





गुरु शब्द जितना पावन है उतना ही प्राचीन भी। भावनोपनिषद् में स्पष्ट उल्लेख है-
अर्थात् समस्त क्रियाओं के कारणभूत शक्ति श्री गुरुदेव ही हैं और उनके साथ नवरंध्र रूप देह अभिन्न है।
तंत्र शास्त्र में गुरु को तीन स्वरूपों में माना गया है दिव्य, सिद्ध, मानव। मनुष्य शरीर में स्थित नवरंध्र श्री गुरुदेव के इन्हीं तीन रूपों से सम्बन्धित है अर्थात् मनुष्य की देह में स्थित नवरंध्र ही श्री गुरुदेव के दिव्यौध, सिद्धौध एवं मानवौध रूप में स्थित है। इसका और सूक्ष्म विवेचन इस प्रकार है कि वास्तव में श्री गुरुदेव प्रत्येक जीव के शरीर में अव्यक्त रूप में स्थित है, आवश्यकता है तो केवल सही साधना के द्वारा उनको जाग्रत कर अपने जीवन को सभी प्रकार से भौतिक- आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर कर लेने की।
मानव अपने जीवन में बहुत प्रयास करता है, भौतिक रूप से कोई कोर कसर बाकी नहीं रहने देता लेकिन पूर्व प्रारब्ध और वर्तमान जीवन के दोषों के कारण वह उन्नति नहीं कर पाता। इन सभी बाधाओं को समाप्त करने के लिए गुरु साधना के अतिरिक्त कोई अन्य साधना है ही नहीं क्योंकि जिस ब्रह्मतेज के अंश के द्वारा व्यक्ति का समस्त जीवन प्रकाशित होता है, वह ब्रह्मतेज का साकार पुंज केवल श्री गुरुदेव के माध्यम से ही व्यक्ति के जीवन में स्पष्ट होता है और फिर व्यक्ति सहज ही वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है, जो उसके जीवन में आवश्यक होता है। एक बात निश्चित है कि बिना आध्यात्मिक उन्नति के भौतिक उन्नति की कल्पना करना ही व्यर्थ है। जब तक हमारा आध्यात्मिक जीवन सृदृढ़ नहीं होगा तब तक भौतिक रूप से श्रेष्ठता प्राप्त करने की बात ही बेमानी है।
इन सभी तथ्यों का निचोड़ है अर्थर्ववेद में वर्णित तंत्र की यह दुर्लभ गुरु साधना-
तांत्रिक ग्रंथों में गुरुदेव के नौ रूप वर्णित किये गये हैं-
श्री उन्मनाकाशानंदनाथ
श्री समनाकाशानंदनाथ
श्री व्यापकानंदनाथ
श्री शक्त्याकाशनंदनाथ
श्री ध्वन्याकाशानंदनाथ
श्री ध्वनिमात्रकाशानंदनाथ
श्री विन्द्वाकाशानंदनाथ
श्री अनहताकाशानंदनाथ
श्री द्वन्द्वाकाशानंदनाथ।
इनमें से प्रथम तीन श्री गुरुदेव के दिव्यौध स्वरूप, द्वितीय तीन सिद्धौध स्वरूप एवं तृतीय तीन मानवौध स्वरूप के रूप में वर्णित किये गये हैं। इन्हीं नौ स्वरूपों की साधना से श्री गुरुदेव का सम्पूर्ण रूप से प्रकटीकरण एवं उनके दिव्य व अलौकिक शक्तियों का प्रादुर्भाव साधक अपने जीवन में कर सकता है।
श्री गुरु साधना जीवन की आधारभूत साधना है। गुरु साधना अपने आप में केवल एक सिद्धि नहीं, वरन स्वयं में 51 सिद्धियों को समाहित किये एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है।
कालीदास जैसे श्रेष्ठतम विद्वान की जीवन गाथा भी गुरु कृपा की महानता को व्यक्त करती है। कालीदास की पत्नी ने विवाह के पश्चात् प्रथम दिन ही जब उनकी मूढ़ता को देख कर उन्हें अपमानित कर महल से निकाल दिया, तो पत्नी से मिले अपमान की आग लिये वे चल पड़े। उनकी भेंट एक संन्यासी से हुई, जो कि उन्हें अपने साथ ले गये तथा दीक्षा दी और उन्हें ‘गुरु’, ‘गुरु’ नामक मंत्र का जप करने के लिए कहा। मात्र इसी का जप करते – करते वे दिव्यता के पथ पर अग्रसर होते गये और बुद्धि, चातुर्य, कवित्व, विद्वता आदि गुणों से अलंकिृत होकर श्रेष्ठ ऋषित्व शक्तियों से युक्त हुये। जब वे पुनः उस समाज में आये, जहां उनका अपमान हुआ था, उस समय वे अत्यन्त ओजस्वी, ज्ञान की गरिमा से आलोकित, दिव्यता व चैतन्यता से युक्त व्यक्तित्व बन चुके थे। इतिहास साक्षी है, उनके जैसा अद्वितीय विद्वान कोई दूसरा पैदा नहीं हुआ।
कालीदास की जीवन यात्रा एक ऐसे व्यक्ति की कथा है, जो प्रारम्भ में अत्यन्त मूढ़ था और गुरु कृपा प्राप्ति के उपरान्त वे सर्वश्रेष्ठ विद्वान कहलाये और यह सम्भव हुआ मात्र उनके द्वारा की गयी गुरु सेवा व चौबीसों घंटे निरन्तर गुरु का ध्यान, गुरु मंत्र का जप व गुरु साधना द्वारा। आदि काल से ही गुरु की महिमा का गुणगान होता रहा है। वेद, उपनिषद, पुराण आदि जितने भी उच्चकोटि के आध्यात्मिक ग्रंथ है, सभी में गुरु की सर्वोच्चता का वर्णन किया गया है। गुरु कृपा प्राप्त कर साधारण व्यक्ति भी अद्वितीय व्यक्तित्व बन जाता है।
ऐसा ही महान पर्व गुरु पूर्णिमा है, जो साधक को सर्व अनुकूलताओं से युक्त कर पूर्ण व्यक्तित्व प्रदान करता है। यह पर्व गुरु दक्षिणा स्वरूप में स्वयं को समर्पित करने का श्रेष्ठतम अवसर है और इस दिवस पर कारुण्य रूप गुरुदेव – शिष्य के न्यनूताओं, उसके अधूरेपन को स्वयं ग्रहण कर उसे आशीर्वाद स्वरूप श्रेष्ठता प्रदान करते हैं, उसके भौतिक-आध्यात्मिक पक्ष को सुदृढ़ बनाते हैं। जिस प्रकार माँ अपने शिशु की प्रसन्नता व श्रेष्ठता के लिए प्रयत्नशील रहती है, उसी प्रकार गुरु की भी समस्त क्रियायें अपने शिष्यों को प्रसन्नता, श्रेष्ठता, पूर्णता प्रदान करने के लिये होती हैं। श्री गुरुदेव की साधना, आराधना सम्पन्न कर साधक आगामी जीवन के लिये एक श्रेष्ठ आधार शिला रख लेता है। जो जीवनपर्यन्त उसे श्रेष्ठता की अग्रसर करता है।
प्रातः उठकर अपने सामने सफेद वस्त्र बिछा कर, सफेद धोती पहन कर बैठैं और सिद्धाश्रम चैतन्य यंत्र चावल की ढ़ेरी अथवा सुगन्धित पुष्प की पंखुडियों पर सम्मान पूर्वक स्थापित करें। इस विशेष यंत्र को अर्थर्ववेद के सूक्तों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित किया गया है। सामने घी का दीपक जला दें एवं वातावरण को सुगन्धित द्रव्यों धूप आदि से पवित्र कर तीन बार ऊँ कार ध्वनि द्वारा अन्तःकरण पवित्र करें।
इसके पश्चात् हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि मैं अमुक (अपना नाम), अमुक गोत्र का साधक आज दिवस पर श्री गुरुदेव को साक्षीभूत रखते हुये यह महत्वपूर्ण तांत्रोक्त गुरु साधना करते हुये मेरे जीवन में गुरुत्व शक्ति विस्तार हो, जिससे मेरे जीवन की मूढ़ता, अज्ञानता समाप्त हो, जिससे जीवन को श्रेष्ठ व दिव्यतम बना सकूं। ऐसा कह कर जल भूमि पर छोड़ दें तथा यंत्र पर हाथ रख मधुर वाणी से निम्न मंत्र का 21 बार उच्चारण कर सद्गुरु से सामुज्य स्थापित करें, जिससे श्री गुरुदेव की शक्तियां जीवन पर्यन्त प्राप्त होती रहें-
उपरोक्त प्राण प्रतिष्ठा एवं सम्पर्क के पश्चात् यंत्र के सामने दिव्य सिद्ध गुटिका स्थापित करें, नवनाथ स्वरूप में प्रत्येक मंत्र के साथ गुटिका पर पूजन सामग्री अर्पित करते रहें-
ऊँ उन्मनाकाशानंदनाथः जलं समर्पयामि।
श्रीसमनाकाशादिनाथः गंगाजल स्नानं सर्मपयामि।
व्यापकानंदनादिः पुष्प समर्पयामि।
शक्त्याकाशानंदनाथः चंदनं समर्पयामि।
ध्वन्याकाशानंदनाथः कुंकुम समर्पयामि।
ध्वनिमात्रकाशानंदनाथः केशरं समर्पयामि।
अनाहतकाशानंदनाथः अष्टगंधं समर्पयामि।
विन्द्वाकाशानंदनाथः अक्षतं समर्पयामि।
द्वन्द्वाकाशानंदनाथः सर्वोपचारार्थे समर्पयामि।
उपरोक्त नवनाथ पूजन के उपरान्त सद्गुरुदेव का प्राण
प्रतिष्ठित चित्र एक थाली में गुलाब की पखुडि़यां बिछाकर उस
पर स्थापित कर दें, पश्चात् आवाहन करें-
ऊँ आवोदेवा परिमहे वमन्त तद्दरे।
आवादेवा सवहै यज्ञियासो हवामहे।।
ध्यान करें-
परमं पदेवं गुरुभ्यो परात्पर गुरुभ्यो
पारमेष्ठि गुरुभ्यो मनस त्वक् प्राण गुरुभ्यो नमः
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि।।
अब त्रि-ताप नाश के लिये श्री सद्गुरुदेव का त्रिपिण्ड स्वरूप तिलक करें और त्रि-ताप नाशक जीवट अपने दाहिने हाथ की मुठ्ठी में बन्द कर भौतिक-आध्यात्मिक उन्नति का चिन्तन करते हुये और निम्न मंत्र उच्चारण के साथ यंत्र पर अर्पित कर दें-
त्रितापनाशकं स एतोस्मान् मांगल्य फलं समर्पयामि नमः।।
दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें-
भो! दीप! सूर्य रूपस्त्वं अन्धकार निवारक।
मम हृदये पूर्णत्वं प्रकाशं भव सर्वदा।।
सभी सामग्री के समक्ष सिर झुका कर पूर्ण श्रद्धा एवं निष्ठा पूर्वक गुरु को प्रणाम करें। फिर पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करें-
त्वं मातृ रूपं त्वं पितृ रूपं,
ब्रह्म स्वरूपं रूद्र स्वरूपं।
विष्णु स्वरूपं वेद स्वरूपं
गुरुत्वं शरण्यं गुरुत्व शरण्यम्।।
न जानामि मंत्र न जानामि तंत्रं,
न योगं न पूजां न ध्यानं वदामि।
न जानामि चैतन्य ज्ञानं स्वरूपं,
एकोहि रूपं गुरुत्व शरण्यम्।।
अनाथो दरिद्रों जरा रोग युक्तो।।
महाक्षीणकायः सदा जाड्यववत्रः।
विपत्ति प्रविष्ट सदाहं भजामि,
गुरुत्वं शरण्यं, गुरुत्वं शरण्यम्।।
मम् अश्रु अर्घ्यं देहं च पात्रं,
ज्ञानं च ज्योतिर्भवतां सदेव।
मम संसदि पूर्ण समर्पयामि,
गुरुत्वं शरण्यं गुरुत्वं शरण्यम्।।
मम् पूर्ण शरीरं त्वां देहत्वं
मम अश्रु पूर्ण नेत्रभ्यां त्वां गुरुपूजनं च मम करिष्ये
त्वां चरणें पूर्णत्व प्राप्ताय
मम् प्राण देह रोम-प्रतिरोम एतोस्मानं स पूर्णत्व सिद्धये
सर्व सुख सौभाग्यं धन धान्य ऐश्वर्य प्रतिष्ठा पूर्ण
मनोकामना सिद्धाय स तुभ्यं सम्पर्ददे।
इसके बाद गुरु सिद्ध दिव्यत्व माला से निम्न मंत्र की 4 माला मंत्र जप करें-
उपरोक्त मंत्र जप उपरान्त एक आचमनी जल गुरुदेव के श्री चरणों में निम्न मंत्र जप के साथ अर्पित कर दें।
ऊँ गुह्यातिगुह्य त्वं गृहाणास्मत् कृतं
जपं सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत् प्रसादान्महेश्वरः।।
मंत्र पूर्णता पर हाथ जोड़कर नमन करें कि मुझे सद्गुरुदेव की कृपा से ही ऐसी श्रेष्ठतम साधना प्राप्त हुयी तथा यह सम्पूर्ण पूजन उन्हीं को समर्पित है-
देवनाथ गुरौस्वामिन् देशिक स्वात्म नायकम्
त्राहि त्राहि कृपा सिन्धु पूजां पूर्णतराम् कुरु
अनयापूजया श्री गुरुः प्रीयन्ताम्
ऊँ तत्सत् ब्रह्मार्पणम अस्तु।
यह कहकर पुष्प अर्पित करें तथा खीर का भोग लगाकर गुरु आरती सम्पन्न करें। आरती पश्चात् परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन-प्रसाद ग्रहण करें।
साधना की पूर्णता पर यंत्र, माला, गुटिका, जीवट आदि श्री गुरुदेव से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनके चरणों में अर्पित कर दें व विनीत भाव से भविष्य के लिये साधना मार्गदर्शन प्राप्त करें।
गुरु पूर्णिमा चन्द्र ग्रहण युक्त होने से गुरु तत्व को इस साधना से अपने रोम- प्रतिरोम में आत्मसात करने की क्रिया सम्पन्न कर सकेंगें, जिसके द्वारा साधक पर सद्गुरुदेव का पूर्ण वरदहस्त सदैव बना रहता है।
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