





वास्तव में सफेद दाग कुष्ठ (लेप्रोसी) रोग नहीं है। इसे कोढ़ मानना गलत धारणा है। यह रोग वंशानुक्रम से अपवाद स्वरूप ऐसा हो सकता है किन्तु अगली पीढ़ी में होना आवश्यक नहीं है। यह छूत की बीमारी नहीं है एवं न ही यह रोग रोगाणुजन्य है। इसमें किसी भी प्रकार का स्त्राव नहीं होता। रोगी को कोई शारीरिक तकलीफ नहीं होती, न ही जलन या खुजली ही होती। हालांकि शरीर कुरुप हो जाने की वजह से रोगी को मानसिक तनाव बना रहता है एवं वह एक प्रकार की हीन भावना से ग्रसित होने लगता है जबकि इन दागों से शरीर के किसी भी अंग पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता न ही स्वास्थ्य की हानि होती है।
इस रोग का मुख्य कारण बेमेल खाद्य पदार्थों का सेवन करना है, जैसे दूध के साथ मछली का सेवन, दूध के साथ बैंगन, मांस का सेवन, शराब पीकर दूध पीना, खट्टे पदार्थों के साथ दूध का सेवन आदि विरुद्ध गुण वाले पदार्थों के प्रयोग से यह संभावित है।
आहार-विहार में विरुद्धता के अलावा निम्न कारणों से सफेद दाग होता है। आंतों में कीड़े, कब्ज, खाद्य पदार्थों में मिलावट, जीर्ण पेचिश, आंतो से सम्बन्धित तथा कीटाणु जनित रोग, इंजेक्शनो का दुष्प्रभाव, एन्टीबायोटिक औषधियों का अधिक सेवन, बिन्दी, सिन्दूर का विपरीत प्रभाव, नशे की अधिकता, किसी पदार्थ के कारण एलर्जी, अधिक नमक का सेवन, हार्मोन्स की गड़बड़ी, लीवर में खराबी, दमा, एक्जिमा आदि, टायफाइड, अधिक मिर्च- मसालों, गरिष्ठ चीजों-चिकनाई युक्त खाद्य पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन, नायलोन की जुराब, प्लास्टिक के जूते गर्म ऋतु में पहनने पर इसकी शिकायत की संभावना होती है गरम जलवायु वाले स्थान पर मांस-मछली-अण्डों का अधिक सेवन भी हानिप्रद है। रोग होने का मुख्य कारण कब्ज, अजीर्ण, यकृत दोष होना है। इस तरह उदर विकार इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण है।
इस रोग में कहीं भी छोटे से सफेद दाग से शुरूआत होती है। मुख्यतः इसकी शुरुआत होठ, आंख, चेहरे, गर्दन एवं हाथ-पैर की उंगलियों के पोरों में होती है। धीरे-धीरे यह दाग फैलने लग जाता है कभी-कभी शरीर की सारी त्वचा सफेद हो जाती है। किसी व्यक्ति में यह रोग धीरे-धीरे फैलता है एवं किसी में तीव्रता के साथ। यह किसी भी आयु में हो सकता है एवं स्त्री-पुरुष दोनों को समान रूप से हो सकता है। कई बार यह रोग वर्षों तक बना रहने के बाद अचानक दूर हो जाता है। कुछ रोगियों में वर्षों तक रोग वृद्धि नहीं होती बिना घटे-बढ़े वैसे ही रह जाते हैं। किसी-किसी रोगी में दाग कई वर्षों तक नहीं बढ़ते लेकिन अचानक तीव्रता से सारे शरीर में फैल जाते हैं। सिर एवं आंखों के ऊपर वाले स्थान पर होने से वहां के बाल भी सफेद हो जाते हैं।
सफेद दाग असाध्य नहीं है किन्तु मुश्किल जरूर है। रोगी को किसी प्रकार की हीन भावना नहीं रखना चाहिये। इस रोग की चिकित्सा धैर्यपूर्वक करना चाहिये क्योंकि इसमें लम्बा समय लग सकता है। यदि दाग कम हो तो उपचार में कम समय भी लग सकता है अन्यथा महीनों से लेकर कुछ वर्ष भी लग जाते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में या जब तक रोग अधिक न फैला हो एवं अधिक पुराना न हो तो रोग ठीक होने की संभावना अधिक होती है, यदि सफेद दाग सम्पूर्ण शरीर में फैल गया हो तो ठीक होना मुश्किल है हालांकि असम्भव नही है।
इसके निदानार्थ आयुर्वेदिक औषधियों में बावची मुख्य है। साथ ही खान-पान सात्विक एवं शुद्ध रखना चाहिये। खाने में मिर्च-मसालों, दूध, दही, लस्सी, छाछ, चावल, केला आदि सफेद खाद्य पदार्थ, अचार, चटनी, खटाई, गुड, तली चीजों, शराब एवं धूम्रपान का भी सर्वथा त्याग करना चाहिये।
उपरोक्त सभी उपचार सफेद दाग में लाभप्रद है। कोई भी उपचार लम्बे समय तक धैर्यपूर्वक करने पर ही इच्छित लाभ की प्राप्ति संभव हो पाती है। इस रोग में शीघ्रता से लाभ की आशा ना करें तथा स्वयं को किसी भी निराशाजनक भावना से ग्रसित ना होने दें। पूर्ण आत्म विश्वास के साथ अपने जीवन को जीयें।
पंसारी की दुकान से 250 ग्राम बावची के बीज खरीद लें। काले रंग की गाय का मूत्र लेकर उसमें बावची के बीजों को भिगो दें। तीन दिन तक भिगोने के बाद जब बावची भीगकर फूल जाएं तब बावची के बीजों को निकालकर पीस लें, जब यह खूब बारीक हो जाये तो चने के बराबर गोलियां बनाकर छाया में सूखा लें एवं साफ पात्र में भरकर रख लें। एक गोली सुबह खाली पेट एवं एक गोली शाम चार बजे खाली पेट पानी के साथ लें। गोली लेने से दो घंटे पहले एवं बाद मे कुछ भी सेवन न करें। इस उपचार को लम्बे समय तक अपनाने से विशेष लाभ मिलता है।
साथ ही गोमूत्र में बावची को पीसकर गाढ़ा लेप बनाकर सफेद दागों पर लगाएं इससे शीघ्र लाभ होगा। इस लेप को प्रतिदिन सुबह गोमूत्र से धोएं तत्पश्चात् नया लेप करें। इस लेप को केवल सफेद दागों पर ही लगाना है। यदि लेप से छाले पड़ जायें या सूजन आ जायें तो लेप बन्द करके मक्खन उस स्थान पर लगायें या शुद्ध घी में कपूर मिलाकर ऊपर से लेप करें। इससे जलन एवं घाव शीघ्र ठीक होते हैं। छाले ठीक होते ही पुनः पूर्वानुसार लेप चालू कर दें। औषधि सेवन काल में गुड़, तेल, खटाई का परहेज जरूरी है। बावची खुश्क और गर्म होती है, अतः देशी घी का सेवन अवश्य करें।
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