





यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शाप देते हुए कहा- रे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राज लक्ष्मी से सम्पन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिए जाओं आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जायेगी और यह तुम्हारा वैभव भी श्रीहीन हो जायेगा।
इतना कहकर दुर्वासा ऋषि शीघ्र ही वहां से चल दिये। श्राप के प्रभाव से इन्द्रादि सभी देवगण एवं तीनों लोक श्रीहीन हो गये। यह दशा कर इन्द्रादि देवता अत्यंत दुःखी हो गये। महर्षि का शाप अमोघ था, उन्हें प्रसन्न् करने की सभी प्रार्थनायें भी विफल हो गयीं। तब असहाय, निरुपाय, दुःखी देवगण, ऋषि-मुनि आदि सभी ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें साथ लेकर बैकुण्ठ में श्री नारायण के पास पहुंचे और सभी ने अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति की और बताया कि प्रभु हम पूर्व से ही दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट में हैं और इधर महर्षि दुर्वासा के शाप से श्रीहीन भी हो गये हैं। आप शरणागतों के रक्षक है, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिये।
स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने गंभीर वाणी में कहा तुम लोग समुद्र का मंथन करो, जिससे लक्ष्मी तथा अमृत की प्राप्ति होगी, उसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे, तब दैत्य तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट न कर सकेंगे। किन्तु यह अत्यंत दुष्कर कार्य है, इसके लिए तुम असुरो को अमृत का प्रलोभन देकर उनके साथ संधि कर लो और दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करो।
प्रसन्नचित्त इन्द्रादि देवों ने असुरराज बलि तथा उनके प्रधान नायकों को अमृत का प्रलोभन देकर सहमत कर लिया। मथानी के लिए मंदराचल का सहारा लिया और वासुकिनाग की रस्सी बनाकर सिर की ओर दैत्यों ने तथा पूछ की ओर देवताओं ने पकड़ कर समुद्र का मंथन आरम्भ कर दिया। किन्तु अथाह सागर में मंदरगिरी पर्वत डूबता हुआ रसातल में धसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न भगवान श्रीहरि ने कूर्म रूप धारण कर मंदराचल पर्वत अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा।
शास्त्र प्रमाण है, बड़ी से बड़ी से विपदा ईश्वरीय शक्ति की कृपा से टली है। जब-जब देव, मनुष्य, जीव-जन्तुओं पर संकट आया ईश्वरीय सत्ता ने किसी ना किसी रूप में संसार को पुनः जीवनदान दिया। प्राचीन काल से आधुनिक काल तक कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं, जिसका जीवन संकटों, समस्याओ से घिरा ना हो। मानव जीवन में पग-पग पर असुरी शक्तियां अवरोध उत्पन्न करती हैं जिनके बीच खड़े रहकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ना, साधारण मनुष्य के लिए कठिन और दुष्कर होता है, क्योंकि कौन सा शत्रु कब उस पर प्रहार कर दें, कहा नहीं जा सकता, इसीलिए वह दुविधा ग्रस्त होने के कारण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ रहता है और इन्हीं सब कारणों से उसे अपने जीवन में दुःख तकलीफ़, परेशानी, पीड़ा सहन करनी पड़ती है, वह अपने जीवन में हताश, निराश हो जाता है।
इस वैमनस्यता के युग में आज हर कोई शक्तिशाली बनने का प्रयास करता है। पौराणिक काल से अब तक यही होता रहा है, कि जो साधारण, कमजोर, अस्वस्थ, निर्बल प्राणी होते हैं, उन पर हर कोई प्रहार करने की कोशिश करता है और किया भी है, पुराने जमाने में वह वर्ग, जो अपने-आप में शक्तिशाली होने के कारण उस समय उच्च वर्ग माना जाता था, जन सामान्य पर अत्याचार कर, उन पर आधिपत्य स्थापित कर उन्हें अपना गुलाम बना लिया करता था।
अगर मानव इसी प्रकार का भय ग्रस्त जीवन जीयेगा, तो वह जीवन में कभी भी उन्नति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। ऐसे क्षणों में मानव मस्तिष्क के अधिक विचार शील हो जाने के कारण, उसके मन में विभिन्न प्रकार की चिन्ताएं व्याप्त हो जाती हैं, अतः वह ठीक ढंग से कार्य करने में असमर्थ ही रहता है, और शत्रुओं को कैसे परास्त किया जाए निर्णय न ले पाने के कारण, उसका जीवन निराशाजनक एवं संकट ग्रस्त हो जाता है।
जीवन के विभिन्न पक्षों में शत्रु भिन्न-भिन्न रूप धारण कर मानव के सामने खड़े हो जाते हैं, केवल वही मनुष्य उन शत्रुओं से मुक्ति पाते हैं, जिनमें उन्हें परास्त करने की क्षमता होती है, किन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो उन परेशानियों व बाधाओं से जितना निकलने का प्रयास करते हैं उतने उलझते ही चले जाते हैं।
भगवती महाकूर्मायै पीताम्बरा ऐसी ही साधना है, जिसके बलबूते जीवन के असाध्य कार्य को भी सरलता पूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। मां भगवती पीताम्बरा विष्णु के कूर्म अवतार की चेतना से संयुक्त हैं, जिसका तात्पर्य है कि साधक के जीवन का भार मां अपने ऊपर स्थापित कर लेती हैं, जिससे उसका जीवन रसातल में ना जाकर तेजी से उन्नति की ओर गतिशील होता है, कर्मशील बनता है और कर्मशील जीवन ही लक्ष्मी व अमृत की प्राप्ति की योग्यता से सम्पन्न होता है।
आज के इस युग में जब सभी भौतिकता के पीछे पागलों की तरह दौड़ रहे हैं, दुःखी, पीडि़त व चिन्ता ग्रस्त जीवन जी रहे हैं, उनके लिए यह साधना सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जीवन में गति के लिए आवश्यक है कि आपको एक सुपथ की प्राप्ति हो, कंकड, पत्थर, अवरोध रहित मार्ग प्रशस्त हो और उसके जीवन से समस्त शत्रुओं का दमन हो तब ही उसका जीवन अभाव मुत्तफ़ हो पाता है। भगवती पीताम्बरा जहां एक ओर शत्रु का दमन कर साधक के जीवन को शत्रुविहीन बनाती हैं, वहीं उसका सम्पूर्ण भार स्वयं पर लेकर उसके जीवन को सम्पन्नता भी प्रदान करती हैं।
इस साधना को सम्पन्न कर साधक विशेष प्रकार की प्राण-शक्तियों से सम्पन्न हो जाता है। जो उसे जीवन में निरन्तर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर वह जीवन में दुःखों का सामना करने से नहीं हिचकता, फिर शत्रु उस पर हावी नहीं हो सकते, फिर बाधाएं व उलझने उसको घेर नहीं सकती, फिर वह जीवन में कभी पराजित नहीं हो सकता, क्योंकि इस साधना का मूल ही आधार शक्ति को सशक्त करना है।
पीताम्बरा बगलामुखी सिद्धि 12 मई या किसी भी रविवार को रात्रि 10 बजे के पश्चात् स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर संक्षिप्त गुरु पूजन करें, फिर एक बाजोट पर गहरे पीले रंग का वस्त्र बिछाकर, उस पर चन्दन से त्रिभुज बनाकर उस पर कूर्म शक्ति जीवट रख दें उसके ऊपर बगलामुखी यंत्र स्थापित करें, यंत्र का कुंकुंम, अक्षत से संक्षिप्त पूजन कर धूप और दीप प्रज्ज्वलित करें। इसके पश्चात् हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि मैं अमुक (अपना नाम लें), जीवन के समस्त उपद्रव, विपत्तियों के शमन व सरल, सुगम, उन्नति-प्रगति दायक मार्ग की प्राप्ति हेतु महाकूर्मायै पीताम्बरा साधना सम्पन्न कर रहा हूं, ऐसा कह कर उस जल को जमीन पर छोड़ दें, हाथ को जल से धो लें।
इसके पश्चात् सर्वप्रथम गुरु मंत्र की 1 माला मंत्र जप करें, फिर महाकूर्मायै माला से निम्न मंत्र की 7 माला 5 दिन तक नित्य जप करें।
मंत्र जाप की समाप्ति के पश्चात् पुनः गुरु मंत्र की 1 माला जप कर साधना में सफलता के लिए गुरूदेव से प्रार्थना करने और गुरु आरती सम्पन्न करें। छठे दिन समस्त सामग्री को उस बाजोट पर बिछे कपड़े में लपेट कर नदी में विसर्जित कर दें।
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