





संन्यासी परमात्मा से कोई अपेक्षा नहीं करता। यही उसका संबंध बनता है। परमात्मा जो करता है, उसके लिये राजी है। क्रोध नहीं करता कि इससे अन्यथा होना था। परमात्मा से भी मोह नहीं बनाता। नहीं तो कोई भी निमित्त मोह के लिये कारण बन जाता है।
एक ही उनका स्वाद और एक ही उनका रस है। व्यक्तियों से नहीं है वह स्वाद। वस्तुओं से नहीं है वह स्वाद। वह रस व्यक्तियों से नहीं, वस्तुओं से नहीं। वह रस और स्वाद उनका सिर्फ परमात्मा से है। लेकिन वहां भी वे भय, मोह, शोक और क्रोध का संबंध नहीं बनाते।
संन्यासी का एक ही रस है, एक ही स्वाद है, परम सत्ता की तरफ। और यह स्वाद तभी पैदा हो सकता है, जब ये चार ऊपर के स्वाद गिर गये हो, नहीं तो यह पैदा नहीं हो सकता। अगर ये चार स्वाद बने रहे, क्रोध के, मोह के, शोक के, ये स्वाद बने रहें, तो यह परम सत्ता की तरफ बहने वाला रस, यह रसधार पैदा नहीं होती। अनियामकत्व, अनुशासन-मुक्ति ही उनकी निर्मल शक्ति है। वे अपने को अनुशासन में बांधते नहीं, वे व्रत नहीं लेते, नियम नहीं लेते। वे कोई मर्यादा नहीं बांधते। वे ऐसा नहीं कहते है कि मैं ऐसा करूंगा। ऐसी कसम नहीं खाते। अनियम में जीते है। हम तो सोचते है, सन्यासी को एक अनुशासन में जीना चाहिये।
संन्यासी का कोई नियम नहीं है। संन्यास का कोई नियम नहीं है। असल में सब नियमों के बाहर हो जाना संन्यास है। घबराहट होगी मन को। अगर सब नियम टूट गये, तब तो सब अस्त-व्यस्त, अराजक हो जायेगा। तब तो जिंदगी की सारी व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जायेगी। क्योंकि इस अवस्था तक आने के लिये मोह, लोभ, काम, क्रोध ये सब विसर्जित हो जाये, परमात्मा ही रस रह जाये, फिर अनियामकपन। जिसका काम न रहा, क्रोध न रहा, जिसका मोह न रहा, लोभ न रहा, भय न रहा, अब उस पर नियम की और क्या जरूरत रही, और अगर अब भी नियम की जरूरत है, तो स्वतंत्रता कब मिलेगी फिर? और जिसका परमात्मा ही रस रह गया, अब उसके लिये नियम की क्या जरूरत रही।
सन्यासी रेल की तरह पटरियों पर नहीं दौड़ सकता। वह सरिताओं की तरह स्वतंत्र है। सागर ही उसकी खोज है। वह सरिताओं की तरह स्वतंत्र हैं रेल की बंधी हुई पटरियां, जिन पर रेलगाड़ी के डिब्बे दौड़ते रहते है, वह गृहस्थ का ढंग है जीने का। गृहस्थ रेलगाड़ी की पटरियों पर दौड़ता रहता है। और अक्सर तो कहीं नहीं पहुँचता। कोई स्टेशन कभी आता ही नहीं, शंटिग ही चलती है। क्योंकि पत्नी इस तरफ जाती है, पति उस तरफ जाता है, बेटा उस तरफ जाता है, शंटिग होती रहती है। धीरे-धीरे डिब्बे जीर्ण-जर्जर होकर वहीं गिर जाते है। कोई यात्रा कभी पूरी नहीं हो पाती।
गृहस्थ भारी बोझ और सामान लिये हुये चल रहा है। बोझ इतना है कि चलना हो नहीं पाता और बोझ बढ़ाता चला जाता है। रोज बोझ बढ़ता चला जाता है। पुराना तो रहता ही है, नये को इकट्टा करता चला जाता है। आखिर में उसी बोझ के नीचे दबकर मरता है। नियम जरूरी है गृहस्थ की दुनिया में, क्योंकि इतने रोग हैं वहाँ कि अगर चारों तरफ सिपाही बंदूकें लिये न खड़े हो, तो बड़ी कठिनाई हो जाये। संन्यासी के लिये नियम का कोई सवाल न रहा, क्योंकि जिस चीज के लिये हम नियम करते थे, उसको छोड़ने को ही ऋषि संन्यास कह रहा है।
संन्यासी तो मुक्त है। उस पर कोई नियम हम नहीं रखते, क्योंकि हम मानते हैं कि वह अपने को धोखा नहीं देगा। बस, इतना ही सूत्र है उसका, अपने को वह धोखा नहीं देगा। और जिसे यह पता चल गया कि अपने को धोखा नहीं दिया जा सकता, तब एक नया अनुशासन पैदा होता है, जो आंतरिक है, जिसे ऊपर से आयोजित नहीं करना पड़ता। संन्यासी ऐसा नहीं कहता कि मैं सत्य बोलूंगा। जब भी घटना घटती है, वह सत्य बोलता है। संन्यासी ऐसा नहीं कहता कि मैं चोरी नहीं करूंगा। जब भी ऐसा अवसर आये, तो वह चोरी नहीं करता है। ये एक भीतरी अनुशासन है और बाहरी कोई अनुशासन नहीं है।
लेकिन कोई अगर सोचता हो कि यह तो बहुत बढ़िया बात हुई। संन्यासी हो जायें और अनियामकपन में प्रवेश कर जायें। अनियामकपन बड़े नियमन से आता है। अनियामकपन की स्थिति और हैसियत बड़ी यात्रा से पैदा होती है। बड़ी साधना से जन्मती है। कोई सोचे कि हम यहीं, इसी क्षण अनियम में उतर जायें, तो सिर्फ अराजकता में उतर जायेगा। और अराजकता में उतर कर बड़ा दुःखी हो जायेगा। क्योंकि उसकी खुद की अपेक्षाएं दूसरों से तो यही रहेंगी कि वे नियम पालन करें। अराजक जो अपने को बना रहा है, वह भी आपकी व्यवस्था पर निर्भर होता है।
हमारी जो व्यवस्था है, नियम है, वह तभी तक लागू है, तभी एक अर्थपूर्ण है, जब तक हम अपने लिये अलग और दूसरे के लिये अलग नियम की मांग करते चले जाते है। संन्यासी जो अपने लिये मानता है, वही सबके लिये मानता है। फिर अनियामक हो सकता है। फिर कोई उसे नियम बांधने की कोई जरूरत नहीं है।
हम जिन नियमों का अनुसरण करके जीते है, जिनके बिना हमें लगता है हम जी ही न सकेंगे, उसका कारण है भीतर छिपी हुई बीमारियां। बीमारियां ही न हो, तो इन नियमों का पीछा जो करेगा, मरेगा, झंझट में पड़ेगा। अगर संन्यासी नियमों का पालन करेगा, तो झंझट में पड़ेगा, रूग्ण होगा, परेशान हो जायेगा। क्योंकि जो बीमारी ही नहीं है, उसकी दवा पीता रहेगा।
सब मानते है कि शक्ति तो अनुशासनबद्ध होने में है। मिलिट्री की ताकत यही है कि वह अनुशासनबद्ध है। और जितनी अनुशासनबद्ध है, उतनी शक्तिशाली है। शक्ति तो पैदा होती है, अनुशासन से। यह ऋषि कहता है कि अनियामकपन ही उनकी निर्मल शक्ति है।
असल में अनुशासन से जो शक्ति पैदा होती है, वह दूषित होती है। और इसलिये जहाँ-जहां हमें दूषित शक्ति का उपयोग करना पड़ता है, वहां डिसिप्लिन थोपनी पड़ती है। जहाँ-जहाँ हमें कुछ उपद्रव खड़ा करना पड़ता है, या उपद्रव को दबाने के लिये कोई दूसरा उपद्रव उसके प्रतिकार में खड़ा करना पड़ता है, वहां-वहां दूषित शक्ति का उपयोग होता है। दूषित शक्ति तथाकथित अनुशासन से पैदा होती है।
हम भारतीय है, हमारी खून और हड्डी में अनुशासन नहीं है। उसके कारण, वह सौभाग्य है ऐसे, क्योंकि उसकी वजह से हमने भला कितने दुःख सहे हो, लेकिन हमने किसी को दुःख नहीं दिया। हमने भला कितनी गुलामी सही हो, लेकिन हम किसी को गुलाम बनाने नहीं गये। उसके जाने के लिये बहुत अनुशासित होना जरूरी है। वह काम हमसे नहीं हो सकता। और उसका कारण क्या है कि इस मुल्क में अनुशासन नहीं पैदा हुआ? उसका कारण है कि इस मुल्क का जो श्रेष्ठतम व्यक्ति था, वह अनुशासनमुक्त था। और श्रेष्ठतम को देखकर लोग चलते हैं।
हम बुद्ध पैदा कर सके, महावीर पैदा कर सके, पतंजलि पैदा कर सके। ये बहुत और तरह के लोग है- अनियामक। ये अनुशासनमुक्त इनकी कोई घोषणा नहीं कर सकता कि ये कल सुबह क्या करेंगे, क्या कहेंगे, क्या होगा, कुछ नहीं कहा जा सकता।
अनियम से जो शक्ति आती है, वह बड़ी निर्मल है। फर्क उसका ऐसा समझे। शक्ति तो वह भी है। आग जलती है, तो गर्मी पैदा होती है। पास जायें, तो जलन पैदा होती है। हाथ लगा दें, तो जल जाते है। लेकिन ठंडा आलोक भी होता है, जो सिर्फ स्पर्श करता है, लेकिन कोई ऊष्मा नहीं होती। रात चांद भी निकलता है, उसका भी प्रकाश है। दिन में सूरज भी निकलता है, उसका भी प्रकाश है। लेकिन चांद का प्रकाश बड़ा शीतल है, आघात नहीं करता। छूता है, फिर भी स्पर्श का पता नहीं चलता, बहुत शीतल है।
शक्ति के भी दो रूप है, एक तो बहुत उष्ण, जब वह हिंसा बन जाती है और दूसरे को छेदने लगती है। और एक बहुत निर्मल और शीतल, चांद जैसी, जब वह दूसरे को सिर्फ सहलाती है, छूती है, लेकिन कहीं कोई अघात नहीं होता। पद-चाप भी नहीं होता, पैरों की आवाज भी नहीं मालूम पड़ती। बुद्ध आपके पास से निकल जाये, तो ऐसे निकल जाते है जैसे कोई भी निकला हो।
एक तामसिक शक्ति है, जिसका मजा यही है कि वह आपको धूल चटा दे, जमीन पर गिरा दे, और बता दे कि मैं हूँ। निर्मल शक्ति वह है, जो आपको कभी नहीं बताती कि मैं हूँ। निर्मल शक्ति ऐसी अनुपस्थित होती है, जैसे परमात्मा अनुपस्थित है। पर ऐसी निर्मल शक्ति नियम से पैदा नहीं होती, आयोजन से पैदा नहीं होती, संगठन से पैदा नहीं होती। ऐसी शक्ति परम अनियामकपन में रहने से पैदा होती है।
ऐसे अनियामकपन को उपलब्ध हुई ऊर्जा, यह जो विराट प्रपंच है, इसको छेदकर परम ब्रह्म में प्रवेश कर जाती है। अगर जगत में कुछ बनना हो तो तामसिक शक्ति चाहिये- दूषित, अंधेरी, ब्लैक। अगर इस जगत के पार जाना हो तो शुभ, निर्मल, शांत, पगध्वनि-शून्य शक्ति चाहिये। अगर जगत में कुछ करना हो, तो अनुशासन के बिना नहीं होगा, और अगर जगत के प्रपंच के पार यात्रा करनी हो, तो सब अनुशासन छोड़कर परम अनुशासनहीनता में, परम अनुशासनमुक्ति में प्रवेश करना पड़ता है।
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