





ऋग्वेद के सातवें मण्डल के छियासीवें सूक्त में एक मन्त्र आता है-
हे स्वामी! विवाह के पश्चात् जैसे कन्या के लिये वर होता है, उसी प्रकार हे मेरे वरुणदेव! कब आयेगा वह क्षण जब मैं अपनी आत्मा से आपके साथ बातें कर सकूंगा, जब आपके हृदय का प्यार पाकर, आपसे मिलकर एकाकार हो सकूंगा? कब आयेगा वह क्षण जब आप प्यार और आदर के साथ मेरे भावों को स्वीकर करोगे और मैं अच्छे मन से आपके दर्शन पा सकूंगा? इस श्लोक में जो पुकार है, उसे मैंने संसार में विरले लोगों में ही सुना है, किसी-किसी के हृदय से ये आवाज उठती हुयी, रोती हुई, सुनाई दी है।
एक समय था जब आत्मदर्शी ऋषियों, महात्माओं को संसार में सबसे मुख्य समझा जाता था। फिर समय आया जब बड़े-बड़े योद्धाओं को सबसे मुख्य समझा गया। वह समय भी चला गया। तब धनवानों को सबसे मुख्य माना गया, लोग इनके पीछे भागने लगे। यह समय भी व्यतीत हो गया तो राजनैतिक नेताओं का समय आया। उनका आदर होने लगा, उनके पीछे लोग दौड़ने लगे, अब वह समय भी व्यतीत हुआ जा रहा है। एक विचित्र समय आ गया है, सब लोग फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों का दर्शन पाना चाहते हैं। पता चल जाये कि अमुक स्थान पर कोई ऐक्टर या ऐक्ट्रस आयी है, तो भीड़ लग जाती है जैसे मुक्ति का द्वार खुला है।
ऐसे समय में आत्मदर्शन की, भक्त-भगवान की, गुरु-शिष्य की बात अनहोनी सी लगेगी, भौतिकी पूजा के इस युग में यह कहना असमय का राग होगा, परन्तु सोचकर देखिये तो ज्ञात होगा कि यह असमय की राग नहीं है। यह वह बात है कि जिसके बिना मनुष्य जीवन में कभी शान्ति नहीं आती, उसके बिना उसका जीवन दुःखद और अधूरा रहता है।
विज्ञान के जिन आविष्कारों ने मानव को मोहित किया है, वे पिछले लगभग दो सौ वर्षो में हुये। कुछ आविष्कार इससे पूर्व भी हो चुके थे। लेकिन अधिकतर और बड़े-बड़े आविष्कार पिछले एक सौ वर्षों में हुये। उन्हें देखकर मनुष्य चकित हुआ अवश्य, परन्तु इनसे हुआ क्या? बड़े-बड़े वैज्ञानिक यदि ये आवष्किार करते रहें तो वे चाहते क्या थे? इसका सीधा सा उत्तर है सुख।
श्री गुरु नानकदेव जी ने सत्य कहा है कि सारा संसार दुःखी है, प्रत्येक व्यक्ति सुख की खोज में संलग्न है। सुख तीन प्रकार का है- शारीरिक सुख, मानसिक शान्ति और आत्मिक आनन्द। इन असंख्य आविष्कारों से जो विज्ञान के क्षेत्र में हुये, इनमें आत्मिक आनन्द मिलने का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता। आत्मिक आनन्द से इन आविष्कारों का कोई सम्बन्ध नहीं।
मानसिक शान्ति भी इनसे उत्पन्न नहीं हुई, अपितु पहले से कम हो गई है। इनके कारण अशान्ति, बेचैनी और भय में वृद्धि हुई है, शान्ति में नहीं। हां शारीरिक सुख के कुछ साधन अवश्य उत्पन्न हुये हैं। अब बहुत सरलता से बिजली से बल्ब जल जाता है। गला खराब करने के लिए बर्फ मिल जाता है। सहन शक्ति को कम करने के लिए हीटर की गर्मी मिल जाती है। लेकिन यह समझ लें संसार में सबसे बड़ा सुख है आत्मिक आनन्द, उससे कम मानसिक और सबसे छोटा है शारीरिक सुख। विज्ञान ने शारीरिक सुख के लिये साधन उत्पन्न किये अवश्य हैं, किन्तु क्या इनसे वास्तव में शारीरिक सुख मिला भी है? दवाईयां, औषधियां बहुत हैं, परन्तु रोग भी तो बहुत से हो गये। आविष्कार हुये तो बहुत बड़े-बड़े हैं और उतनी उलझने भी उतने ही गति से बढ़ी हैं।
शारीरिक सुख को उत्पन्न करने वाले ये साधन आज के नहीं हैं, ये इससे पहले भी उत्पन्न हुई थी और बहुत बार नष्ट भी हुयी। वास्तविकता यह है कि प्राचीन काल में विज्ञान जिस शिखर पर था आज का विज्ञान वहां तक अभी पहुंचा ही नहीं है। अभी वह और उन्नति करेगा और आगे बढ़ेगा। मैं इसकी निन्दा नहीं करता, परन्तु इससे कोई मानसिक शान्ति मिली हो, ऐसा मुझे तो नहीं लगता। सुख के इन साधनों के होते हुये भी मानसिक शान्ति का कहीं कोई निशान तक नहीं। यदि विज्ञान की उन्नति से मानसिक शान्ति मिल जाती तो सबसे अधिक शान्ति यूरोप ओर अमेरिका में होनी चाहिये थी। परन्तु क्या अमेरिका और यूरोप का कोई भी देश, कोई शासन, कोई भी जाति हृदय पर हाथ रख कर कह सकता है कि उसे मानसिक शान्ति मिल गई है? यदि मिली होती तो यह दौड़-धूप किसलिए? यह संघर्ष, ये ऐटम बम, हाइड्रोजन बम किसलिए? आज भी वे उसी प्रकार अशान्त हैं, जैसे पहले कभी थे।
इनमें से कई लोग आत्मा और ईश्वर को ही नहीं मानते, फिर आत्मिक आनन्द की बात कैसे समझेंगे? बर्फ और भाप को ईश्वर समझने वालो ने इन आविष्कारों से प्राप्त क्या किया? ऐटम बम जिससे एक ही क्षण में लाखों मनुष्यों को मौत की नींद सुला सकें। विज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हो तो अवश्य बढ़ो, लेकिन ध्यान रखना इस मार्ग पर शान्ति कभी मिलेगी नहीं, आनन्द सदा एक स्वप्न बना रहेगा। इसका कारण यह है कि सच्चा सुख, शान्ति और आनन्द इस माया में नहीं, यह मात्र खेल दिखा सकती है, सुख, शांति और आनन्द केवल उस समय मिलते हैं, जब आत्मा और ईश्वर का मिलाप होता है, जब दोनों बाते करते हैं, दोनों एक-दूसरे के प्यार को अपने हृदय में धारण करके एक-दूसरे के हो जाते हैं। इसीलिए ऋग्वेद में भक्त ईश्वर को पुकारता है और कहता है कब वह शुभ घड़ी आयेगी जब मैं सु-मन से तेरे दर्शन पा सकूंगा?
इस मंत्र में ईश्वर को वरूण कहा गया है। वरूण का अर्थ है, वह जिसे हमने सबसे उत्तम, सबसे सुन्दर, सबसे कल्याणकारी समझ के वर लिया हो। ईश्वर को भक्त क्रियात्मक रूप से कहता है कि मैंने तुझे वर लिया है। इस संसार में एक ओर प्रकृति है, दूसरी ओर ईश्वर। दोनों के मध्य में आत्मा खड़ी है। दोनों में से किसको वह चुनेगा, यह निर्णय उसे करना है। यदि आप प्रकृति को चुनना चाहते हैं तो आपको कोई रोक नही हैं, चुन लो प्रकृति को। इसके उलट है, वह श्रेय मार्ग जिसमें आत्मा प्रकृति को नहीं अपितु ईश्वर को चुनती है। प्रकृति मन मोहिनी है, मन को लुभाने वाली है। कितने ही रूप हैं उसके। प्रत्येक पग पर बदलती है, प्रतिक्षण बदलती है, मोहित कर देती है मनुष्य को। परन्तु अन्त में वहां विनाश के अतिरिक्त कुछ नहीं। उसका अन्त कड़वा है, आत्मा को इस प्रकार पटकती है कि वह फिर युगों तक संभल नहीं पाती।
एक दिन भगवान कृष्ण के पास नारद जी आये और बोले- भगवन् मैं ब्रह्मज्ञान की बात पूछने आया हूं, क्या है यह ब्रह्मज्ञान? क्यों हम ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाते? श्री कृष्ण ने कहा, अभी आये हो, थोड़ी देर बैठो, प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा। नारद जी बैठे, विश्राम किया, बोले अब दो मेरे प्रश्न का उत्तर।
श्री कृष्ण जी ने कहा, आओ जंगल में घूमने चलें, वहां बाते करेंगे। दोनों निकल पड़े सैर को। घूमते-घूमते नारद काफी थक गये। प्यास भी सताने लगी। श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुये कहा- नारद जी! आपको शायद प्यास लगी है, मुझे भी लगी है। मैं यहां बैठता हूं, आप कहीं से थोड़ा पानी ले आयें।
नारद बोले- आप बैठिये, मैं पानी लेकर अभी आता हूं। आगे गये तो एक कुआं मिला, जिस पर कुछ स्त्रियां पानी भर रही थीं। नारद ने पानी मांगा, एक युवती ने अपने घड़े से पानी पिला दिया। नारद पानी पी रहे थे और उसकी ओर देख रहे थे। देखते-देखते मन में मोह जाग उठा। पानी पी लिया तब भी एक ओर खड़े हो गये।
वह लड़की घड़े को लेकर अपने घर को चली तो नारद भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े। उसके घर में पहुंचे तो लड़की के पिता ने उन्हें पहचान कर कहा, आप नारद जी! मेरे सौभाग्य आपके दर्शन हुये। अब भोजन किये बिना जाने न दूंगा। नारद जी यही तो चाहते थे, बोले भूख तो लगी है।
भोजन कर चुके तो बोले- हम कुछ दिन तुम्हारे घर में रहे तो क्या हो? लड़की के पिता ने कहा, यह तो मेरा सौभाग्य है। नारद जी वहीं टिक गये। उस लड़की के रूप का मोह उन्हें पागल किये देता था। मन में जो गिरावट आ गई थी, वह और भी नीचे लिये जाती थी। फिर एक दिन लड़की के पिता से बोले- मैं चाहता हूं कि इस कन्या की शादी मेरे साथ हो जाये।
लड़की के पिता ने कहा महाराज! कन्या तो पराया धन है, मुझे इसका विवाह तो करना ही है। आपसे अच्छा वर उसे कहां मिलेगा? मैं विवाह कर दूंगा अवश्य, परन्तु मेरी एक शर्त भी माननी होगी और शर्त यह है कि विवाह के पश्चात् आप मेरे ही घर पर रहें, कहीं जायें नहीं। नारद को और क्या चाहिये था! रमते राम का कोई घर-घाट था नहीं। चिन्ता कर रहे थे कि पत्नी को लेकर कहां जायेगे। अब बना-बनाया घर मिल गया। शर्त स्वीकार हो गई, विवाह भी हो गया। नारद जी अपने आपको भूलकर ससुराल वालों के पशु चराते, उनके खेतों में काम करते, उन्हीं के घर में रहने लगे।
इस प्रकार कितने ही वर्ष व्यतीत हो गये। गृहस्थी नारद के दो-तीन बच्चे भी हो गये। तभी एक दिन मूसलाधार वर्षा होने लगी। एक दिन, दो दिन, कई दिन होती रही। सब ओर जल-थल एक हो गया। शेष लोग कहां-कहां पर बचे, यह नारद ने देखा नहीं। वे अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर मकान की दूसरी मंजिल में चले गये। वहां भी पानी पहुंचा तो छत पर चले गये, परन्तु बाढ़ तो रूकी नहीं। पानी छत के निकट पहुंचा तो नारद ने समझा कि मकान अब बचेगा नहीं। पत्नी और बच्चों सहित पानी में कूद पड़े कि किसी ऊंचे स्थान पर जाकर प्राण बचायें।
परन्तु ऐसा करते ही दो बच्चे डूब गये। पत्नी रोने लगी तो नारद बोले- भागवान! रोती क्यो है? तू भी है, मैं भी हूं। बच्चे और हो जायेंगे। परन्तु तभी तीसरा बच्चा भी डूब गया। उसे ढूंढने के लिए नारद जी हाथ-पांव मार ही रहे थे, कि पानी का बहाव आया, पत्नी भी डूब गई। बड़ी कठिनाई से नारद जी एक ऊंचे स्थान पर पहुंचे। वहां भी पानी था। थक वह बहुत गये थे। तैरने का अब प्रश्न उत्पन्न नहीं होता था, परन्तु खड़े हो सकते हैं। पानी छाती तक था, तभी पानी ऊपर बढ़ा, कन्धों तक पहुंच गया, फिर ग्रीवा तक, ठोडी भी डूब गई, पानी होंठो के पास पहुंचा तो नारद जी चिल्ला उठे- हे भगवान् मुझे बचाओ! तभी याद आया कि वे तो भगवान् कृष्ण के लिए पानी लेने आये थे। रोकर बोले क्षमा करो भगवान! और तभी उनकी आंख खुल गयी।
नारद ने देखा कि कहीं कुछ भी नहीं। वे जंगल में पड़े हैं, सामने खड़े श्री कृष्ण मुस्करा रहे हैं, मुस्कराते हुये उन्होंने नारद जी से पूछा आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया या नहीं? वास्तव में प्रकृति की वास्तविकता को समझ लेना ही ब्रह्मज्ञान है, परन्तु यह प्रकृति माया इतनी लुभाने वाली है कि इसके जाल में फंसा व्यक्ति तभी समझता है, जब नाक तक पानी आ जाता है।
बहुत सुन्दर है यह माया, बहुत आकर्षक, परन्तु इसका अन्त है, घोर दुःख। इसलिये मैं कहता हूं कि ये आविष्कार जो पिछले सौ अथवा दो सौ वर्ष में हुये बहुत अच्छे हैं, परन्तु इनसे वास्तविक सुख कभी किसी को मिला नहीं, कभी मिलेगा भी नहीं। एक समय था, जब रात्रि में प्रकाश करने के लिये बड़ा परिश्रम करना पड़ता था, लकड़ी या पत्थर को रगड़ कर आग उत्पन्न की जाती थी, मिट्टी या धातु के दीपक में तेल डाला जाता था। उसमें कपड़े या रूई की बत्ती रखी जाती थी।
उसे जलाया जाता था। ऐसे स्थान पर दीपक रखा जाता था, कि वह वायु से बुझ न जाये, वर्षा से बुझ न जाये। तब भी बहुत प्रकाश नहीं होता था। इतना परिश्रम, तब छोटा सा दीपक, थोड़ा सा प्रकाश! आज वह सब कुछ नहीं करना पड़ता। आप बटन दबाते हैं, विद्युत बल्ब प्रकाशित हो जाता है। अत्यन्त सुन्दर है वह, बहुत सा परिश्रम उसके कारण बच गया। परन्तु क्या इससे सुख मिल गया आपको? बिजली का प्रकाश तो आज प्रत्येक घर में है। क्या सुख और शान्ति भी प्रत्येक घर में है? देखो, यह माया है। बहुत ठगनी है यह, प्रत्येक बार ऐसा प्रतीत होता है कि इससे सुख मिलेगा, परन्तु सुख कभी मिलता नहीं। सुख उसे मिलता है, जो इस ठगनी को ठग ले-
इस ठगनी के जाल में फंसे लोगो, मायावाद के पुजारियो! विज्ञान के प्रकाश से अन्धे होने वालो! यदि तुम केवल मायावाद में पड़े रहे और इस ठगनी के जाल से बाहर न आ सके तो ऐसा नाश होने वाला है, जिसका तुमने स्वप्न में भी विचार नहीं किया होगा। इस विनाश से बचना कठिन नहीं।
बचना चाहते हो तो सोचो कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? इस संसार में क्यों आये हैं? इस पर विचार करो। यदि कोई आपसे पूछे कि इस मानव-शरीर में क्यों आये? तो क्या कोई उत्तर आपके पास है? मुश्किल है कि आपके पास इसका उत्तर हो, मनुष्य उद्देश्य नहीं जानता, केवल इच्छा को जानता है कि मनुष्य प्रसन्नता चाहता है, सुख चाहता है, परन्तु बहुत प्रसन्नता हो तो भी सुख नहीं होता। तब यह चिन्ता जाग उठती है, कि प्रसन्नता कहीं चली न जाय! बहुत प्रसन्नता होने पर आंखों में आंसू आ जाते हैं। इसलिए प्रसन्नता के साथ ही दुख की कल्पना मनुष्य में जाग उठती है।
ऐसे भी विवाह होते हैं, जिनमें शाम को बेटी का विवाह होता है, प्रातः सूर्योदय से पूर्व पिता के हृदय की गति बन्द हो जाती है। शहनाइयों की आवाज के स्थान पर चीख गूंज उठती है वहां। फूलों के स्थान पर आंसू बरसने लगते हैं। कभी-कभी प्रसन्नता ही दुःख का कारण बन जाती है और फिर धन को देख लो आज सारा संसार धन को ही ईश्वर समझे बैठा है। इस प्रकार इसकी पूजा करने लगे हैं, जैसे यही सब-कुछ है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।
धन में सुख नहीं है, मैं लखपतियों से मिला हूं, करोड़पतियों से मिला हूं, परन्तु उनके मन में सुख तो मैने कहीं देखा नहीं। प्रत्येक ने एक ही बात कहीं कि सब-कुछ होने पर भी सुख नहीं है। गाड़ी है, बंगला है, नौकर है, परिवार है, सब-कुछ है परन्तु हृदय में बैठा हुआ कोई इसे कुरेद रहा है, घाव किये देता है। एक बार एक व्यक्ति ने अमेरिका के कुछ अमीरों की दशा लिखी, उसने बताया कि 1932 में शिकागो के होटल में अमेरिका के बड़े-बड़े पूंजीपतियों की मीटिंग हुई। उसमें अमेरिका की सबसे बड़ी लोहा-कम्पनी का प्रधान था, नेशनल सिटी बैंक ऑफ न्यूयार्क का प्रधान था, गैस उत्पन्न करने वाली कम्पनी का प्रधान था। इस प्रकार व्यापार के भी अनेक-अनेक प्रधान, तेल व्यवसाय के, वस्त्र उद्योग के, स्टॅाक-एक्सचेंज के तथा दूसरे उद्योगों के लोग थे। जिनसे अधिक धनी उनकी लाइन में दूसरा नहीं था। सब करोड़पति, सब एक-एक दिन में लाखों का लेन-देन करने वाले। 25 वर्ष पश्चात् उन लोगों के सम्बन्ध में जांच हुई कि वे कहां हैं और किस दशा में हैं, तो पता चला कि लोहा-कम्पनी का प्रधान पागल होकर मर गया। बैंक का प्रधान जेल में है। गैस-कम्पनी के प्रधान की गिरफ्तारी के वारण्ट निकले हुये हैं और उसका पता नहीं लगता। सबका अन्त भयानक था, सबका अन्त दुःखदायी था।
यह तो दूर की बात है, पंजाब में लाला हरकिशन लाल जी थे, जिन्हें उद्योग और व्यापार का महाराजा कहा जाता था। करोड़ो में वे खेलते थे। लाखों कमाते, लाखों खर्च करते थे। परन्तु अन्त में मरे तो एक होटल में, पागल होकर दैन्य अवस्था में। कोई भी पास नहीं था। दैन्य अवस्था में रात्रि को सोये, पता नहीं किस समय हार्ट फेल हो गया, प्राण निकल गये।
व्यापार में सुख नहीं है, धन में भी नहीं, तब क्या विद्या में सुख है? विद्या का अर्थ है जानना। परन्तु इस जानने का क्या कोई अन्त है? ज्यों-ज्यों आगे बढि़ये, त्यों-त्यों ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ अब तक जाना वह कुछ भी नहीं, जिसे नहीं जाना बहुत है। विद्या की दशा यह है कि आज तक हम यह नहीं जान सके कि अकेले हिमालय पर्वत पर कितनी वनस्पतियां होती हैं, कितनी प्रकार की घास, पौधे, फल और फूल। हिमालय होने पर भी पृथ्वी के सम्मुख तो बहुत छोटा है। हिमालय की बात ज्ञात नहीं तो फिर पृथ्वी की बात कौन कहे! इस सूर्य मण्डल की, इससे बड़े महासूर्य-मंडल की और इस महान् विश्व की बात कौन कहे, जिसमें अरबों महान सूर्यमंडल है, कितनी ही पृथ्वीयां है।
नहीं, विद्या से कभी किसी को शान्ति नहीं मिलती। विद्या उत्तम है, उसे प्राप्त करना चाहिये अवश्य, परन्तु यदि कोई समझे कि उसे शान्ति मिल जायेगी तो याद रखो कि ऐसा होगा नहीं। तब क्या शारीरिक शक्ति में सुख है? शारीरिक शक्ति हो तो अच्छी बात है। रोगी होकर, निर्बल होकर रहना। परन्तु शारीरिक शक्ति चाहे कितनी भी हो, किन्तु उसका अन्त होता है। बड़े-बड़े पहलवान भी अन्त में रोगी होकर मरते हैं।
प्रसन्नता, धन, सम्पत्ति, शक्ति, विद्या, इनका अन्त में नाश होता है। किसी में भी मनुष्य को सन्तोष नहीं होता, उसकी तृप्ति नहीं होती, भूख नहीं मिटती। ये सब के सब जीवन के साधन हैं अवश्य, परन्तु जीवन के उद्देश्य नहीं। जीवन का उद्देश्य वह है जिससे आत्मा की तृप्ति हो जाये, उसकी भूख मिट जाये, किसी भी दूसरी वस्तु की इच्छा न रहे। परन्तु प्रकृति पूजकों का संसार, मार्ग को ही लक्ष्य समझ बैठा है। साधन को उसने उद्देश्य समझ लिया है। प्रत्येक बात का उद्देश्य उसकी समझ में आता है, केवल अपने जीवन का उद्देश्य उसे पूरा पता नहीं।
एक व्यक्ति बाजार से दो बड़ी लकडि़यां खरीदता है और दो छोटी। चार पावे खरीदता है, कुछ सूत्री। सबको इकठ्ठा करके बुनना शुरु करता है। उससे पूछिये कि यह सब कुछ क्यों कर रहे हो? तो वह कहेगा- चारपाई बना रहा हूं। पूछिये- चारपाई बनाकर क्या करेगा? तो वह कहेगा- सोऊंगा। यह ठीक उत्तर है। छोटी सी चारपाई का उद्देश्य हम जान सकते हैं, इतने बड़े मानव-जीवन के उद्देश्य का ही पता नहीं। यजुर्वेद के प्रथम अध्याय में मन्त्र आता है, उसमें इस उद्देश्य के सम्बन्ध में कुछ प्रश्नोत्तर है। प्रश्न होता है कस्त्वा युनक्ति ? अर्थात् इस शरीर के साथ तुझे, तेरे आत्मा को किसने जोड़ दिया? उत्तर मिलता है स त्वा युनक्ति ? उसने अर्थात् ईश्वर ने जोड़ दिया।
फिर प्रश्न होता है कस्मै त्वा युनक्ति ? अर्थात् किसलिए जोड़ दिया शरीर के साथ? उत्तर मिलता है तस्मै त्वा युनक्ति उसके लिए अर्थात् परमात्मा को पाने के लिए जोड़ दिया है। और अन्त में कहा कर्मणे वां वेषाय वाम् परमात्मा को पाने का मार्ग यह है कि कर्म कर, ज्ञान प्राप्त कर, उपासना के मार्ग को अपना। ज्ञान, कर्म, उपासना- तीन साधन है, उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, जिसके लिए यह मानव-जीवन मिला। कौन सा कर्म अच्छा है, कौन सा नहीं, इसका पता ज्ञान से लगता है।
तब प्रश्न उत्पन्न होता है कि बुद्धि क्या है? एक ही बात के सम्बन्ध में कुछ लोग कहते हैं कि यह ठीक है, दूसरे कहते हैं कि यह अनुचित है। तब यह निर्णय कैसे हो कि ठीक क्या है और अनुचित क्या है? इसका निर्णय सात्विक बुद्धि से होता है। बुद्धि तीन प्रकार की है- बुद्धि अर्थात् साधारण बुद्धि, कुबुद्धि अर्थात् विपरीत बुद्धि और सुबुद्धि अर्थात् सात्विक बुद्धि। बुद्धि जब सात्विक प्रयत्न से शुद्ध होती है, तो उसे मेधा कहा जाता है। मेधा जब और शुद्ध होती है तो प्रज्ञा बनती है। प्रज्ञा के पश्चात् आने वाली बुद्धि को प्रतिभा कहा जाता है। उसके उत्पन्न होने से हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है। इससे भी आगे ऋतम्भरा बुद्धि है- ऐसी बुद्धि जिसमें असत्य का चिन्ह भी नहीं, जो केवल ऋत अर्थात् सदा रहने वाले सत्य को अपनाती है। यह ऋतम्भरा बुद्धि ही सात्विक बुद्धि है।
ऐसे भोजन हैं, ऐसी औषधियां है और योग के ऐसे साधन भी है, जिनमें बुद्धि को तीव्र बनाया जा सकता है और सात्विक भी। इस सात्विक बुद्धि से देखना चाहिए कि जो कर्म हम करते हैं, वह अच्छा है या बुरा, ईश्वर की ओर ले जाने वाला है या प्रकृति की ओर। इस अच्छे या बुरे कर्म का नाम ही चरित्र है। जिस व्यक्ति का चरित्र अच्छा नहीं, जो प्रयत्न करके बुरे कर्म से बचने और उत्तम कर्म करने का यत्न नहीं करता, उसका मन-प्रभु चिंतन में कभी लग नहीं सकता। यह मन एक तालाब की भांति है। तालाब का पानी शुद्ध हो, निश्चल हो तो उसमे देखने से नीचे के पदार्थ दिखाई देते हैं, परन्तु यदि कोई व्यक्ति दिन भर इस ताल में कूड़ा-कचरा, गन्दगी फेंकता रहे, इस पानी को मटमैला करता रहे, उसे चंचल बनाता रहे और सायंकाल चाहे कि उसमें अपना रूप देख ले तो कुछ भी दिखाई नहीं देगा। ऐसे ही यदि मन को मैला किया जा रहा है तो उसके अन्दर के पदार्थ कैसे दिखेंगे?
इस प्रकार उपासना के लिए कर्म आवश्यक है, कर्म के लिए ज्ञान। ज्ञान, कर्म और उपासना, इन तीनों के लिये यह मानव-शरीर मिला है। इस उपासना की भावना से, भक्ति की भावना से ही ऋग्वेद के शब्दों में भक्त पुकार कर रहा है- ओ मेरे प्रीतम! ओ मेरे प्यारे! ओ मेरे मनमोहन! मेरे जीवननाथ! कब आयेगा वह दिन, कब निकलेगा वह सूर्य, जब मैं अपने आप से बाते कर सकूंगा?
कुछ लोग कहेंगे आत्मा से बातें कैसे कोई कर सकता है? कहने वाले कहेंगे परन्तु यह परम सत्य हैं। इसीलिए वेद में पुकार करते हुये भक्त ने कहा कब आयेगा मेरे प्रीतम और यह आत्मा ही परम परमात्मा है, आत्मा-परमात्मा में कुछ भी भिन्न नहीं है।
जब ऐसी ही पुकार हृदय में जाग्रत हो जाती है, हृदय का प्रत्येक कोना ऐसे ही भावों से भर जाता है, तब साधक पूर्ण मनोभाव से ज्ञान, कर्म और उपासना की ओर तीव्रता से अग्रसर होने लगता है——–आप भी अपने जीवन में ऐसे सुभावों को पूर्णता से आत्मसात कर——अपने आप से परिचित हो सकें——ऐसा ही शुभाशीर्वाद—–कल्याण हो—-!!!
परम पूज्य सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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