





इसका सीधा सा उदाहरण है कि व्यक्ति को अपने जीवन के प्रारम्भ के चार-पांच वर्षो की स्मृति नहीं होती, उसके बचपन की यादे धुंधली सी होती है या नहीं होती है, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि हमारा बचपन ही नहीं था? उसी प्रकार यदि पूर्व जन्म की स्मृति नहीं है तो इस आधार पर पूर्वजन्म का अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता।
अनेक जन्मों की तृष्णायें, वासनायें, कर्म, पाप राशि, पुण्य कार्य मिलकर ही एक नये जन्म का आधार बनते हैं और केवल व्यक्ति के अपने कर्म ही नहीं, साथ में जन्म-जन्मान्तरों के पूर्वजों के कर्म भी उसके साथ जुड़े होते हैं। इसी से जीवन में और साधना में व्यक्ति को अनेक प्रकार की बाधायें, असफलतायें प्राप्त होती हैं। भारतीय दर्शन इस बात की पुष्टि करता है, कि हमारा जीवन स्वतंत्र नहीं है, अपितु पूर्व जीवन से पूर्णतः जुडा़ हुआ है। शरीर तो मर जाता है, किन्तु आत्मा उसी प्रकार से क्रमिक विकास की ओर गतिशील रहती है, अब तो वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं।
यह मानव-जीवन पुण्य कर्मों के आधार पर प्राप्त हुआ है, इसे यूं ही गंवा देना, तो अज्ञानता कही जाती है। अनेक- अनेक जीवों के रूप में जन्म लेने के बाद ही मनुष्य जीवन भी आधा-अधूरा अपूर्ण रह जाय तो फिर जीवन का अर्थ ही क्या रह जायेगा?
व्यक्ति अपनी निद्रावस्था में ही चलता रहता है और अपने पूरे जीवन को उसने नींद में ही क्रियाशील कर दिया है, इसलिए वह अपने जीवन को व्यर्थ के प्रयोजन में ढो रहा है, जिसका कोई लक्ष्य, कोई मर्म है ही नहीं। अब प्रश्न यह उठता है, कि क्या हमारा लक्ष्य इस पूरे जीवन को यूं नींद में ही व्यतीत कर देना है? क्या यही वास्तविक रूप में जीवन है? नहीं, वह व्यक्ति तो मृतवत् ही है, जो अपने कंधों पर अपनी ही लाश को ढोये जा रहा है और दुःख, विषाद, मलिनता को ही जीवन मान बैठा है, ऐसा जीवन तो कीड़े-मकौड़े, पशु-पक्षी जीते हैं।
यह मनुष्य-शरीर जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। भगवान की कृपा से ही जीव मनुष्य-शरीर धारण करता है। आज तक जितने भी महान पुरुष हुये हैं, वे सब मानव देहधारी ही तो है। यह मानव शरीर विशिष्ट हेतु ही प्राप्त होता है और जो उस हेतु को समझ लेता है, वह जन्म-मरण के चक्रव्यूह को तोड़ कर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि वह भली-भांति समझ लेता है, कि मनुष्य जन्म विषय भोगों को भोगने के लिए नहीं है।
किन्तु जो इस उत्तम देह अर्थात् मनुष्य तन को पाकर भी अपनी आत्मा का कल्याण नहीं करता, वह कृतघ्न है, मूर्ख है, अज्ञानी है। मनुष्य का आवागमन अर्थात् विभिन्न योनियों में जन्म लेने और मरने के क्रम से मुक्त हो जाना ही पूर्णता है। आज के युग में मनुष्य को देखते ही हमें यह अनुमान हो जाता है, कि वह प्रसन्न है या दुःखी, क्योंकि उसके माथे की सिकुड़न और चेहरे की रेखाएं यह प्रदर्शित कर देती हैं, कि उसके मन की स्थिति कैसी है? मनुष्य होना कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं और मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह कर्म-पथ पर आगे बढ़ता हुआ ऊर्ध्वमुखी बने।
अब और नहीं भटकना पड़ेगा, क्योंकि आप भी अपने पूर्वजन्मकृत दोषों का निवारण कर, चौरासी लाख योनियों से छुटकारा पाकर इसी जीवन में साधना एवं तपस्या के बल से सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने में समर्थ हो सकते हैं, यदि आपको उस मंत्र शक्ति का पूर्णतया भान हो तो और जब ऐसा हो जायेगा, जब उस चिन्तन का अर्थ अपने-आप ही समझ में आ जायेगा, कि कैसे इस जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त की जा सकती है और वह भी इसी जीवन में।
आज का मानव यही सोचकर बैठा है, कि सुख आज नहीं तो कल प्राप्त हो जायेगा और इस तरह अपने कई जन्मों को गंवा दिया, फलस्वरूप हर बार नया जन्म लेना पड़ता है और यह आवागमन का चक्र निरन्तर चलता रहता है, क्योंकि उसने सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ रखा है।
अभी तक उसका चिन्तन चला आ रहा है और वही उसे हर बार मृत्यु की ओर ढ़केल देता है। यह जन्म-मरण का खेल और दुःख, दैन्य, पीड़ा, रोग, शोक, किसी भी कार्य में असफलता हमें अपने कर्मों के द्वारा ही मिलती है।
यदि इसी जीवन में पूर्ण होना है, सफल होना है, अपने जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाना है तथा समस्त दोष बाधाओं को समाप्त कर भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना है और एक मानवीय जीवन के लिए अपेक्षित समस्त सुख-भोगों को पाना है, तो पापाकुंशा साधना सर्वोत्तम है।
पापाकुंशा का तात्पर्य है- पूर्व जन्म के पाप-दोषों के फलस्वरूप प्राप्त जीवन में दुःख, संताप स्वरूप जीवन के अधूरेपन को, अधंकार पूर्ण क्षणों को दुःख और दारिद्रय से अनुपीडि़त दुर्भाग्य से दूषित रेखा को सौभाग्य में बदल देना, जिससे जीवन पथ निरन्तर गतिशील व ऊर्ध्वमुखी हो और जब ऐसा हो जायेगा, तो सफलता स्वयं आपके कदम चूमेगी, फिर कोई दुःख जीवन में कैसे रह सकता है फिर दरिद्रता, निर्धनता कैसे रह सकती है फिर कोई अभाव रहेगा ही नहीं।
यह साधना अपने-आप में श्रेष्ठ और अद्वितीय है, ऐसी तीक्ष्ण प्रभावकारी साधना है जो आगे-पीछे के समस्त पापों से मुक्त कर जीवन को प्रभावशाली और सर्वश्रेष्ठ बना देती है, एक-एक कर जीवन के समस्त अवरोधों को हटाना ही पापाकुंशा साधना है।
शारदीय नवरात्रि शक्ति पर्व की पूर्णता दिवस 09 अक्टूबर को सांध्य बेला में स्नानादि से निवृत्त होकर पीली धोती पहनें और गुरु चादर ओढ़ कर काले आसन पर पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर बैठ जायें। अपने सामने चौकी पर काला वस्त्र बिछाकर प्लेट में पाप मुक्ति यंत्र, पापाकुंशा गुटिका स्थापित कर दें। इसके पश्चात् यंत्र का गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कराकर कुंकुम अर्पित करें व गुटिका का गंधाक्षत, पुष्प आदि से पूजन कर धूप-दीप दिखायें।
साधक आसन पर खड़े होकर ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं का पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिशाओं की ओर मुंह करके पापमोचिनी माला से एक-एक माला मंत्र जप करें। इसके बाद पहले की तरह पश्चिम की ओर मुंह कर आसन पर बैठकर मूल मंत्र का 11 माला मंत्र जप करें।
फिर एक माला गुरु मंत्र का जप करें, साधना पश्चात् एक माला गुरु मंत्र जप कर सम्पूर्ण साधना सद्गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर दें। साधना पूर्णता के दूसरे दिन सभी सामग्री को किसी नदी में विसर्जित कर दें तथा मुड़कर ना देखे, घर आकर, हाथ-पैर धोकर तीन बार आचमन करें।
पापाकुंशा साधना सम्पन्न साधक के जीवन में नये संकल्पों का उदय होता है। जिस प्रकार छोटी सी भूमि पर माली अपने हाथों से बीज बोकर भविष्य के लिए छायादार, फ़लदार वृक्ष रोपित कर लेता है और वह शीतल छाया और मीठे फ़लों का अधिकारी बन जाता है।
उसी तरह प्रत्येक मनुष्य साधना, पूजा, दीक्षा द्वारा जीवन की विषमताओं का शमन कर पूर्ण अनुकूल जीवन का अधिकार प्राप्त कर लेता है।
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