





यह समस्त भूलोक पूरी तरह से कर्म प्रधान है, इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव को कोई न कोई कर्म करते ही रहना पड़ता है और यह कर्म ही जीव का अस्तित्व है। यों तो कर्मं की विवेचना करना, पाप और पुण्य का सही निर्णय करना अनादिकाल से ही दुष्कर रहा है, फिर भी जनहित की भावनाओं को लेकर कर्मों का संक्षिप्त विवेचन करना आज के युग में अत्यन्त ही आवश्यक हो गया है।
प्रायः सामान्य दृष्टि से देखा जाए, तो जीव जन्म लेते ही कर्म-बन्धनों से जुड़ जाता है और प्रतिपल नवीन कार्य करना तथा पूर्व जन्मकृत संचित कर्मों के फलों को भोगना जीव की नियति है और यही नहीं अपितु जीव जिस गर्भ से जन्म लेता है, जिस परिवार में जन्म लेता है, उनके कर्मों का परिणाम भी उससे जुड़ा रहता है, जिसे जीव को भोगना ही पड़ता है। यही कारण है कि आज के इस भौतिकवादी युग में व्यक्ति चाहकर भी अपने आप को निरन्तर चैतन्य, पवित्र तथा निर्मल नहीं बना पाता, वह जाने-अनजाने में अनेक कर्म दोषों से ग्रसित होता ही है।
भू लोक के समस्त प्राणी दैहिक, वैचारिक कर्म और तीसरा वह कर्म जो सर्वथा विचित्र होता है, विचित्र इसलिये क्योंकि जीव इन कर्मों को न तो देह और न ही मानसिक रूप से सम्पन्न करता है। इस प्रकार के कर्मों को कोई दूसरा व्यक्ति करता है, जिसका परिणाम भी जीव को भोगना ही पड़ता है।
इस प्रकार मनुष्य अनेक प्रकार के कर्म-दोषों से ग्रसित हो जाता है और जब तक वह इन दोषों अर्थात् त्रि-तापों से मुक्ति नहीं पा लेता अर्थात् जब साधक कर्मदोषों से मुक्ति पा लेता है, तब ही उसका वर्तमान, भविष्य समृद्ध, वैभववान बन पाता है और यह तब ही संभव है, जब साधक अपने भूतकाल की नकारात्मकता का शमन करे। जिसके पश्चात् उसे जीवन में पूर्ण उन्नति, शांति, सुख, वैभव एवं जीवन की सर्वश्रेष्ठ निधि ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है।
सभी प्रकार के कर्म दोषों से मुक्ति और त्रितापों को समाप्त करने की एकमात्र सर्वश्रेष्ठ साधना त्रिपुर सुन्दरी साधना है। महादेवी त्रिपुर सुन्दरी अपने साधकों के पाप-ताप, संताप, कष्ट, बाधा को दूर करने के लिए प्रतिक्षण तत्पर रहती ही हैं।
गौड़पदीय सूत्र के अनुसार तीनों तत्वों से भिन्न, त्रिगुण नियन्त्री शक्ति होने के कारण इनका नाम त्रिपुरा है। त्रिपुरार्णव में त्रिपुरा शब्द इड़ा, पिगंला और सुषम्ना इन तीनों नाडि़यों के रूप में निरुक्ति की गई है। यह शक्ति मन, बुद्धि तथा चित्त में निवास करती है, इसीलिए इसे त्रिपुरा कहा गया है।
श्री विद्या ही ललिता, राज-राजेश्वरी, महात्रिपुर सुन्दरी, बाला, पंचदशी तथा षोड़शी आदि नामो से प्रसिद्ध है। श्री विद्या का ही परिणत स्वरूप त्रिपुर सुन्दरी है, इसी को ब्रह्मविद्या तथा ब्रह्ममयी कहा गया है।
सामान्यतः श्री शब्द का तात्पर्य धन लक्ष्मी मान लिया जाता है। परन्तु ब्रह्माण्ड पुराणोत्तर आदि में वर्णित कथाओं के अनुसार श्री शब्द का मूल अर्थ महात्रिपुर सुन्दरी ही है। महालक्ष्मी ने त्रिपुर सुन्दरी की चिरकाल तक आराधना करके जो वरदान प्राप्त किये हैं, उनमें ही एक वरदान उन्हें श्री शब्द से प्रसिद्ध होने का भी मिला था।
सामान्य रूप से अन्य देवी-देवताओं की साधना से लौकिक फल अर्थात सुख-सम्पदा, ऐश्वर्य, संतान, पत्नी आदि सुख प्राप्त होते हैं। परन्तु त्रिपुर सुन्दरी साधना से लौकिक फल के साथ ही आत्मज्ञान की उपलब्धि भी होती है। श्री विद्या त्रिपुर सुन्दरी की उपासना यदि सौभाग्य से सद्गुरु कृपा से प्राप्त हो जाये तो सामान्य पुरुष भी साधनात्मक भाव का परिपालन कर आद्या शक्ति की अभिन्नता गुरु कृपा से प्राप्त कर लेता है।
त्रिपुर सुन्दरी व्यक्ति के पूर्व संचित कर्मों को तो समाप्त करती ही हैं, साथ ही व्यक्ति के जीवन में चल रहे वर्तमान समय के दुष्कर्म, जो कि व्यक्ति के लिए ज्ञात-अज्ञात हैं, अपनी सूक्ष्म उपस्थिति से उन कर्मों को न करने देने के लिए प्रायः व्यक्ति को प्रेरित करती रहती हैं और उसे जीवन में निर्मलता, पवित्रता, श्रेष्ठता तथा निष्पाप जीवन प्रदान करने के साथ ही वह सब कुछ प्रदान कर देती हैं, जिसका वह व्यक्ति आकांक्षी होता है। एक नहीं हजारों योगियों, साधुओं, संन्यासियों, ऋषियों और गृहस्थ साधकों ने इस बात को स्वीकार किया है कि त्रिपुर सुन्दरी की साधना कलियुग में पूर्ण धन, यश, मान, पद, प्रतिष्ठा दिलाने में समर्थ है।
गृहस्थ साधक इस साधना को सम्पन्न कर अपनी दैनिक समस्याओं से मुक्त तो होता ही है साथ ही अपना भौतिक जीवन सुव्यवस्थित कर आध्यात्मिक लाभों को प्राप्त करने का पात्र भी बन जाता है, जिन्हें विशिष्ट योगी ही प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। शक्ति साधना का यही तात्पर्य है कि जो कुछ सामान्य प्रयासों से न प्राप्त कर पा रहे हो, वह पराम्बा शक्ति के स्पर्श से प्राप्त कर लें।
त्रिपुर सुन्दरी शांत स्वरूप और उग्र स्वरूप दोनों ही स्वरूपों की साधना है। जीवन में काम, सौभाग्य व शरीर सुख के साथ-साथ वशीकरण, सरस्वती सिद्धि, लक्ष्मी सिद्धि, आरोग्य सिद्धि की भी यही साधना है। वास्तव में त्रिपुर सुन्दरी को राजराजेश्वरी कहा गया है, क्योंकि वे अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ है।
सांध्य बेला के बाद साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्व दिशा में लकड़ी के बाजोट पर पीला आसन बिछा कर, एक ताम्र प्लेट में त्रिकोण रूप में तीन बिन्दियां कुंकुम या केसर से बनाकर, उस त्रिकोण में त्रिपुर सुन्दरी यंत्र स्थापित करें, तथा धूप, दीप, पुष्प आदि से उसका पूजन करें, इसके पश्चात् चार माला गुरु मंत्र का जप करें और मानसिक रूप से सद्गुरुदेव से साधना में पूर्ण सफलता प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करें। महादेवी त्रिपुर सुन्दरी का मूल मंत्र प्रारम्भ करने से पूर्व हाथ में जल लेकर संकल्प लेकर अपनी मनोकामना व्यक्त करें। तत्पश्चात् सर्वार्थ सिद्धि शक्ति माला से 9 माला मंत्र-जप सम्पन्न करें।
साधना काल में साधक को अपना शरीर पूर्णरूप से हल्का होता प्रतीत होगा, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। जैसे-जैसे साधक के पाप-दोष समाप्त होते हैं, उसका समस्त शरीर तथा मस्तिष्क हल्का होने लगता है। यह स्थिति अपने-आप में पूर्णानन्द की स्थिति है।
साधना समाप्ति के पश्चात् साधक 11 दिनों तक साधना सामग्री को अपने पूजा स्थान में रखें, तथा 11 दिन के पश्चात् उक्त सभी सामग्री लाल वस्त्र में लपेट कर गुरु चरणों में अर्पित करें या किसी पवित्र नदी, सरोवर में विसर्जित कर दें।
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