पता चला कि उन्हें माता-पिता का वियोग शनि के प्रभाव से सहना पड़ा, तो उन्होंने अपने तपोबल से शनि को आकाश से नीचे गिरा दिया। शनि ने जब उनसे क्षमा याचना की तब उन्होंने शनि को यह चेतावनी देकर कि 12 वर्ष की आयु तक बालकों को भविष्य में कष्ट न पहुँचाये, पिप्पलाद ऋषि ने शनि को पुनः स्थापित कर दिया। तभी से शिव अवतार ऋषि पिप्पलाद के स्मरण, पूजन से शनि से सम्बन्धित सभी कष्ट दूर होते हैं।
साधना सामग्री- शनि यंत्र, शिव सम्मोहन माला, शिवांश गुटिका व कलावा।
यह साधना श्रावण माह के किसी भी सोमवार अथवा किसी भी माह के सोमवार को सम्पन्न कर सकते हैं।
प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें किसी पीपल के पेड़ के नीचे या किसी मंदिर प्रांगण में यह साधना सम्पन्न करना श्रेष्ठ होगा। कलावा पीपल पेड़ के चारों ओर बांधकर, पांच पीपल के पत्तों के आसन पर शनि यंत्र स्थापित करें, यंत्र के दायीं ओर शिवांश गुटिका स्थापित करें, इसके उपरान्त ऊपर दिए गये मंत्र का शिव सम्मोहन माला से 6 माला जप करें, साधना संपन्न होने के उपरान्त माला व यंत्र को अपने पूजा स्थान में स्थापित कर दें। श्रावण माह के समाप्ति पर माला व यंत्र को किसी नदी में प्रवाहित कर दें, इस साधना से शनि के प्रकोप, साढे़ साती, अढै़या आदि से साधक मुक्त होता है, साथ ही यह साधना पितृ शांति के लिये उत्तम है।
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