





मनुष्य जन्म लेते ही स्वयं को अपने परिवार-समाज के बंधन में बंधा पाता है, उसी के नियम, मर्यादाओं का उसे पूरे जीवन पालन करना पड़ता है। अधिकांश व्यक्ति इन्हीं बंधनों के आस-पास ही अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। कुछ विरले ही स्वयं से परिचित होने का प्रयास करते हैं और उनमें से दो-चार ही ऐसे होते हैं, जो पूरी जीवन यात्रा इसी रहस्य को सुलझाने में लगा पाते हैं। वर्तमान में जितने भी संत, बाबा, गुरु हैं सभी के अनुयायी, शिष्य अधिकांश-अधिकांश पूजा, जप, तप, साधना, सत्संग आदि क्रियायें केवल अपने सांसारिक सुख की पूर्ति हेतु ही सम्पन्न करते हैं।
सत्य भी यही है कि सांसारिक जीवन में अन्य विषयों पर सोचने-समझने अथवा क्रियात्मक रूप देने के लिए आज के मनुष्य के पास समय का अभाव होता है। परन्तु यदि सही ढंग से प्रयास किया जाये, तो थोड़ा समय ईश्वर स्तुति, गुरुत्व चेतना को आत्मसात करने में दिया जा सकता है।
भारतीय प्राचीन सभ्यता जो परम्परा, व्यवहार और चिंतन हमें प्रदान करती है, उसका क्षणांश भी पालन हमारे द्वारा नहीं हो पाता और शायद उस समय के अनुसार ऐसे नियम की आवश्यकता अत्यधिक रही होगी, परन्तु बदलते परिवेश में उन नियमों का पालन कर पाना सरल नहीं है। फिर भी वैचारिक शुद्धता, चिंतन हमारे जीवन के अंग बन सकते हैं और यही हमारे ऋषि-मुनियों का गौरव भी है। सदा से हमारे शास्त्रों का महत्वपूर्ण विषय चित्त की शुद्धि, विवेकशील चिंतन और सद्कर्म की प्रेरणा रही है। लेकिन वर्तमान मानव जाति में सबसे अधिक इसी का अभाव है, जीवन मूल्यों में ह्रास हम सभी चिंतनशील गुरु के अनुयायियों और उन सभी देव तुल्य ऋषि-मुनियों, गुरुओं के लिए चिंता का विषय है।
ऐसे में हमें एक ऐसे मार्ग की आवश्यकता है, एक ऐसी चेतना की आवश्यकता है, एक ऐसे चिंतन की आवश्यकता है, जो दीर्घकाल तक सद्चिंतन का मार्ग प्रशस्त करता रहे, जिसकी सहायता से हम जीवन पर्यन्त सद्गुरुदेव के बताये मार्ग पर चलते रहें, हमारी आन्तरिक चेतना सद्गुरुदेव से संस्पर्शित बनी रहे, ऋषि-परम्परा से हमारा जुड़ाव लम्बे समय तक स्थापित रह सके और यह सभी क्रियायें केवल इसलिए ना हो कि हमारे सांसारिक जीवन में बहुत अधिक कष्ट, पीड़ा, समस्यायें हैं। हमारा आत्मिक सम्बन्ध उनसे चिरस्थायित्व हो इसके लिए हमारे द्वारा साधनात्मक क्रियाओं का आश्रय होना चाहिए।
चूंकि यह संसार भव सागर है, जहां हर ओर भटकाव ही भटकाव है, यह विष का सागर है, जिसका पान यहां आये हुए हर व्यक्ति को करना पड़ता है। उसे सांसारिक कार्यों में लिप्त होना ही पड़ता है और यह संसार का नियम भी है, जिसे पूरा भी करना ही चाहिए, लेकिन जो सद्कर्म है, जो सन्मार्ग की ओर ले जाता है, वही मार्ग श्रेष्ठ है और उसी मार्ग पर चलते हुए सांसारिक कर्तव्यों का पालन करना ही उचित है। अनुचित मार्गों के चयन से कालान्तर में जीवन अनेक कष्टों का उपभोगी बनता है।
विगत कुछ वर्षों से जिस प्रकार संतों का एक अन्य स्वरूप समाज में उभर कर आया है, उससे समाज में संतो, गुरुओं के प्रति हेय दृष्टि निर्मित हुयी है, हमारे ऋषि परम्परा पर बहुत बड़ा आघात हुआ है। जो किसी भी रूप में अक्षम्य है और इन सभी कृत्यों में जो भी दोषी होगा, परम पिता परमेश्वर उसे अवश्य ही दण्डित करेगा। यह विश्वास हमारा ईश्वर के प्रति होना चाहिए। तालाब की एक मछली पूरे तालाब को गन्दी करती है यह सत्य है परन्तु दो-चार गन्दी मछलियों के कारण हम पूरे तालाब को नष्ट नहीं कर सकते, अन्यथा हम प्यासे ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेगें।
हमारे ऋषि-मुनि तपस्वी, ज्ञानी और दूरदर्शी थे, यही कारण था कि वे उस कालखण्ड में ही ऐसे दिवस का सृजन कर गए, जिससे आने वाली पीढि़यां अपनी प्राचीन सभ्यता, चिंतन, विचार को साधनाओं के माध्यम से आत्मसात कर सकें और समाज के दुष्प्रवृत्तियों के मध्य भी स्वयं को स्वच्छ, निर्मल, शुद्ध बनाये रख सके।
ऋषि पंचमी दिवस कोई सामान्य दिवस ना होकर समस्त ऋषि परम्परा का तेजस्वी चेतनामय दिवस है, जिसमें ऋषियों की विराट चेतना का समावेश है, उनकी तपस्या की शक्ति और ऊर्जा की तेजस्विता है। वह संस्कार है जिसके माध्यम से इस संसार सागर में भी स्वयं की बुद्धि को सन्मार्ग की ओर अग्रसर किया जा सके।
वर्तमान समय के बदलते परिवेश में यह आवश्यक हो गया है कि अब इस साधना की गंभीरता को साधकों के मध्य स्पष्ट किया जाये, इसके मूल चिंतन से साधकों को परिचित कराया जाए, क्योंकि जिस प्रकार सामाजिक आलोड़न- विलोड़न चल रहा है, ऐसे परिवेश में केवल वे ही सुरक्षित बच सकेंगे, जिनके भीतर गुरु की चेतना की ज्योति जाज्वल्यमान होगी, जिनके हृदय में ऋषि, महर्षि, ब्रह्मर्षि, सप्त ऋषि आदि की चेतना का संचार और उनकी कृपा होगी। ईश्वर महान है, वह कारुण्य रूप भी है, उसमें दयालुता है, सभी के प्रति समता भाव भी है, परन्तु इस संसार में प्रथम देव, प्रथम सहयोगी, प्रथम मार्गदर्शक, आपकी चिंता करने वाला प्रथम व्यक्ति गुरु ही है, गुरुत्व चेतना से आपूरित व्यक्तित्व ही है, वह प्राचीन ऋषि परम्परा ही है। इन्हीं के ज्ञान, चेतना, ऊर्जा, तपस्या से यह संसार और संसार में रहने वाले लोग स्थिर हैं, गतिशील है। इन्होंने ही संसार को शक्तिमय, ऊर्जामय बनाये रखा है।
जो भी लोग जीवन के प्रति गंभीर और चिंतनशील हैं, जिनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य केवल और केवल सांसारिक सुखों का उपभोग करना नहीं है, जिन्हें ऐसा लगता है कि उनका जीवन ऋषित्व चेतना से आप्लावित होना चाहिए और वे दीर्घ काल तक इसी परम्परा, संस्कार, चेतना से युक्त होकर पूर्णता ऋषिमय, गुरुमय होने की आकांक्षा रखते है। उन्हें यह साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
क्योंकि संसार में आये हैं, तो यह पता नहीं कब-कौन सी व्याधि घेर ले और आपका गुरु से सम्पर्क अवरुद्ध हो जाये, व्याधि केवल शारीरिक ही नहीं होती, व्याधि का एक और रूप होता है, जो वैचारिक है, जो बुद्धि के अधीन है और इस संसार में रहते हुए, यहां के दूषित विचारों को सहते-सहते किसी की बुद्धि भी सद्चेतनावान नहीं रही और यदि है भी तो कालान्तर में कब वैचारिक व्याधियां घेर लें कुछ कहा नहीं जा सकता है। इसलिए ऋषित्व चेतना को आत्मसात करना जीवन के लिए आवश्यक है।
ऋषि परम्परा का अनुसरण करने का तात्पर्य यह नहीं है कि आप जटा-जूट रखकर जंगल चले जायें या हर समय पूजा -पाठ करते रहें, ऋषित्व चेतना का तात्पर्य शरीर के भीतर मन में, चित्त में एक शुद्धि का भाव है, एक ऐसी ऊर्जा का भाव है, चेतना का भाव है जो लम्बे समय तक आपको गुरुत्व चेतना से आप्लावित रखें, वह मार्ग जो हमारा है, उस पर हम चलते रहें, जीवन में भटकाव की स्थिति ना आये और इस भटकाव से बचने की क्रिया इस साधना के माध्यम से स्पष्ट कर रहा हूं।
जो प्रत्येक शिष्य, साधक-साधिका को सम्पन्न करनी चाहिए और इस साधना का तात्पर्य केवल यहीं तक सीमित नहीं है, यह एक ऐसी साधना है, जो जीवन की अनेक समस्याओं में जूझने की, लड़ने की, संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करती है, सम्पूर्ण जीवन को भौतिक व आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से सफल बनाने की क्रिया होती है इस साधना के माध्यम से। आध्यात्म सांसारिक कर्तव्यों से मुंह मोड़ने की प्रेरणा नहीं देता, ना ही आध्यात्म कभी कर्तव्यों के निर्वाह में बाधा बनता है आध्यात्म सांसारिक जीवन में सहायक होता है।
आध्यात्म वह जीवट शक्ति देता है, जिससे जीवन को सहज और सरल बनाया जा सके। आध्यात्म का सहारा लेकर साधक अपने सांसारिक जीवन के साथ-साथ आध्यात्मिक जीवन के उत्थान की ओर ध्यान दे पाता है और यही इस साधना का मूल चिंतन है कि अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए आध्यात्मिक जीवन का उत्थान किया जा सके।
साधना विधान
ऋषि पंचमी या किसी भी गुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर पीले आसन पर पूर्व की ओर मुंह कर बैठ जायें, फिर अपने सामने एक ताम्रपात्र में सप्तर्षि सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र, ऋषित्व शक्ति गुटिका व आत्म चैतन्य माला स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा भाव से पूजन करें। फिर सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानंद जी और समस्त ऋषि परम्परा का आवाहन करें। समस्त गुरुओं का चरण वंदन करते हुए उनके दिव्य तपस्यांश की चेतना प्राप्ति और आत्मिक जुड़ाव की कामना व्यक्त कर जीवन में सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए सन्मार्ग की प्राप्ति हेतु जीवट शक्ति की मांग करें। पश्चात् इस मंत्र का 11 माला मंत्र जप करें।
प्रथम दिवस 11 माला मंत्र जप करने के बाद कार्तिक पूर्णिमा तक नित्य 1 माला मंत्र जप करें, फिर सद्गुरुदेव संन्यास दिवस कार्तिक पूर्णिमा दिवस सम्पूर्ण साधना विधान पुनः दोहरायें, पश्चात् सभी सामग्री किसी पवित्र नदी या गुरु चरणों में अर्पित करें।
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