





शिव ही नित्य स्थायी सत्ता व सर्वव्यापी हैं तथा शिव स्वयं शक्तिमयक हैं, अतः शिव शक्ति के द्वारा ही कार्य करते हैं, वहीं शक्ति शिव रूपी विशुद्ध चेतना जड़ तथा प्रकृति के बीच का एक माध्यम है, जिनको उमा, ईश्वरी, महामाया, पार्वती आदि नामों से पुकारा जाता है। शक्ति महोदव की अनुरूप परिणति ही है, न कोई स्वतंत्र सत्ता। प्रकृति के सृष्टि कर्त्ता, विकास कर्त्ता व संहार कर्त्ता आदि सम्पूर्ण नियमों की कार्य प्रणाली उसी सत्ता के आधार पर अनुप्राणित है। जब मन शिव सत्ता से सत्तावान हो जाता है, तो प्रकृति के सम्पूर्ण नियम उसके सहयोगी बनकर कार्य करते हैं। भक्त का योग क्षेम स्वयं महादेव ही वहन करते हैं तथा उस जीवधारी का जीवन उस समष्टि प्रकृति से पोषित होता है।
समुद्र मंथन से उत्पन्न काल-कूट विष का पान करना भगवान शिव के परम दयालुता, करुणा और परोपकारिता का ही स्वरूप है। भगवान शिव की यह रूप जिसे नीलकंठ महादेव कहा गया है, जो जीवन के समस्त विषों का पान करने वाले एक मात्र देव हैं और इनकी कृपा दृष्टि से ही जीवन में अमृत की प्राप्ति होती है।
भक्ति करने से अन्य देवता इतने शीघ्र प्रसन्न नहीं होते, जितने शीघ्र भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं और साधकों के दुखों का निवारण कर उसे भय मुक्त जीवन प्रदान करते हैं, इसीलिए उन्हें भोले-भंडारी भी कहा जाता है।
माता पार्वती, शक्ति स्वरूप जगदम्बा है, यही माता गौरी स्वयं अन्नपूर्णा, लक्ष्मी स्वरूप हैं, शिव की पूजा साधना करने से लक्ष्मी तत्व की पूर्णता से प्राप्ति होती है। पराम्बा लक्ष्मी गौरी सभी एक ही शक्ति के मूल स्रोत हैं। माता गौरी सौभाग्य शक्ति स्वरूपिणी हैं, जिससे इनकी उपासना द्वारा गृहस्थ जीवन के अधिकांश कार्य पूर्ण होते हैं।
भगवान शिव-माता गौरी की साधना गृहस्थ साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि भगवान शिव समस्त बाधाओं का निराकरण करने में समर्थ हैं। पूर्णतः निर्लिप्त और निराकार होते हुए भी भगवान शिव पूर्ण गृहस्थ हैं, इसी कारण एक और जहां वे योगियों के इष्ट हैं, वहीं दूसरी ओर गृहस्थों के भी आराध्य देव हैं। भगवान शिव की आराधना प्रत्येक वर्ग करता है- गृहस्थ साधक इस कामना के साथ, कि उसे पूर्ण रूप से गृहस्थ सुख प्राप्त हो सके, स्त्रियां अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए, कन्याएं श्रेष्ठ पति की प्राप्ति के लिये, वहीं दूसरी ओर योगी शिवत्व प्राप्ति के लिए उनके ब्रह्म स्वरूप की आराधना करते हैं।
महा शिवरात्रि पर्व शिव-शक्ति का पूर्ण वरद हस्त रूपी आशीर्वाद् प्राप्ति का दिवस है। इस दिवस पर पूजा, साधना, अभिषेक सम्पन्न करने से भगवान शंकर सभी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं। जीवन में शिव-शक्ति तत्व प्राप्ति के लिये इस विशिष्ट दिवस पर सभी साधक, साधिका को विशेष साधनायें सम्पन्न कर अपने रोम-रोम में शिवत्व चेतना को आत्मसात करना चाहिये। शिवरात्रि मात्र एक दिवस अथवा पर्व नहीं है, यह क्षण जीवन के सर्व सुखमय, अनुकूलताओं से युक्त होने का दिवस है। जीवन को अभय प्रदान करने वाले, आरोग्यता देने वाले एकमात्र शिव हैं, इसीलिए उन्हें मृत्युंजय भी कहा जाता है।
सांसारिक जीवन में मलिन और दरिद्रता पूर्ण स्थितियों से निजात पाने और पराशक्ति गौरी स्वरूप लक्ष्मी के मूल तत्व की प्राप्ति शिव-गौरी आराधना, उपासना से ही संभव है। आप सुख, स्वास्थ्य, धन, मान-सम्मान या आत्म उद्धार जो कुछ भी चाहें वह शिव-शक्ति ही पूर्णता से प्रदान कर सकते हैं।
मंत्र जप, पूजा, ध्यान, साधना आदि का आश्रय लेने पर जीवन में अत्यन्त श्रेष्ठमय स्थितियों की प्राप्ति होती है। इसी हेतु महाशिवरात्रि के पावन दिव्य महापर्व पर गृहस्थ जीवन में आवश्यक विशिष्ट साधनायें प्रकाशित की जा रहीं है। साधक अपने मनोभावों के अनुरुप एक-दो अथवा सभी साधनायें एक ही दिन में सम्पन्न कर सकते हैं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सांसारिक जीवन में इस तरह की साधनाएं निरन्तर सम्पन्न करते रहना चाहिये, जिससे गृहस्थ जीवन में अनुकूल स्थितियों में निरन्तरता बनी रहती है और साधक दिन-प्रतिदिन श्रेष्ठता का वरण करता हुआ अपने जीवन को सर्व सुखमय बनाये क्रिया पूर्णता से सम्पन्न कर पाता है।
आज के समय में संतान सुख के मायने बदल गये हैं, संतान सुख केवल संतान प्राप्ति तक सीमित नहीं रह गया है। हम पहले के समय में किसी भी तरह संतान का जन्म होना ही संतान सुख माना जाता था, क्योंकि पहले के लोग अपने माता-पिता की उपेक्षा नहीं करते थे। परन्तु बदलते परिवेश में स्थितियां बिल्कुल बदल गयी हैं। अब संतान प्राप्ति से अधिक अपने संतान से जुड़े रहना और अपने संतान द्वारा उचित मान-सम्मान, प्रेम मिलना ही दुष्कर हो गया है।
आज के वातावरण में समाज में बहुत ही तेजी से माता, पिता की उपेक्षा करने वाले संताने की भरमार लगती जा रही है। संतान किसी भी रूप में हो पुत्र हो अथवा पुत्री दोनों में ही यह प्रवृत्तियां घर करने लगीं है। पुत्र से जहां उपेक्षित होने का भय बना रहता है, वहीं पुत्रियों द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा पर आघात होने का भय होता है। समाज के बदलते इस परिवेश में स्वयं को सशक्त और साधनात्मक शक्तिमय ऊर्जा से युक्त होना अति आवश्यक है। अन्यथा जीवन का अन्तिम पड़ाव अत्यन्त कष्टकारी हो जाता है और सम्पूर्ण जीवन जो कष्ट नहीं होता है, वह जीवन के अन्तिम पड़ाव में सहन करने के लिये व्यक्ति विवश हो जाता है। इस हेतु साधक को अभी से अपने संतान में ऐसे सुसंस्कारमय बीज का रोपण करना चाहिये, जिससे वह स्वयं का और अन्यत्र अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सके।
इस साधना से साधक अपने जीवन को पूर्ण रूप से सकारात्मक बनाने के लिये जीवन के नकारात्मक पक्षों पर प्रहार कर उन्हें अपने अनुकूल बनाने में समर्थ हो जाता है। उसके संतान सभी सुसंस्कारों से युक्त ज्ञान, बुद्धि, बल शक्ति, वाक्चातुर्ता के साथ उनके आज्ञा पालन की भावना में वृद्धि होती है। जिससे वास्तविक रूप से पूर्ण गृहस्थ सुख की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें, सामने पीले आसन की चौकी पर गजानन कार्तिकेय शक्ति जीवट स्थापित कर पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें, पश्चात् भगवान शिव-गौरी से सर्व संतान सुख की प्रार्थना कर स्वर्ण गौरी संतान सुख प्राप्ति माला से 3 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप पश्चात् जीवट अग्नि में प्रज्ज्वलित कर दें, जिससे संतान में व्याप्त कुसंस्कार भस्मीभूत हो सके और माला स्वयं एक माह तक धारण रखें, पश्चात् किसी पवित्र नदी, सरोवर में विसर्जित कर दें।
धन-ऐश्वर्य, सुख-सम्पन्नता, सम्मान आदि आज के भौतिक जीवन के ऐसे तत्व हैं, जिनके बिना जीवन के दो कदम भी तय नहीं किये जा सकते, पग-पग पर लक्ष्मी की सर्वपरिता है। अधिकांश सांसारिक कार्यो की पूर्ति धन द्वारा ही संभव हो पाती है। निर्धन व्यक्ति को समाज में असहाय, निर्बल माना जाता है, समाज उसी की पूजा करता है, जो सम्पन्न हो, बातें उसी की सुनी जाती हैं जो हर तरह से सक्षम हो, समाज में सम्मान उसी को मिलता है जिसके वैभव में कोई कमी ना हो।
इसीलिये सांसारिक जीवन में निरन्तर धन आगमन की साधनात्मक साधनायें सम्पन्न करनी चाहिये। भगवान शिव के कुबेराधिपति स्वरूप की साधना से साधक को रावण के समान अतुलनीय धन, ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति होती है। क्योंकि लक्ष्मी अपने श्री स्वरूप में भगवान शिव के साथ अखण्ड रूप से विद्यमान है। भगवान शिव के इस स्वरूप की आराधना, साधना से जीवन में लक्ष्मी के साथ आरोग्यता, सौभाग्य शक्ति और संतान सुख की भी कामना पूरी होती है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही यह साधना लक्ष्य प्राप्ति के लिये भी निरन्तर क्रियाशील बनायें रखती है और उच्च सफलताओं से जीवन युक्त होती तथा पूर्ण शिव तत्व की प्राप्ति होती है और जीवन की सभी चिन्ताओं का हरण होता है।
महाशिवरात्रि की रात्रि 10 बजे स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर बैठ जायें, सामने धनदा यंत्र व शिवोहम गुटिका स्थापित कर कुंकुम से तिलक करें, पश्चात् दीपक जलाकर अघोर शक्ति माला से निम्न मंत्र की 3 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप पश्चात् शिव आरती करे, सामग्री किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दें।
जीवन की तीन महाशक्तियां इच्छा, ज्ञान और कर्म का पूर्ण प्रभाव मनुष्य के प्रारब्ध पर निर्भर होता है। जिसे भाग्य कहा गया है, जब ज्ञान, कर्म और भाग्य का संयोग होता है तो व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन में बाधाओं से मुक्ति पाकर भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों पक्षों को उज्ज्वल कर लेता है। जीवन तो सभी व्यक्ति जीते हैं लेकिन भाग्य का संयोग सभी के साथ नहीं बनता। जीवन में अनेक पक्ष होते हैं, प्रत्येक पक्ष को साध लेना सरल कार्य नहीं होता है। एक स्थिति में सफलता मिलने के बाद दूसरी स्थिति में सफलता पाने की चुनौती सामने आती है, जिनकी पूर्ति करना कोई दोष युक्त कार्य भी नहीं। जीवन में धन प्राप्ति, स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख, शत्रु बाधा निवारण, राज्य सम्मान, विदेश यात्रा योग, संतान सुख इत्यादि ऐसे चौदह रत्न हैं, जिनकी प्राप्ति से जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है। जिसे सर्व दुर्गति नाशक के नाम से वर्णित किया गया है, जिसके द्वारा जीवन की प्रारम्भिक स्थितियों को सुधारने के साथ ही साथ जीवन की भावी योजनाओं की पूर्ति भी हो सके।
इस साधना की मूलशक्ति मां गौरी लक्ष्मी हैं, क्योंकि उन्हें सौभाग्य शक्ति दायिनी कहा गया है और सौभाग्य के जाग्रय होने पर कर्म प्रभाव प्रकाशिनी लक्ष्मी तत्व पूर्ण रूप से सक्रिय हो पाता है। इस साधना में माता गौरी को आधार बनाकर सर्व दुर्गति नाशिनी की क्रिया पूर्ण की जाती है। जो अपने वरदायिनी स्वरूप में जीवन को धन, ऐश्वर्य, सुख-सम्पन्नता, संतान सुख, कार्य-व्यापार वृद्धिमय चेतना से आप्लावित करती है। एक प्रकार से यह साधना महा-लक्ष्मी स्वरूप में अपने एक हजार आठ वर्णित स्वरूपों के साथ पूर्ण कृपालु हो जाती है और विशेष साधनात्मक रूप से उनको चिर स्थायित्व किया जा सकता है।
महाशिवरात्रि की रात्रि 8 बजे के बाद इस साधना में प्रवृत्त हों, सामने पीले आसन पर सर्व कार्य सफलता अघोर सिद्धि यंत्र व दुर्गतिनाशिनी गुटिका स्थापित कर घी का बड़ा दीपक प्रज्ज्वलित करें और फिर यंत्र, गुटिका का कुंकुम, अक्षत, पुष्प एवं नैवेद्य से पूजन सम्पन्न कर निम्न मंत्र का सर्व सौभाग्य शक्ति माला से 5 माला मंत्र जप करें।
मंत्र जप उपरान्त शिव व दुर्गा आरती सम्पन्न कर प्रार्थना पूर्वक स्थान छोड़े। सभी साधना सामग्री किसी भी पवित्र, शुद्ध नदी, सरोवर में विसर्जित कर दें अथवा गुरु चरणों में अर्पित करें। जीवन की दुर्गतियों के विनाश और सर्व सौभाग्य प्राप्ति की यह साधना विशिष्ट फल प्रदायक है, इस साधना को किसी भी आयु-वर्ग का कोई भी साधक या साधिका सम्पन्न कर सकते हैं।
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