





भगवान शिव योगी रूप में अवतरित हुये हैं इसीलिये उनका स्वरूप योग-भोग गृहस्थमय पूर्णता से सामुज्य स्वरूप है। स्वर्णिम लहराती जटा उनकी व्यापकता की सूचक है, जटा में स्थित गंगा कलुषता-नाश की तथा चन्द्रमा अमृत का देवता है। गले में लिपटा सर्प काल स्वरूप है अर्थात् काल को वश में करने के कारण ही वे मृत्युंजय हैं। त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैहिक, दैविक, कुयोगिक के विनाश का सूचक है। व्याघ्र चर्म मन की चंचलता के दमन का सूचक है, नन्दी रूपी धर्म पर वे आरूढ़ होने के कारण ही धर्मेश्वर हैं और शरीर पर भस्म लपेटे हुये पूर्ण निर्लिप्तता के प्रतीक हैं।
सर्वथा निर्लिप्त और निराकर भगवान शिव पूर्ण रूप से विरक्त होते हुए भी सम्पूर्ण अर्थों में गृहस्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं और इसी कारणवश जहां वे योगियों के अधीवश्वर है, वहीं गृहस्थ साधकों के जीवन के आधार महादेव शिव ही हैं। केवल भगवान शिव ही नहीं उनके साथ माँ पार्वती, कार्तिकेय एवं गणपति, सभी तो वरदायक ही हैं। इसी से भगवान शिव की साधना सम्पूर्ण अर्थों में गृहस्थ की साधना है, क्योंकि शिव साधना से ही चतुर्दिश स्वरूप साधनाओं का संयुक्त फल प्राप्त होता है। भगवान शिव जहां ऐश्वर्य, धन-धान्य, वैभव से सम्पन्न करते हैं, वहीं माँ पार्वती की कृपा से योग्य जीवन साथी, श्रेष्ठ गृहस्थ जीवन, अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवान गणपति विघ्नहर्ता हैं तो वहीं भगवान कार्तिकेय का अद्भुत् तेज और बल जिससे जीवन में अद्वितीय सौन्दर्य, वीरत्व समाहित होता है।
देवों के देव महादेव की साधना का जीवन में अत्यन्त व्यापक प्रभाव होता है। भगवान शिव भौतिक जीवन के आधार हैं, उनके द्वारा ही गृहस्थ जीवन की सभी कामनायें मूर्त रूप धारण कर पाती है। ऐसे ही भावना, विचार के साथ महादेव की साधना सम्पन्न कर साधक समस्त ऐश्वर्य, सुख, समृद्धि, आरोग्यमय दीर्घायु जीवन की प्राप्ति कर पाता है।
श्रावण माह सभी तरह की साधना के लिए अत्यन्त चैतन्य व जीवन्त माह माना गया है। जो जाग्रत साधक हैं, वे अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु पूर्व से ही तैयारी कर लेते हैं, जिससे श्रावण माह का पूर्ण-पूर्ण लाभ प्राप्त कर जीवन को और अधिक ओजस्वी-तेजस्वी स्वरूप में निर्मित कर सके।
जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें होती हैं। समाज के अलग-अलग वर्ग की अलग-अलग आवश्यकतायें होती हैं किन्तु जिस प्रकार भगवान शिव का परिवार सभी विरोधाभासों को समेटे एक सम्पूर्णता का प्रतीक है, उसी प्रकार श्रावण मास की यह साधना जीवन की विभिन्न विरोधाभासी स्थितियों का निदान करने में समर्थ है।
परिवार का मुखिया विभिन्न जिम्मेदारियों के साथ आय अर्जित करने के लिए चिन्तित रहता है, पत्नी अपने अक्षुण्ण सौभाग्य की कामना करती है, किशोर आयु-वर्ग के बालक बालिकायें विद्या-ज्ञान प्राप्ति के लिये संघर्ष करते हैं। वहीं युवा वर्ग विवाह, सुखद गृहस्थ जीवन, राज्य-सम्मान इत्यादि स्थितियों का समाधान चाहता है। जीवन की इन सभी कामनाओं की पूर्ति इस साधना द्वारा संभव है। यह साधना प्रत्येक व्यक्ति अपनी कामना अनुसार उसकी पूर्ति हेतु सम्पन्न कर जीवन को सुस्थिति व गतिशीलता प्रदान करनें में समर्थ होता है।
भगवान शिव का स्वरूप शक्ति युक्त होने के कारण सर्वाधिक प्रभावशाली और साधक की मनोकामना पूर्ण करने वाला है। स्त्रियां गौरी पार्वती की आराधना के बिना अपने जीवन को सम्पूर्ण मानती ही नहीं। पुरुष यदि कामना करता है कि उसका पुत्र भगवान श्री गणपति के समान बल, बुद्धि से युक्त हो तो वहीं स्त्री की कामना रहती है कि उसका पुत्र कार्तिकेय जैसा सौन्दर्यवान और वीर हो। जिस प्रकार जहां शिव है वहीं शक्ति हैं, ठीक उसी प्रकार जहां श्री गणपति है वहीं लक्ष्मी है, जहां श्री कार्तिकेय है वहीं भगवती सरस्वती हैं।
इसीलिये इस साधना को सम्पूर्ण साधना कहा गया है। प्रत्येक साधक-साधिका को वर्ष में एक बार सम्पूर्ण शिव परिवार की आराधना करना ही चाहिये, क्योंकि इन्हीं के द्वारा सांसारिक गृहस्थ जीवन को सभी दृष्टि से सुस्थिति की प्राप्ति होती है और साधक अपने घर-परिवार में सुख-सौभाग्य, आनन्द, आरोग्यता व स्नेह प्रेममय वातावरण बनाने में सफल होता है तथा संतान श्रेष्ठ सुसंस्कारों से युक्त होकर उच्च पद पर प्रतिष्ठित होती है।
इस साधना के लिए आवश्यक मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठा युक्त सामग्री, जो विशिष्ट साधनात्मक मंत्रों व क्रियाओं के द्वारा पूर्णतः चैतन्य हो।
श्रावण मास अपने आप में सिद्ध मास माना जाता है, इसलिए इस महीने में समय या मुहूर्त आदि की आवश्यकता नहीं होती। दिन या रात में किसी भी समय में साधना प्रारम्भ कर उच्च सफलताओं से युक्त हो सकते हैं।
इस वर्ष श्रावण मास 17 जुलाई से प्रारम्भ होगा और श्रावण पूर्णिमा, रक्षा शक्ति दिवस 15 अगस्त को सम्पन्न होगा। इस विशेष माह में अक्षुण्ण पूर्ण फलदायी चार श्रावण सोमवार हैं, इस साधना को पुरुष-स्त्री, बालक-बालिका अपनी कामना पूर्ति हेतु स्वयं अलग-अलग सम्पन्न करना श्रेष्ठ रहता है।
आप अपनी सुविधानुसार किसी भी श्रावण सोमवार को इस विशिष्ट साधना को सम्पन्न कर शिव-गौरी गणपति रिद्धि- सिद्धि शुभ-लाभ कार्तिकेय शक्तिमय चेतना से युक्त क्रियाओं से श्रेष्ठमय गृहस्थ जीवन की प्राप्ति कर सकेंगे। सर्वप्रथम स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर पूर्व की ओर मुंह कर आसन पर बैठ जायें, यदि संभव हो तो परिवार के सभी सदस्य पूजा स्थान में बैंठे अथवा अपनी पत्नी को अपने दाहिनी ओर आसन पर बिठा दें, फिर अपने सिर पर हाथ रख प्रार्थना करें और बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने पूरे शरीर पर निम्न प्रोक्षण पढ़ते हुये जल छिड़के-
ऊँ अपवित्रः पवित्रे वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।
यः स्मेरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
फिर सामने चावल की ढ़ेरी बना कर उस पर जल का कलश रख दें और उसके चारों तरफ कुंकुम या केशर की चार बिन्दियां लगा लें और निम्न मंत्र पढ़ते हुये जल भरें-
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन सिन्नचिं कुरु।।
पुष्कराधानि तीर्थनि गंगाद्यास्सरितस्तथा।।
आगच्छन्तु पवित्रणि पूजाकाले सदा मम।।
फिर उस कलश से जल लेकर संकल्प करें-
ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भागवतों महापुरुषस्य
विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणः द्वितीय
परार्द्धेश्वेतवाराह कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टार्विशतितमे
कलियुगे कलिप्रथमचरेणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे (अपने
शहर का नाम लें) नगरे श्रावण मासे सोमवासरे मम
(अपनी कामनाओं व इच्छाओं का स्मरण करें) अमुक
कामना सिद्धयर्थं साधनां करिष्ये।
फिर सामने स्टील या चांदी की प्लेट में कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर गणपति की मूर्ति स्थापित करें, यदि मूर्ति ना हो तो गणपति स्वरूप एक सुपारी रखकर उस पर जल चढ़ाकर पोंछकर, केशर लगाकर सामने नैवेद्य एवं फल रख दें, पुष्प चढ़ायें और फिर हाथ जोड़कर बोलें-
तत्पश्चात् सामने पात्र में शिव सिद्धि दत्तात्रेय महायंत्र स्थापित करें। उसी पात्र में विघ्नहर्ता जीवट, विजयश्री रूद्राक्ष स्थापित कर दें। फिर शुद्ध जल में थोड़ा सा कच्चा दूध और गंगाजल मिलाकर ऊँ शिवाये वरदाये नमः मंत्र का उच्चारण करते हुये इन सभी का अभिषेक पतली धार से पांच मिनट तक करते रहें, साथ ही दूध, दही, घी, शहद, शक्कर मिलाकर पंचामृत से भी स्नान करावें फिर शुद्ध जल से धो लें। पश्चात् इन सभी विग्रहों को शुद्ध वस्त्र से पोंछ लें और अलग पात्र में स्थापित कर निम्न मंत्र पढ़ते हुए केशर और कुंकुम लगायें-
इसके पश्चात् अबीर, गुलाल, अक्षत, पुष्प चढ़ायें। तत्पश्चात् अगरबत्ती व दीपक जलाकर नैवेद्य तथा फल समर्पित करें। इसके बाद श्रद्धा युक्त दोनों हाथ जोड़कर पाठ करें-
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’ काराय नमः शिवाय ।।1।।
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै ‘म’ काराय नमः शिवाय ।।2।।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै ‘शि’ काराय नमः शिवाय ।।3।।
वसिष्ठकुम्भोभ्दवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै ‘व’ काराय नमः शिवाय ।।4।।
यक्षस्वरूपाय जटाधरायपिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ‘य’ काराय नमः शिवाय ।।5।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।6।।
इसके बाद शिव-गौरी शक्ति माला से पांच माला मंत्र जप करें-
मंत्र जप पश्चात् पुष्प लेकर अपनी कामना पूर्ति के लिये प्रार्थना करें-
नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे। साष्टांगडोऽयं
प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः।।
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः।
त्रहि मां पार्वतीनाथ सर्वपापहरो भव।
श्रीसाम्बशिवाय नमः। प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान्
समर्पयामि। अनया पूजया श्रीसाम्ब शिवः
प्रीयतां न मम् श्रीसाम्बशिवार्पणमस्तु।
मंत्र जाप पश्चात् शिव आरती सम्पन्न करें व सभी सामग्री लाल कपड़े में लपेट कर पूजा स्थान में रख दें, पश्चात् जब भी गुरुदेव से मिलें, उनके चरणों में अर्पित कर पूर्णता प्राप्ति का आशीर्वाद् ग्रहण करें।
मनुष्य जीवन कामना, इच्छा, आकांक्षा व आवश्यकता पर आधारित है। इसी के आश्रय पर जीवन में आनन्द, रस, प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। यदि कामना व आवश्यकताओं की पूर्ति ना हो तो मनुष्य जीवन नीरस, जीर्ण-शीर्ण सा हो जाता है। भगवान सदाशिव महादेव-माता गौरी की चेतना से साधक अपने जीवन को रस, आनन्द, ओज-तेज से आपूरित कर पूर्ण प्रसन्नता युक्त जीवन की प्राप्ति करता है, साथ ही वह शिव-परिवारमय स्थितियों से युक्त होकर अपने गृहस्थ जीवन का पूर्णतः भोग करते हुये संतान सुख वृद्धि, आरोग्यमय दीर्घायु जीवन और सभी तरह के संसाधान व सुखों से युक्त होता है। श्रावण माह के चेतनामय दिवसों में शिव-गौरी गणपति कार्तिकेय शक्तिमय चेतना आत्मसात कर साधक निश्चित रूप से अपनी कामनाओं को मूर्त रूप देकर आनन्द भाव से आपूरित होता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,