





कामदेव को पुरूष का स्वरूप तथा रति को स्त्री शक्ति का स्वरूप माना गया है और इस संबंध में जितने ग्रन्थ, काव्य रचनाएं लिखी गई है, उतनी रचनाएं शायद ही किसी अन्य विषय के संबंध में लिखी गई हों।
संस्कृत के काव्य हों अथवा तंत्र के ग्रंथ, उनमें विवरण तो बहुत अधिक दिया गया है लेकिन यह साधना सिद्ध रूप से कैसे की जा सकती है, इसका वास्तविक स्वरूप क्या है, और इसे जीवन में कैसे उतारा जाय, इसका वर्णन बहुत कम दिया गया है।
हर कोई पुरूष जन्म से सुन्दर और आकर्षक नहीं हो सकता, और हर स्त्री पूर्ण सुन्दरता से युक्त नहीं हो सकती, लेकिन क्या ऐसा संभव है, कि इस रूप से सिद्ध साधना की जाय कि कामदेव स्वयं पुरूष के भीतर स्थित हो जाये तथा रति स्त्री के भीतर स्थित हो जाये, जिससे रूप और यौवन, आकर्षक भीतर ही भीतर बन कर प्रस्फुटित हो।
जो असंभव है, अप्राप्त है, उसे ही तो संभव करना है, प्राप्त करना साधना सिद्धि है, और कामदेव रति प्रयोग तो आधार है जीवन का, जीवन से काम को अलग कर देने का तात्पर्य है- पुष्प में से उसकी सुगन्ध को, उसकी बहार को हटा देना, उसके बिना फिर पुष्प का तात्पर्य ही क्या है, सुगन्ध और ताजगी ही तो आधार है, इसी प्रकार काम जीवन की सुगन्ध है, जिसे गलत समझना जीवन के मूलभूत आधार का निरादर करना है।
इन सब स्थितियों में कामदेव रति साधना सम्पन्न करनी चाहिये, यह आनन्द पर्व साधना है, इसमें किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिये, क्योंकि तन, मन, मस्तिष्क और हृदय सबका सम्पूर्ण मिलन, समन्वय आधार है कामदेव साधना में सिद्धि का।
यही एक ऐसी साधना है, जिसके लिये किसी विशेष मुहूर्त की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसे तो किसी भी दिन रात्रि में, सायंकाल के पश्चात् सम्पन्न किया जा सकता है, रात्रिकालीन इस साधना में नृत्य, गायन एवं जागरण का मंच जप के साथ पूरा अनुष्ठान है, इस साधना के लिये शुक्रवार का दिन अन्य दिनों की अपेक्षा सिद्ध मुहूर्त माना गया है।
‘‘अनंग उपनिषद्’’ ग्रंथ तो इस सम्पूर्ण विषय पर लिखा गया एक मात्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसकी प्रामाणिकता के बारे में संदेह ही नहीं किया जा सकता, प्राचीन ऋषियों ने इस विषय पर इस महान् ग्रन्थ की रचना कर इसमें नये-नये प्रयोग जोड़ कर वेदोक्त साधनाओं के समान बराबर का स्थान दिया है क्योंकि यह साधना भी उतनी ही आवश्यक है जितनी जीवन में अन्य साधनाएं।
यही सही है कि जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिये काम पर विजय प्राप्त करनी चाहिये, लेकिन सम्पूर्णता तथा मोक्ष की प्राप्ति काम से बच कर नहीं हो सकती, इस पर विजय प्राप्त करने के लिये इसमें सिद्धि प्राप्त करनी ही होगी, तभी पूर्णता आ सकेगी जीवन में।
इस साधना में ‘अनंग यंत्र’ ‘रति प्रीति सप्तबिन्दु मुद्रिका’ ‘आनन्द मंजरी माला’ के अतिरिक्त पुष्प मालाएं, कपूर, इत्र, अगर, कुंकुंम, आंवला,चंदन, पुष्प, वृक्षों के पत्ते, पीला वस्त्र, सफेद, काला, लाल व पीला रंग अर्थात् गुलाल और अबीर आवश्यक है।
इस साधना में आठ प्रकार के कामदेव की पूजा सम्पन्न की जाती है, जिससे पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो।
अनंग उपनिषद ग्रन्थ में कथन है कि साधना से पूर्व ही साधक को वृक्ष के पत्ते, डालियां ला कर उन्हें जल से धो कर निम्न मंत्र से पूजन करना चाहिये।
अर्थात् हे वृक्ष देव उस कामदेव की पूजा करता हूं, जिनकी पूजा से सब प्रकार के शोक नष्ट हो जाते है और कामदेव रति उन शोक इत्यादि को नष्ट कर नित्य आनन्द से भर देते हैं।
इसे पीले कपड़े से ढक कर अपने पूजा स्थान में रखना चाहिये।
अब साधक अपने सामने चावल की आठ ढेरी बना कर उस पर ‘आठ लघु नारियल’ स्थापित कर आठ कामों का पृथक पूजन करें, ये आठ काम है- काम, भस्म शरीर, अनंग, मन्मथ, बसन्तसखा, स्मर, इक्षुधनुर्धर एवं पुष्पबाण इनका पूजन क्रम निम्न प्रकार से है :-
कपूर से – ऊँ क्लीं कामाय नमः।
गोरोचन से – ऊँ क्लीं भस्मशरीराय नमः।
इत्र से – ऊँ क्लीं अनंगाय नमः।
अगर से – ऊँ क्लीं मन्मथाय नमः।
कुंकुंम से – ऊँ क्लीं वसन्तसखाय नमः।
आंवला से – ऊँ क्लीं स्मराय नमः।
चंदन से – ऊँ क्लीं इक्षुधनुर्धराय नमः।
पुष्पों से – ऊँ क्लीं पुष्पबाणाय नमः।
अब अपने सामने रखे हुए यंत्र तथा ‘रति प्रीति मुद्रिका’ पर वृक्ष के पत्ते तथा माला निम्न श्लोक को पांच बार पढ़ कर चढ़ाना चाहिये।
इसके साथ प्रसाद और सुपारी भी अर्पित करें तथा घी का दीपक जला कर दायीं और रख दें।
इस साधना का आधार है, काम गायत्री, यह मंत्र अत्यन्त ही प्रभावशाली है, इस पूरे पूजन क्रम के पश्चात् ‘आनन्द मंजरीमाला’ से उसी स्थान पर बैठे-बैठे पांच माला मंत्र जप निम्न मंत्र का करना चाहिये।
इस प्रकार पांच माला मंत्र जप के पश्चात् अपने सामने कामदेव तथा रति की पुष्पांजलि अर्पित करते हुए प्रणाम करना चाहिये कि जगत को रति प्रीति प्रदान करने वाले, जगत को आनन्द कार्य प्रदान करने वाले, देव आप को प्रणाम करता हूँ तथा आप मेरे शरीर में स्थायी आवास करें एवं मेरी वांछित इच्छाओं को फल प्रदान करते हुए कामान्दामेश्वरम साधना पूर्ण करें।
साधक को चाहिये कि वह प्रतिदिन एक माला काम गायत्री मंत्र का जप अवश्य ही करें।
साधना के पश्चात् साधक यंत्र तथा मुद्रिका को पुष्प के साथ पीले कपड़े में बांध कर पूजा स्थान में रखें तथा किसी विशेष कार्य पर जाते समय इस पीले कपड़े सहित अपने बैग अथवा अपनी जेब में रख सकते हैं।
यह साधना एक निरन्तर की जाने वाली साधना है जिसमें केवल सफलता ही सफलता है, इसका प्रभाव नियमित मंत्र जप से शीघ्र ही प्राप्त होता है।
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