





फर्क केवल इतना ही होता है- कुछ लोग जिंदगी में आयी मुश्किलों से टूट जाते हैं, उनसे हार जाते हैं और कुछ इसे चुनौती मानते हुए बाधाओं की आंखों में आंखें डालते हैं, मुस्कुराते हैं तथा मैदान में और मजबूती से डट जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर वे जीतते हैं और समाज में, परिवार में प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं।
यह संसार ऐसे ही लोगों की कहानियों से भरा पड़ा है, हमारे आस-पास ना जाने कितने ही ऐसे लोग हैं, जिन पर मुसीबतों के पहाड़ टूटते देखा गया होगा, सहायता के लिए दरवाजे बंद होते देखे होंगे, लेकिन आपने यह भी देखा होगा कि उनके जीवट में, उनकी इच्छा में रंच मात्र खरोच नहीं पड़ी, वे चट्टान की तरह अपने स्थान पर अडिग खड़े रहें। एक गांव का मामूली किशोर था हेनरी फोर्ड। खेतों में काम करना पड़ता था। ज्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं हो सकी थी।
मशीनों में खास रुचि थी, जबकि पिता को ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। 12-13 वर्ष की उम्र में गांव के सबसे बेहतर घड़ी साज बन गए। पिता से अनबन ज्यादा रहने लगी, तो खाली हाथ शहर आ गए। एक फैक्ट्री में सहायक मैकेनिक की नौकरी मिल गई। पैसे बहुत मामूली थे। दिन भर फैक्ट्री में काम करते और रात भर मशीनों पर ठोका-पीटी करते। सारे पैसे मशीनों के लिए सामान खरीदने में खर्च कर देते। वैसे उनको उस जमाने में बहुत कम पैसे मिलते थे। पत्नी भी उनके रंग-ढंग से परेशान हो गई। उनके घर से रात में जिस तरह से ठोका-पीटी की आवाजे आतीं, तो लोग उन्हें पागल समझने लगे। कोई उनसे बात करना पसंद नहीं करता था। कोई कुछ भी समझता रहे, फोर्ड पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। अजीब से दिन थे ये उनके, दिन-रात जमकर काम करने के चलते स्वास्थ्य खराब रहने लगा। जब वे अपनी खुद की मोटर बनाने पर काम करने लगे, तो नौकरी भी छूट गई। कुल मिलाकर न तो उन्हें पिता पसन्द करते थे, न पड़ोसी और न फैक्ट्री में सहयोगी। सभी को लगता था कि उनके दिमाग का स्क्रू ढ़ीला है। कई साल वे यूं ही तिरस्कार में जीते रहे।
फैक्ट्री में उनके हुनर की तारीफ तो होती थी, लेकिन हर किसी की शिकायत थी कि वे न जाने कहां खोए रहते हैं। वहीं फोर्ड अपनी ही धुन में मस्त रहते थे। उनकी जिंदगी उस कमरे में सिमटती जा रही थी, जिसे उनकी वर्कशाप कहना ज्यादा ठीक होगा। उनको सबने कहा कि क्यों अपनी जिंदगी खराब कर रहे हो, मशीनों के साथ ज्यादा पागलपन छोड़ो, क्योंकि इससे उन्हें कोई फायदा तो हो नहीं रहा था, अगर इतनी मेहनत वे अपने कारखाने में करते, तो बहुत तरक्की कर जाते। हालात उल्टे ही उल्टे थे, लेकिन कोई उन्हें डिगा नहीं पाया। आर्थिक तंगहाली भी नहीं। शुक्र है कि इन हालात में उनकी पत्नी ने उनका भरपूर साथ दिया। फिर एक दिन वो आया, जब उन्होंने जो मोटर बनाई, उसे दौड़ाकर भी दिखाया। बस यही उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था, यहां से सब कुछ बदल गया। उन्होंने दुनिया की सबसे सस्ती कारें बनायीं। हर कोई इसे खरीद सकता था, बाद में उन्होंने दुनिया भर को उद्योगों को ऑटोमेशन का मंत्र भी दिया। जब उनकी मृत्यु हुई, तो उस समय वे दुनिया के सबसे समृद्ध और धनी व्यक्ति थे।
कहा जाता है कि वे इरादे के बड़े पक्के इंसान थे। इस वास्तविक कहानी से सिद्ध होता है कि जो विपरीत हालात में धैर्य और खुदी को बुलंद रखता है, उसके रास्ते से बाधाएं हटती ही हैं, भले ही देर लग जाए। अगर पत्थर पर लगातार रस्सी की रगड़ से निशान उभर सकते हैं, तो अपार संभवानाओं से भरी इस दुनिया में इंसान क्या नहीं कर सकता ? यहां सभी के लिए पर्याप्त अवसर और पर्याप्त रास्ते हैं। अक्सर हम बाधाओं से तब टकराते रहते हैं, जब सही रास्ते की तलाश कर रहे होते हैं और सही रास्ता मिलने पर हमारे पैर खुद ही आगे बढ़ने लग जाते हैं। लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि अक्सर इस तलाश में ही बहुत सारे लोग निराश हो जाते हैं, धैर्य खो देते हैं और किस्मत को कोसने लगते हैं।
एक विचारक का कहना- जब तक आप जिंदा हैं तब तक सब कुछ संभव है, असंभव कुछ भी नहीं। सफल लोग अक्सर कहते हैं कि यदि सफल होना है तो संकल्प को मजबूत रखना होगा। ये भी सत्य है कि जिन्हें जल्दी और बिना परिश्रम के सफलता मिलती है। उन्हें वह उतनी ही जल्दी गंवा भी देते हैं। उनके लिए ये स्थायी नहीं हो पाती, क्योंकि सफलता तभी ठहरती है, जब आप में कुछ साबित करने के तत्व हों। सफल होने के लिए अपनी अपेक्षाओं को कम करने की भी आवश्यकता होती है। अपेक्षाओं की गठरी जितना दूर हो, उतना ही अच्छा है।
आप जितना सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा मजबूत हैं कई सारे लोगों को लगता होगा या आप कभी-कभार सोचते होंगे कि आप इतना दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकते। आपको लगता है कि आपने सब कुछ कर लिया, लेकिन स्थिति नियंत्रण से बाहर है। किसी दिन एकान्त में इसका जवाब स्वयं से पूछिये- जवाब में आप स्वयं महसूस करेंगे कि आपमें अभी और भी संभावनायें हैं। कहीं कोई कसर रह गई है और यही वो समय है, जब आप अपने सौ फीसदी के लिए तैयार हो जायेंगे और फिर परिणाम एक नये ढंग से सामने आएगा।
हम सभी से झूठ बोल सकते हैं, लेकिन अपने आप से नहीं। इसलिए सारे प्रश्न अपने आप से पूछिये कि क्या आप वास्तव में अपने कार्यों से संतुष्ट हैं? यदि आप अपना सौ फीसदी दे रहें हैं और वांछित परिणाम नहीं मिल रहा तो भी हताश होने की जरूरत नहीं। अगर आप अपने कार्य से संतुष्ट हैं और आपको लग रहा है कि आप सौ फीसदी दे रहें है तो निरन्तर कार्य करते रहिए- मार्ग मिलेगा, दरवाजा खुलेगा, कभी-कभी जब दरवाजा ज्यादा मजबूती से बंद हो या उस पर गहरी जंग लगी हो तो खुलने में अधिक समय और परिश्रम की आवश्यकता होती है।
यह परिश्रम आपको निश्चित रूप से एक दिन सफल बनायेगी। नूतन वर्ष को पूर्णरूपेण मंगलमय, जाज्वल्यमान, पॅाजिटिव एनर्जी, नूतन उत्साह, सर्व सफलता के भावों की प्राप्ति हेतु छत्तीसगढ़ प्रांत के बिलासपुर में साधनात्मक शिविर 29-30-31 दिसम्बर को सपरिवार आगमन से ही निश्चिन्त रूप से उक्त स्थितियों की प्राप्ति का प्रादुर्भाव प्रारम्भ हो सकेगा क्योंकि जिस भाव-चिंतन से कार्य प्रारम्भ करते हैं तो वह उसी चेतना से पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। इस दिव्य शिविर में साधना, पूजन, दीक्षा, हवन, अंकन और अनेक-अनेक दैवीय चेतनामय क्रियाओं द्वारा अपनी जीवट शक्ति में, आत्मबल में वृद्धि कर अपनी कल्पनाओं, मनोकामनाओं को सिद्ध करने के लिए व नूतन वर्ष के प्रत्येक क्षण को आनन्द युक्त निर्मित कर सकेंगे। पुनः नई ऊर्जा के साथ खड़े हो जाईये और अपने कदम सफलता प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ाईये निश्चित रूप से सद्गुरुदेव-माता भगवती की चेतना शक्ति, पूज्य सदगुरुदेव का आशीर्वाद, दैवीय चेतना और आपकी अपनी आत्म शक्ति इन सभी के माध्यम से आप अपने जीवन में सर्व सुख-समृद्धि, योग-भोग की स्थितियों से युक्त हो सकेंगे।
जीवन में सफल वही लोग होते हैं जो विपरीत परिस्थिति में भी बाधाओं की आंखो में आंखें डाल कर संघर्ष के मैदान में और अधिक मजबूती से डट जाते हैं और ऐसे ही लोग अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जीवन की महाभारत में विजय प्राप्त करते हैं।
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