





इस दिन दान पुण्य को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। इस दिन किसी भी तरह का दान धर्म, व्रत, स्नान, पूजन, तर्पण करते हैं, तो उसका अक्षय फल प्राप्त होता है। इसका फल न सिर्फ इस जन्म में बल्कि आने वाले जन्मों में भी इस पुण्य का लाभ प्राप्त होता है। अक्षय नवमी को अक्षय तृतीया के समान महत्वपूर्ण माना गया है। अत: इस दिन साधनात्मक कार्य करने से मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति होती है। मातायें अपनी संतान के शतायु जीवन हेतु इस दिन व्रत करती हैं।
चिरकाल में सुख-समृद्धि की दात्री मां लक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण करने हेतु धरा पर आईं। उस समय उन्होंने पृथ्वी पर देखा कि सभी लोग भगवान शिव और भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना कर रहे हैं। यह देख उनके मन में भी दोनों देवों की पूजा करने का ख्याल आया। हालांकि, दोंनो देवों की एक साथ कैसे पूजा की जाए, यह सोच मां लक्ष्मी विचार मग्न हो गईं।
कुछ पल विचार मग्न होने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि धरा पर तो दोनों देवों की एकसाथ पूजा केवल और केवल आंवले के पेड़ के सन्मुख की जा सकती है। ऐसा कहा जाता है कि आंवला में बेल और तुलसी दोनों गुण पाए जाते हैं।
इसके पश्चात, मां लक्ष्मी ने विधि-विधान से आवंले पेड़ (भगवान शिव और विष्णु जी) की पूजा की। मां लक्ष्मी की भक्ति देख दोनों देव प्रकट हुए। उस समय मां लक्ष्मी ने आंवला पेड़ के पास भोजन पकाया और दोनों देवों को भोजन कराया। उस समय से हर वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर अक्षय नवमी मनाई जाती है।
उपासक को इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नान करना चाहिये , इसके बाद आंवले के पेड़ के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर ‘ऊँ उधात्र्ये नम:’ मंत्र से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धार गिराते हुये पितरों का तर्पण करना चाहिये।
इसके पश्चात् पेड़ पर आठ बार रोली से बांधना चाहिये व अक्षत, फल-फूल आदि से आंवले के पेड़ की पूजा अर्चना करना चाहिए। साथ ही आंवले के पेड़ की 108 बार परिक्रमा करनी चाहिये।
परिक्रमा सम्पन्न होने के बाद व्रत कथा का पाठ करें व दीपक प्रज्जवलित कर भगवान विष्णु की आरती सम्पन्न करें।
अब खीर, पुड़ी, सब्जी व मिष्ठान आदि का भोग लगायें व सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। इसके साथ आपकी पूजा सम्पन्न होती है।
अक्षय नवमी के दिन आंवले का वृक्ष घर में लगाना वास्तु की दृष्टि से शुभ माना जाता है। वृक्ष को पूर्व दिशा में लगाने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। इसे घर की उत्तर दिशा में भी लगाया जाता है।
जिन बच्चों की स्मरण शक्ति कमजोर हो तथा पढ़ाई में मन नहीं लगता हो, उनकी पुस्तकों में आवलें की हरी पत्तियों को रखना चाहिये।
प्राचीन काल से ही इस पर्व को पूर्ण विधि-विधान से सम्पन्न किया जाता है। वर्ष भर में ऐसे विशेष पर्व व दिवस बहुत कम ही होते है, जो हमें हमारे जीवनभर के पुण्य भाव एक समय में ही प्रदान करते हैं। अत: इस विशेष पर्व को सभी साधकों को अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।
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