





कृष्णोपनिषद में श्लोक है-
अर्थात् मृत व्यक्ति वही है, जिनमें हौसला नहीं है, साहस नहीं है और संकटों से मुकाबला करने की क्षमता नहीं है। ऐसे लोग मृत हैं। मनुष्य तो जिंदा है, घूमता-फिरता भी है, मगर उसके बाद भी मरा हुआ सा है। इसलिये क्योंकि उसमें नीरसता है, कोई नवीनता, चेतना, प्रबुद्धता नहीं है।
सद्गुरुदेव कहते हैं- यदि जीवन में संकट, बाधाएं, अड़चनें, कठिनाइयां नहीं हैं, तो मनुष्य जीवन हो ही नहीं सकता। मनुष्य जीवन उसको कहते हैं कि हर पग पर समस्यायें आयें, कठिनाइयां आयें और हम उन पर विजय प्राप्त करें। वही मनुष्य श्रेष्ठता प्राप्त कर सकता है, जो ऐसा करने में समर्थ हो।
विज्ञान इस बात को स्वीकार करता है कि जिन्होंने संघर्ष किया, जो संघर्षशील व्यक्ति हैं या जानवर अथवा जीव हैं वे ही जीवित रहें। जिनमें संघर्ष करने की क्षमता समाप्त हो गई है, वे मर गये। कुछ समय पहले आपने सुना होगा कि डायनासॉर होता था, जो संसार का सबसे लम्बा चौड़ा प्राणी था, मगरमच्छ, हाथी या व्हेल मछली तो उसके सामने एकदम तुच्छ प्राणी थे। आज से हजारों साल पहले आखिर डायनासॉर की मृत्यु हो गई और एक का भी अस्तित्व नहीं रहा, एक भी डायनासॉर जीवित नहीं रहा।
इतना बड़ा लम्बा-चौड़ा प्राणी जो कम से कम पांच सौ आदमी को अपने मुंह में भर सकता है। वह जीवित नहीं रहा और अन्य जीव-जन्तु जीवित हैं। आज से तीस हजार साल पहले भी मेंढक था और आज भी जीवित है। बाकी सब जातियां धीरे-धीरे नष्ट होती गयीं। ऐसा इसलिये कि मेंढ़क प्रत्येक परिस्थिति में जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। आपने देखा होगा कि बरसात में मेंढक पानी में तैरता है, आवाज करता है और जब बरसात समाप्त हो जाती है तो किसी खोखले पत्थर में वह मेढ़क घुस जाता है और उसके ऊपर एक परत आ जाती है।
मेंढ़क छः महीने उस पत्थर में रहता है और बाहर से उसको ऑक्सीजन मिलती ही नहीं। उसके बाद भी वह जीवित रहता है। तो जो जीव छः महीने बिना ऑक्सीजन के रह सकता है वह मर नहीं सकता, क्योंकि उसमें संघर्ष करने की क्षमता है, एक पॉवर है, एक ताकत है। वह अहसास करता है कि जीवन में संघर्ष है, कठिनाई है और कठिनाई होते हुये भी जीवित रहने की एक क्षमता और ताकत रखता है। इसलिये मेढ़क जीवित है, इसलिये ऊंट जीवित है कि वह तीस दिन तक बिना पानी के जीवित रह सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति भयभीत है, जब संसार में पैदा होता है, उस क्षण से लगाकर मृत्यु तक उसके जीवन में और कुछ नहीं होता, बस भय होता है। कृष्ण ने भी अर्जुन से यही कहा था गीता में, कि अर्जुन! तुम बहुत कायर और बुजदिल हो क्योंकि तुमने ऐसा ही अपने भीतर पैदा किया है। तुम भयभीत हो, तुममें ताकत और निर्भीकता नहीं है, तुममें क्षमता नहीं है, तुममें हौसला नहीं है।
अर्जुन को समझाने के लिये श्री कृष्ण कहते हैं- यदि तू संघर्ष कर विजय प्राप्त करेगा, तो लोग जय-जयकार करेंगे और आने वाली पांच हजार पीढि़यां तुम्हें याद रखेंगी। अर्जुन युद्ध के लिये तैयार हुआ, धनुष बाण हाथ में लिया, गांडीव हाथ में लिया और तीर संधान करके अपने सामने जितने भी खड़े थे उन्हें समाप्त कर के विजय प्राप्त की। यहां तक कि उसके पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु हो गई। द्रोणाचार्य, भीष्म की मृत्यु हो गई। मगर फिर भी सारे पांडव अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर और श्री कृष्ण जीवित रहे।
युद्ध तो दोनों में बराबर हो रहा था, लेकिन कौरवों में भय था कि हम हारेंगे, इसमें दो राय नहीं है, हम हार जायेंगे क्योंकि उधर कृष्ण बैठे हैं और पांडवों को पूर्ण विश्वास था कि हम हार ही नहीं सकते, क्योंकि हमारे साथ कृष्ण खड़े हैं। हम कहां से हारेंगे हारने का सवाल ही नहीं है।
कृष्ण हैं हमारे साथ तो हम हार नहीं सकते यह भरोसा पांडवों को था और इस भरोसे पर, विश्वास पर वे संघर्ष करते रहे, कृष्ण भले ही साथ थे, लेकिन संघर्ष तो करना ही पड़ेगा, कृष्ण बैठै-बिठाये विजयश्री नहीं प्रदान करते, क्योंकि कृष्ण कर्म, संघर्ष में विश्वास रखते हैं। इसलिये वह व्यक्ति जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करता है, जो संघर्ष कर सकता है, जो संघर्ष करने की क्षमता रखता है, जो संघर्ष को अपने जीवन में निमंत्रण देता है, जो अपने सामने संघर्ष उत्पन्न करता है और फिर संघर्ष से जूझता है, वही सफलता प्राप्त करता है, उसी को विजयश्री की प्राप्ति होती है और आनंद, असीम आनंद की प्राप्ति हो पाती है।
जो निर्भय होता है वह ही विजय प्राप्त कर सकता है और निर्भय तब आप हो सकते हैं, जब आपके सामने संघर्ष की स्थितियां आयें तब संघर्ष कर आप विजय प्राप्त कर सकें। विजयश्री का तात्पर्य है कि जो भी आपके जीवन में समस्यायें हैं उन पर सफलता प्राप्त हो और ऐसी क्षमता प्राप्त करने के लिये दैवीय बल की आवश्यकता होती है।
व्यक्ति के मृत्यु का मतलब है कि आज तक का जीवन जितना डरपोक था, गया बीता था, घटिया था, वह समाप्त हो जाये। आप नये मनुष्य के रूप में जन्म ले सकें, नवीनता प्रारंभ हो सके, नवीनता का संचार हो सके। इस साधना द्वारा साधक मनुष्य जीवन की चिंताओं, कठिनाइयों, बाधाओं, अड़चनों का समूल रूप से शमन कर सूर्य की भांति प्रकाशवान होता है और उस प्रकाश से उसका जीवन दैदीप्यमान बनता है। जीवन संग्राम विजयश्री साधना से साधक के भीतर दैवीय बल का उदय होता है, जिसके माध्यम से वह जीवन की प्रत्येक परिस्थतियों का सामना करते हुये सफलता अर्जित करने की क्षमता से युक्त हो जाता है।
अर्जुन की भांति जीवन की रणभूमि पर एक वीर योद्धा की तरह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ निरन्तर क्रियाशील रहता है और वह अपने जीवन संग्राम में पूर्ण विजयश्री की प्राप्ति करता है।
जन्माष्टमी की रात्रि 07:36 से 10 बजे के मध्य या किसी भी अष्टमी को दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर पीले आसन पर बैठ जायें। एक बड़ा दीपक जला लें, सर्वप्रथम मंत्र सिद्ध सर्वकार्य सिद्धि यंत्र व एक चावल की ढेरी पर स्थापित कर पूजन सम्पन्न करें, पश्चात् यंत्र के चारों ओर कृष्ण के अस्त्र शस्त्र के प्रतीक स्वरूप आठ सुपारी शंख, चक्र, गदा, पदम्, पाश, अंकुश, धनुष तथा शर को स्थापित करें, तथा प्रत्येक सुपारी पर कुंकुम, केसर, चावल चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
ऊँ शंखाय नमः, ऊँ चक्राय नमः, ऊँ गदायै
नमः, ऊँ पदमाय नमः, ऊँ पाशाय नमः, ऊँ अंकुशाय
नमः, ऊँ धनुषे नमः, ऊँ शराय नमः।
अब सभी ज्ञात-अज्ञात षड़यंत्रों, बाधाओं के शमन और जीवन में सर्व कार्यसिद्धि-सफलता का संकल्प लेकर जीवन संग्राम विजयश्री माला से मंत्र जप सम्पन्न करें-
पांच माला मंत्र जप के पश्चात् सभी सामग्री किसी पवित्र नदी में विसर्जित कर दें और घर आकर हाथ-पैर धुलकर 5 मिनट सद्गुरुदेव का ध्यान करें।
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