





शिष्य का नाता गुरू से दीक्षा समय से ही शुरू नहीं होता, वरन यह तो सदियों पूर्व का होता है, इसमें गुरू भी शरीर बदलते हैं, शिष्य को भी चोला बदलना पड़ता है, और हर जन्म में गुरू शिष्य का मिलन होता है, और जहां मिलन होता है, वहां बिछोह भी होता है, पर यह मिलन और बिछोह भौतिक स्तर पर ही होता है। आत्मा के सम्बन्ध में बिछोह जैसी स्थिति नहीं होती।
3 जुलाई को यह दिवस शिष्यों के लिये एक पुण्य तिथि की तरह है, जिसमें शिष्य सद्गुरू चरणों में समर्पित होता हुआ अपनी श्रद्धा को अर्पित करता हुआ संकल्प लेता है, कि- ‘हे सद्गुरूदेव! जिस विश्वास से आपने बिना कोई परीक्षा लिये दीक्षा देकर कृतार्थ किया है, उसी प्रकार मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि आपके कार्यों को अवश्य ही पूर्ण प्रयास कर विस्तार करूंगा, आपके संकल्पों को, ज्ञान प्रचार-प्रसार को साकार रूप देने का प्रयत्न करूंगा। आप मुझे शक्ति दें तथा जीवन पर्यन्त मार्गदर्शन प्रदान करते रहें।’
3 जुलाई 1998 को सद्गुरूदेव ने लौकिक रूप से महाप्रयाण किया था, परन्तु शिष्य के हृदय से सद्गुरूदेव कभी प्रयाण नहीं किया है, वे तो निरन्तर शिष्यों के हृदय में स्थापित हैं- इसी भाव को धारण कर पूर्ण श्रद्धा से प्रत्येक शिष्य को चाहिये, कि इस समर्पण पूजन को सम्पन्न करें, जो कि इस विशेष दिवस के लिये ही उपयुक्त है।
पूजन विधान
प्रातः स्नानादि के बाद सिद्धाश्रम दिशा उत्तर की ओर मुख कर बैठें व सामने पूजन हेतु गुरू चित्र स्थापित करें।
पवित्रीकरण
बायें हाथ में जल लेकर दायें हाथ से अपने शरीर पर एवं पूजन की सभी सामग्री पर जल छिडकें-
ऊँ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वास्थां गतोऽपि वा, यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं सः बाह्याभ्यन्तर शुचिः।
इसके बाद हाथ में जल लेकर तीन बार पियें-
ऊँ आत्म तत्वं शोधयामि नमः
ऊँ विद्या तत्वं शोधयामि नमः
ऊँ ज्ञान तत्वं शोधयामि नमः
अब दोनों हाथ को जल से धो लें।
तिलक
इसके बाद कुंकुंम से अपने मस्तक पर तिलक करें-
ऊँ नमोस्त्वन्ताय सहस्त्रमूर्तये सहस्त्र पादाक्षि शिरोरूवाहवे सहस्त्र नाम्ने निखिलेश्वराय भव्याय सुरेश्वराय देवाधिदेवाय ब्रह्मस्वरूपाय नमः।
रक्षा सूत्र बन्धन
अपने हाथ पर निम्न मंत्र बोलकर मौली बांध लें-
ऊँ सः पूर्वो एतोऽस्मानं सः कृते
ऊँ सवितस्ते निखंदे निवसतो (गूं) शतः स गणेन् समृषिः पातु ऊँ नमः
स्वामी सच्चिदानन्द आवाहन
धूप दीप जला लें, दोनों हाथ जोड़कर भगवान सच्चिदानन्द जी का अत्यन्त शुद्ध मन से आवाहन करें और अत्यन्त भीगे नेत्र से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करें-
सदाऽहं शरण्यं सदाऽहं शरण्यं, ज्ञानं च मूर्ति परिपूर्ण सिन्धुं।
एकोहि शब्दं शरण्यं त्वमेवं, गुरूत्वं शरण्यं गुरूत्वं शरण्यं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
ब्रह्मा त्वमेवं विष्णुस्तमेवं, रूद्रस्त्वमेवं देव स्वरूपं।
महाकाल रूपं सदाऽहं शरण्यं, गुरूत्वं शरण्यं शरण्यं शरण्यं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
आवाहयामि आवाहयामि, परित्वं परिपूर्ण रूपं त्वमेवं।
आहूत शब्दं स्वरूपं त्वमेवं, गुरूत्वं गुरूत्वं गुरूत्वं शरण्यं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
गुरूत्वं गुरूत्वं गुरूत्वं, त्वमेवं त्वमेवं गुरूत्वं गुरूत्वं त्वमेवं।
एकोहि शब्द एकोहि शब्द, त्वमेवं त्वमेवं त्वमेवं त्वमेवं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
आवाहयामि परिपूर्ण सिन्धुं, आवाहयामि परिपूर्ण देवं।
परमहंस रूपं सत चित स्वरूपं, त्वमेवं त्वमेवं त्वमेवं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
त्वं सत्व रूपं त्वं सर्व देवं, ज्ञानं सदा पूर्ण परेवं सदैव
आहूत शब्द नेत्रोद भवामि, अश्रुश्च सिक्तं त्वमेवं शरण्यं।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
आवाहयामि आवाहयामि, करूणार्द्र रूपं आवाहयामि।
समुद्रो र्वतां पूर्ण सदैव रूपं, आवाहयामि आवाहयामि।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव…
भगवत पूज्यपाद परमहंस भगवान सच्चिदानन्द जी को सामने अपने दाहिनी ओर पुष्प का आसन प्रदान करें।
पूज्यपाद सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानन्द आवाहन
इसके बाद पूज्यपाद सद्गुरूदेव को ब्रह्मरूप में भावपूर्ण हृदय से आवाहन कर पुष्प का आसन प्रदान करें।
गुरू रूपमेवं गुरू ब्रह्मरूपं, विष्णुश्च रूद्रं देवं वदाम्यं।
गुरूवै गुरूर्वै परम पूज्यरूपं, गुरूर्वै सदाहं प्रणम्यं नमामि।।
गुरूदेव कारूण्य रूपं सदेवं, गुरू आत्मरूपं प्राण स्वरूपं।
देवस्य रूपं चैतन्य मूर्तिं, गुरूर्वै प्रणम्यं गुरूर्वै प्रणम्यं।।
जीवोऽपि देहं निखिलेश्वरोऽयं निखिलेश्वरोऽयं निखिलेश्वरोऽयं।
न शब्दं न वाक्यं न चिन्त्यं वदेन्यं निखिलेश्वरोऽयं निखिलेश्वरोऽयं।।
मम अश्रु अर्घ्यं पुष्पं प्रसूनं, देहं च पुष्पं शरण्यं त्वमेवं।
जीवोद्वदां पूर्ण मदैव रूपं, गुरूर्वै शरण्यं गुरूर्वै शरण्यं।।
तवं नाथ पूर्णं त्वं देव पूर्णं, आत्मा च पूर्णं ज्ञानं च पूर्णं।
अहं त्वां प्रपन्नं प्रपद्ये सदाऽहं, शरण्यं शरण्यं गुरूवै शरण्यं।।
अनाथो दरिद्रो जरा रोग युक्तो, महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्ताः
विपत्तिः प्रविफ्टः सदाहं भजामि। गुरूर्वै शरण्यं गुरूर्वै शरण्यं।।
अपने सामने आसन के रूप में एक सुन्दर पुष्प को स्थापित कर भगवतपाद निखिलेश्वरानन्द जी को अर्पित करें।
ऊँ स्वच्छ विमर्श रूपेण भगवतं निखिलेश्वरं आवाहयामि स्थापयामि नमः
सिद्धाश्रम ऋषि, मुनि योगि आवाहन
अब सिद्धाश्रम स्थित ऋषि मुनियों का आवाहन करें और उन्हें सामने बाई ओर पुष्प पंखुड़ियों का आसन दें।
ऊँ आहोदेवः सदाशिवः यज्ञासो हवामहे त्वां सिद्धाश्रम स्थित समस्त ऋषि मुनि सिद्ध गंधर्वान् आवाहयामि स्थापयामि नमः।
गुरू पूजन
इसके बाद गुरू चित्र का पूजन प्रारम्भ करें-
पाद्यं- (दो आचमनी जल समर्पित करें।)
आसनांते पाद्यं समर्पयामि नमः।
अर्घ्य- (एक आचमनी जल समर्पित करें।)
पाद्यान्ते अर्घ्यं समर्पयामि नमः।
आचमन- (आचमनी में कुंकुंम, अक्षत व जल लेकर अर्पित करें।)
अर्घ्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
स्नान- (गुरू चित्र को जल से स्नान कराकर वस्त्र से पोछें)
सिद्धयोगा जलेन् स्नानं समर्पयामि नमः। स्नानीयं जलं समर्पयामि नमः।
वस्त्र- (आकाश रूपी वस्त्र अर्पित करें।)
स्नानांते विशायां महावस्त्रं समर्पयामि।
माला- (पुष्प माला अथवा पुष्प अर्पित करें।)
तत्रादौ भगवान महाशिवः पुष्प रूपेण मम श्रद्धा विश्वास रूपेण माल्यार्पण समर्पयामि नमः।
तदनन्तर एतोऽस्मान समस्त सुगन्ध द्रव्यं समर्पयामि नमः।
दक्षिणा- (दक्षिणा रूप में द्रव्य अर्पित करें एवं पूजन समर्पित करें।)
एतोऽस्मानं सदक्षिणा द्रव्य रूपेण मम श्वास प्रश्वास मम जीवनं च समर्पयामि नमः।
एतोऽस्मान गुरूदेवं निखिलेश्वरानन्दानां मम शतं सहस्त्र पूजनं सकृते कल्याण त्वं ऊँ नमः शम्भवाय
च मयोभवाय च नमः शंकराय च नमः शिवाय च समस्त शिष्याणां पूजनं समर्पयामि नमः।
प्रदक्षिणा- (खड़े होकर पूजा स्थान की परिक्रमा करें।)
यानि कानि च पापानि, जन्मांतर कृतानि च, तानि तानि प्रणफ्न्ति, प्रदक्षिणां च पदे पदे। प्रदक्षिणां समर्पयामि नमः।
स्व समर्पण- (दोनों हाथों में पुष्प लेकर गुरू चित्र पर चढ़ायें)
निम्न संदर्भ बोलते हुये भाव करें कि मेरे प्राण, देह, रोम, प्रतिरोम, कमेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों सहित मेरी सेवा, श्रद्धा, विश्वास भगवद सद्गुरूदेव के चरणों में समर्पित हों-
मम प्राण देह रोम प्रतिरोम इन्द्रयाणि श्रोत्र जिह्वा घ्राण पाणि पाद पायू पस्थानि मम श्रद्धा विश्वासं समस्त शिष्याणां सर्वस्वं च पुष्प रूपेण समर्पयामि नमः।
ऐसा बोलकर गुरू चरणों में पुष्प चढ़ायें। गुरू मंत्र की स्वेच्छानुसार 4 या 11 माला जप करें और फिर गुरू आरती करें। इस पुण्य दिवस पर गुरू चित्र के समक्ष किसी ऐसे कार्य का संकल्प लेना चाहिये, जिससे गुरूदेव प्रसन्न हों।
सद्गुरूदेव ने अपने प्रत्येक प्रवचन में यही कहा कि मैं सिद्धाश्रम होता हुआ भी तुम्हारे हृदय में अवश्य रहूंगा यदि तुम अपनी पूर्ण श्रद्धा और समर्पण मुझे दे सकते हो तो मैं तुम्हें छोड़कर कहीं भी नहीं जा सकता। तुम्हें हर समय अनुभूति अवश्य होती रहेगी। अब मैं हजार-हजार रूपों में अपने प्रत्येक शिष्य की अंर्तरात्मा में, हृदय में हर समय रहूंगा। मुझे न तो सिद्धाश्रम प्रिय और न कोई अन्य लोक मेरे लिये तो सब श्रेष्ठ स्थान मेरे प्रिय शिष्यों का हृदय कमल है। जहां रह कर उसके जीवन के सुख-दुःख में हर समय बराबर का भागीदार अवश्य रहूंगा।
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