





शैलपुत्री ने ब्रह्मचारिणी और चन्द्रघण्टा का स्वरूप धारण करके किशोरावस्था में शिव को सौभाग्य शक्ति पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें दर्शन दिये, तपस्या के समय उनकी मूर्ति ध्यान मुद्रा गंभीर और परम शांतमय थी, उनकी शांत मूर्ति के कारण ही ऋषियों ने उन्हें कुष्माण्डा के नाम से सम्बोधित किया। कार्त्तिकेय के जन्म के बाद पार्वती को स्कन्दमाता के नाम से ख्याति मिली, लोक मंगल की स्थापना के लिए भगवती ने अपने आपको अनेक रूपों में प्रकट किया, जिससे इन्हें कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के नाम से भी ख्याति मिली।
मानव संसार में सुख और शांति से जीना चाहता है, अतः इस संसार के भौतिक और दैविक विघ्नों के विनाश के लिए भगवती की आराधना आवश्यक है, ब्रह्मचारिणी की उपासना कैवल्यदायिनी शक्ति के रूप में की जाती है। इन्हें ब्रह्मच्युत और शंकर आदि देवों द्वारा वन्दित भावातीत और शुद्ध निष्कला देवी के रूप में भी प्रसिद्धि प्राप्त है।
यह जीवन कामना परक जीवन है और कामना सिद्धि के लिये नवरात्रि से बढ़कर कोई श्रेष्ठ मुहुर्त नहीं है। दुर्गा शक्ति तो मां भगवती आद्या शक्ति हैं, जिनका तो पूजन हमें निरन्तर करना ही चाहिये। शक्ति स्वरूपा सर्वप्रदायिनी माँ का आशीर्वाद संतान को निरन्तर चाहिये ही, साथ ही जीवन में कामनाओं की पूर्णता होना आवश्यक है, तब ही जीवन पौरुषमय हो पाता है।
भगवती आद्याशक्ति का ब्रह्मचारिणी स्वरूप अनंत शक्तिदायिनीमय है। इनके इस स्वरूप की साधना से साधक में कर्मठता, ज्ञान, वर्चस्व, अटूट श्रद्धा, शक्ति, प्रज्ञता, बुद्धिमत्ता की प्राप्ति होती है। जीवन के विपरीत परिस्थितियों में भी साधक का मन कर्तव्य निष्ठा से परिपूर्ण रहता है। ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ ही है- ब्रह्म स्वरूप में श्रेष्ठमय होना और चारिणी अर्थात् श्रेष्ठता की प्राप्ति के लिये क्रिया से युक्त होना।
माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप खिलते हुये कमल जैसा है, जिसमें ज्योर्तिंमय प्रकाश उदित हो रहा है। ये शांत, गंभीर और निमग्न तप में लीन रहती हैं। इनके मुखमंडल पर तप के कारण अद्भुत तेज और कांति रहती है। माँ ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्षमाला (जप माला) और बायें हाथ में कमण्डल है। ये आद्या शक्ति साक्षात् ब्रह्मत्व स्वरूपा है। माँ ब्रह्मचारिणी गौरवर्णा है तथा इनके देह से हवन की अग्नि प्रज्ज्वलित हो रही है। इन्होंने धवल रंग के वस्त्र धारण किये हुये हैं, माँ ने कमल को ही अपना श्रृंगार बना लिया है, इनके कंगन, कड़े, हार, कुण्डल आदि आभूषण स्वरूप में कमल ही विद्यमान है।
ब्रह्मचारिणी शक्ति साधना सम्पन्न् करते समय साधक को अपना ध्यान स्वाधिष्ठान पर केन्द्रित करना चाहिये। इस साधना में स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान लगाने से साधक अपनी काम वासना पर नियंत्रण कर पाता है, साथ ही इसी चक्र से विषय-वासना आदि पर नियंत्रण संभव होता है। ब्रह्मत्व शक्तियों से अभिभूत होता है।
अर्थात् सभी स्वरूपों में शक्ति प्रमुख है और जीवन बिना शक्ति के मृत समान है। इसलिये निरन्तर देवी शक्तियों की उपासना करने से ही जीवन में कर्मठता आती है।
ब्रह्मचारिणी शक्ति साधना का तात्पर्य अंगारक अर्थात् मंगल ग्रह से है। कालपुरुष सिंद्धात अनुसार कुण्डली में मंगल का सम्बन्ध प्रथम और आठवें भाव में होता है। अतः माँ ब्रह्मचारिणी की साधना से साधक की बुद्धिमत्ता, आचरण, दैहिक सुख, भोग, निष्ठा, स्वास्थ्य, आयु और ज्ञान की प्राप्ति होती है। जो भी जातक मंगल ग्रह से पीडि़त हों, उन्हें ब्रह्मचारिणी साधना से उच्चकोटि का लाभ मिलता है। साथ ही ओज, रूपमय सौन्दर्य, तेज की वृद्धि होती है व बुद्धि में कुशाग्रता के लिये भी जानी जाती है, अर्थात् विद्यार्थी वर्ग, कम्पटीशन की तैयारी कर रहे छात्र और कैरियर से सम्बन्धित अन्य क्षेत्रों में भी यह साधना अचूक लाभकारी है।
माघीय नवरात्रि के शक्ति दिवसों व भगवान श्रीकृष्ण के चौसठ कला पूर्ण सौन्दर्यमय बंसत पंचमी युक्त दिवसों में यह साधना अवश्य ही करनी चाहिये, जिससे जीवन में योग और भोग की स्थितियां प्राप्त होती हैं।
जीवन का सीधा सरल भाव-चिंतन यही है कि निरन्तर वृद्धि के लिए अपने आपको साधना आवश्यक है। इस हेतु कर्मभाव, चिंतन व स्वयं के प्रति श्रद्धा और विश्वास होना आवश्यक है और इस तरह के भाव-चिंतन से ही जीवन में सामान्य स्थिति से उच्चता को प्राप्त किया जा सकता है।
05 फरवरी नवरात्रि दिवस या बंसत पंचमी 10 फरवरी अथवा किसी भी मंगलवार-रविवार को ब्रह्म बेला में स्नान कर सफेद आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। सफेद धोती धारण कर लें। सद्गुरुदेव का पंचोपचार पूजन कर साधना में सफलता की प्रार्थना करें। अब अपने सामने पीले आसन पर चावल की ढ़ेरी आद्या शक्ति नवदुर्गा यंत्र स्थापित कर यंत्र के मध्य केन्द्र पर रक्त चंदन से तिलक करें, यंत्र के दायीं ओर ब्रह्मचारिणी जीवट व ब्रह्मर्षि माला स्थापित कर कुंकुम, अक्षत, केसर, पुष्प से पूजन करें। पश्चात् ब्रह्मचारिणी का आवाहन करें-
आवाहन पश्चात् निम्न मंत्र का 2 दिन तक 5-5 माला जप करें-
साधना के बाद जीवट को 9 दिन तक धारण करें व नित्य निम्न मंत्र का 10 मिनट जप करें। पश्चात् सभी सामग्री को सफेद कपड़े में लपेट कर जल में विसर्जित कर दें।
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