





भगवान विष्णु के अवतरण प्रत्येक युग में सम्भव हुये हैं और होते रहेंगे, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण की पुष्टि केवल जन सामान्य की भावनाओं के आधार पर ही नहीं वरन् शास्त्रीय आधार पर भी की जा सकती है, जहां सभी शास्त्रों ने एक मत होकर श्रीकृष्ण अवतरण को ही सम्पूर्ण माना है, जीवन के भौतिक पक्षों के प्रति भी और जीवन के आध्यात्मिक पक्षों के प्रति भी।
भगवान श्रीकृष्ण की प्रचलित छवि में उन्हें ईश्वर तो माना गया, किन्तु उनके साथ जुड़े साधना पक्ष और उनकी प्रबल आध्यात्मिकता की उपेक्षा कर दी गई, जबकि इस बात के पूर्ण प्रमाण मिलते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण कुशल तंत्रवेता और साधक भी थे, जिन्होंने शिष्य रूप में अपने गुरु सांदीपन के आश्रम में रहकर अनेक साधनाओं को आत्मसात किया।
भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी अनेक कथाओं के पीछे भी उनके साधक होने की कथा ही निहित है, जिसे अलौकिकता का आवरण दे दिया गया है, उनसे जुड़ा साधना पक्ष भुला दिया गया है। अनेक राक्षसों का वध या अपने गुरु के मृत पुत्र को जीवित करने जैसी अनेक घटनाएं उनकी इसी विलक्षणता की परिचायक है।
वस्तुतः कृष्ण शब्द ही अपने आप में जीवन का अत्यन्त गंभीर रहस्य समेटे है। इस शब्द में जहां क काम सूचक है, वहीं ऋ श्रेष्ठ शक्ति का प्रतीक है, ष विभिन्न कलाओं का रहस्य समेटे है तो ण निर्वाण का बोध कराने में समर्थ है और इस प्रकार कृष्ण शब्द का तात्पर्य है, जो सामर्थ्य पूर्वक पूर्ण भोग व मोक्ष दोनों की समान गति बनाये रखे। इसी कारणवश भगवान कृष्ण की आराधना अपने आप में पूर्ण कही गई।
कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में जो ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया, वह अत्यन्त ही विशिष्ट तथा समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार करने वाला है। उन्होंने अर्जुन का मोह भंग करते हुये कहा-
हे अर्जुन! तू कभी न शोक करने वाले व्यक्त्यिों के लिये शोक करता और अपने आप को विद्वान भी कहता है, परन्तु जो विद्वान होते हैं, वे जो जीवित हैं उनके लिये और जो जीवित नहीं है उनके लिये भी, शोक नहीं करते। इस प्रकार जो ज्ञान कृष्ण ने अर्जुन को दिया, वह अपने आप में प्रहारात्मक है और अधर्म का नाश करने वाला है।
कृष्ण ने अपने जीवन काल में शुद्धता, पवित्रता एवं कर्मेण्ये पर ही अधिक बल दिया, अधर्म, व्यभिचार, असत्य के मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उन्होंने वध करने योग्य ठहराया, फिर वह चाहे परिवार का सदस्य ही क्यों ना हो और सम्पूर्ण महाभारत एक प्रकार से पारिवारिक युद्ध ही तो था। कृष्ण ने स्वयं अपने मामा कंस का वध कर, अपने नाना को कारागार से मुक्त करवा कर उन्हें पुनः मथुरा का राज्य प्रदान किया, और जब वे युवावस्था में आयें तो शिशुपाल का वध किया और निर्लिप्त भाव से रहते हुये कृष्ण ने धर्म की स्थापना कर सदैव सुकर्म को ही बढ़ावा दिया।
कृष्ण के जीवन में राजनीति, संगीत जैसे विषय भी पूर्णरूप से समाहित थे और जब उन्होंने अपने जीवन में अध्यात्म को उतारा, तो उतारते ही चले गये और चौसठ कला पूर्ण होकर योगेश्वर कहलाये। जहां उन्होंने प्रेम, त्याग और श्रद्धा जैसे दुरुह विषयों को समाज के सामने रखा, वहीं जब समाज में झूठ, असत्य, व्यभिचार और पाखंड का बोलबाला बढ़ गया, तो उस समय वे एक वीर पुरुष की तरह सामने आये। महाभारत युद्ध के दौरान जिस प्रकार से कृष्ण ने युद्धनीति, रणनीति तथा कुशलता का प्रदर्शन किया, वह अपने आप में श्रेष्ठतम है।
कृष्ण के नाम से समस्त विश्व परिचित है, शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो कृष्ण से परिचिति न हो। जन-मानस में जो कृष्ण की छवि है, वही उनमें ईश्वरत्व होने का प्रमाण है, क्योंकि इन कलाओं का आरम्भ ही अपने आप में ईश्वर होने की पहचान है, फिर वे तो चौसठ कला पूर्ण देव पुरुष है।
भारतीय समाज ने जितना अधिक योगेश्वर श्रीकृष्ण के चरित्र का अनुसरण किया, शायद ही उतना किसी अन्य देवी-देवता के चरित्र के प्रति आकर्षित रहें हों। उनके विराट चरित्र का अध्ययन कर यह रहस्य स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है, कि उनके बताये मार्गों का अनुसरण करना, उनकी दिव्यता, चेतना, कलाओं का स्वयं में पूर्णता से समावेश करना सांसारिक जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
जिन परिस्थितियों में आज का मानव जीवन यापन कर रहा है, वे स्थितियां भगवान कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन में रहीं हैं। सदा वे अपने ही घर के शत्रुओं से घिरे रहें हैं। उनके जीवन की अधिकांश लड़ाईयां अपनो के मध्य ही हुई, कहीं पर वे सामंजस्य स्थापित कर समस्याओं का निदान करते हुए दिखें, कहीं पर उन्होंने रण कौशल का सहारा लिया और कहीं पर महाभारत जैसे युद्ध के नियन्ता बने और ऐसा भी नहीं कि उनके जीवन में केवल युद्ध ही युद्ध रहा, वे सम्पूर्ण प्रेम के साकार रूप भी हैं, उनके जीवन में हास्य, आनन्द, नृत्य, प्रेम, रस, आनन्द, सौन्दर्य, सम्मोहन का भी पूर्णता से समावेश है। वे कुशल राजनीतिज्ञ-कूटनीतिज्ञ भी हैं, वे श्रेष्ठ शासक भी हैं, पूर्ण प्रेमी भी हैं, रणक्षेत्र में अपराजित योद्धा भी हैं तो वहीं पूर्ण भोगी भी हैं और इन सबमें उनकी कोई आसक्ति भी नहीं है, इसलिए वे योगियों के भी योगेश्वर हैं। इतने विराट व्यक्तित्व के स्वामी होते हुए भी उनमें जरा सा भी दम्भ, अहंकार नहीं है, जिसका प्रतीक उनके मित्रवत प्रेम सुदामा-कृष्ण के चरित्र में स्पष्ट होता है।
ऐसे सम्पूर्ण कलापूर्ण व्यक्तित्व की दिव्यता और चेतना को आत्मसात करने की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति में होती है, क्योंकि यही वह आधार है, जिसके द्वारा सांसारिक जीवन को सरल, सहज और श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। चौसठ कला प्राप्ति दीक्षा से नित्य जीवन में आने वाले संघर्षों का व्यक्ति श्रेष्ठता से सामना कर पूर्णता विजयी होता है और आवश्यकता अनुसार जीवन के सभी पक्षों में सामंजस्य बनाने में सफल हो पाता है साथ ही जीवन की सभी कलाओं में निपुण बनकर सामाजिक, पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करने में समर्थ होता है। सत्य तो यह है कि सांसारिक जीवन में अधिकांश समस्या अपनों के मध्य होती है, जिसमें अत्यधिक कुशलता, निपुणता, चार्तुयता की आवश्यकता होती है और ये स्थितियां भगवान श्रीकृष्ण की चौसठ कला चेतना स्वरूप में आत्मसात करने से स्वतः ही प्राप्त होने लगती हैं, जिससे साधक सर्व सफलता युक्त जीवन व्यतीत करता हुआ योग-भोग दोनो में पूर्णता प्राप्त करते हुये जीवन को वसन्तोमय निर्मित करता है।
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