





यह जीवन कामना परक जीवन है और कामना सिद्धि के लिये नवरात्रि से बढ़कर कोई श्रेष्ठ मुहुर्त नहीं है। दुर्गा शक्ति तो मां भगवाती आद्या शक्ति हैं जिनका तो पूजन हमें निरन्तर करना है। मां का आशीर्वाद बालक को निरन्तर चाहिये, साथ ही अपने जीवन में कामनाओं की पूर्ति हेतु नवदुर्गा से सम्बन्धित विशेष मंत्र एवं साधना दी जा रही है मूल साधना तो साधक अवश्य सम्पन्न करें और उसके पश्चात् अपनी इच्छा, कामना के अनुसार नवरात्रि में अलग-अलग दिनों में अलग-अलग कार्यो हेतु नवदुर्गा साधना सम्पन्न् करें।
नवदुर्गा के नौ स्वरूप
नवदुर्गा के नौ स्वरूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धिदात्री है। नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन नवदुर्गा के एक-एक कर नौ दिन में सभी रूपों का मंत्र जप करना है। अर्थात् प्रथम दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी…… नवें दिन सिद्धिरात्री की साधना सम्पन्न करनी है।
प्रथम दिवस 22.09.2025 शैलपुत्री दिवस
शशि कोटि प्रभां चारू चन्द्रार्द्धकृत शेखराम्।
त्रिषूल वरहस्तां च जटा मण्डित मस्तकाम्।।
सर्वमनोकामना पूर्ति हेतु
नवरात्रि के प्रथम दिवस पर भगवती जगदम्बा ‘शैलपुत्री’ के रूप में साध्य है, शैलपुत्री की साधना साधक अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु करता है। अपने जीवन की भौतिक और आध्यात्मिक समस्त इच्छाओं को पूर्णता देने के लिये यह साधना महत्त्वपूर्ण है, जिसे सम्पन्न कर साधक अपनी इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है।
साधना विधानः लकड़ी के बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछायें तथा उस पर केसर से ‘शं’ अंकित करें, उसके ऊपर ‘मनोकामना पूर्ति गुटिका’ स्थापित करें तथा साधक शैलपुत्री का ध्यान करते हुये लाल रंग का पुष्प’ चढ़ायें-
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरं मातरं च यशस्विनी।।
इस ध्यान के बाद गुटिका का सामान्य पूजन करें, घी का अखण्ड दीपक लगाये तथा भगवती से अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना कर नैवेद्य चढ़ायें, फिर 108 चिरमी के दानों को एक-एक बार निम्न मंत्र बोलते हुये गुटिका पर चढ़ाये।
मंत्र
।। ऊँ शं शैलपुत्र्ये फट्।।
इसके पश्चात् पुनः मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना कर भगवती की आरती करें।
न्यौछावर 1800/-
द्वितीय दिवस 23.09.2025 ब्रह्मचारिणी दिवस
वृषे उमा प्रकृर्तव्या पद्योपरि व्यवस्थिता।
योग पट्टोत्तरा संग मृग सिंह परिष्कृत।।
ध्यान-धारण-संतान-निरूद्ध-नियम स्थिता।
कमण्डल ससूत्राक्ष वरदोन्नत पाणिनी।।
ग्रह माला विराजन्ती जयाद्यैः परिवारिता।
पद्मकुण्डल धात्री च षिवार्चनरता सदा।।
भगवती दुर्गा के बिम्बात्मक दर्शन तथा आरोग्यता प्राप्त करने हेतु
नवरात्रि के दूसरे दिन ‘ब्रह्मचारिणी’ का स्वरूप का पूजन होता है। भगवती आदिशक्ति के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की साधना करने से साधक के घर में आरोग्यता स्थापित होती है। यदि घर में कोई सदस्य निरन्तर रोगग्रस्त बना हुआ है या स्वास्थ्य ठीक होने पर भी स्वास्थ्य का अनुभव नहीं कर पाता, तो उसके लिये संकल्प कर परिवार का कोई सदस्य इस प्रयोग को सम्पन्न करे, तो वह अवश्य लाभ अनुभव करता है।
साधना विधानः लाल रंग के वस्त्र के ऊपर पीले रंग के चावलों की ढेरी बनाकर उस पर ‘हरी हकीक माला’ स्थापित कर ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालां कमण्डलुम।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
ध्यान के पश्चात् माला का संक्षिप्त पूजन कर दूध से बना हुआ भोग अर्पित करें तथा उसी माला से निम्न मंत्र का 11 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ ब्रं ब्रह्मचारिण्यै नमः।।
प्रयोग समाप्त के बाद देवी की आरती कर प्रसाद का वितरण करें।
न्यौछावर 1800/-
तृतीय दिवस 24&25. 09.2025 चन्द्रघण्टा दिवस
व्याघ्र चर्माम्बरा क्रूरा गजचर्मोत्तरीयका।
मुण्डमालाधरा घोरा शुष्कवापी समोदरा।।
खड्गपाशधरातीव भीषणा भयदायिनी।
खट्वांगधारिणी रौद्रा कालरात्रिरिवापरा।।
विस्तीर्णवदन जिह्वां चालयंती मुहुर्मुहः।
विस्तार जघना वेगाज्जघाना सुरसैनिकान्।।
समस्त बाधाओं के निराकरण तथा आकस्मिक धन प्राप्ति हेतु
‘चन्द्रघंटा’ की साधना नवरात्रि के तृतीय दिवस पर सम्पन्न की जाती है। चन्द्रघंटा देवी रौद्र स्वरूपा हैं, जो साधक के समस्त दोष तथा पाप का क्षय कर उसके जीवन की सभी बाधाओं को समाप्त करती हैं। भगवती चन्द्रघंटा की कृपा प्राप्त कर साधक अपने आप में अत्यन्त समृद्धशाली और ऐश्वर्यवान हो जाता है। आकस्मिक धन प्राप्ति और गुप्त धन प्राप्ति के लिये यह प्रयोग अत्यन्त श्रेष्ठ और अद्वितीय प्रयोग है।
साधना विधानः लकड़ी के बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर किसी ताम्रपात्र में ‘चन्द्रघंटा दुर्गा यंत्र’ स्थापित कर चन्द्रघंटा देवी का ध्यान करें-
अखण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपार्भटीयुता।
प्रसादं तनुतां मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।
ध्यान के पश्चात् साधक यंत्र का संक्षिप्त पूजन कर कोई भी लाल रंग का फल अर्पित करें। इसके बाद 51 लाल पुष्प अर्पित करते हुये निम्न मंत्र का जप करें-
मंत्र
।। ऊँ चं चं चं चन्द्रघण्टायै हुं।।
प्रयोग समाप्ति पर आरती करें।
न्यौछावर 1800/-
चतुर्थ दिवस 26.09.2025 कूष्माण्डा दिवस
कृष्माण्डा नाम प्रेतस्था दन्तुरा बर्बरा गिरौ।
पूजिता नव मासे तु सर्वकाम प्रदायिका।।
सुख-सौभाग्य, धन-धान्य तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति हेतु
नवरात्रि के चतुर्थ दिवस ‘कूष्माण्डा’ की साधना सम्पन्न की जाती है। कूष्माण्डा प्रयोग सम्पन्न करने वाले साधक के जीवन में धन-धान्य, ऐश्वर्य, सुख-सौभाग्य आदि की कमी नहीं रहती है। कूष्माण्डा प्रयोग गृहस्थ साधकों के लिये सौभाग्य प्राप्ति हेतु सर्वश्रेष्ठ प्रयोग है।
साधना विधानः साधक पीले रंग का वस्त्र बिछा कर उस पर किसी ताम्रपात्र में ‘सौभाग्यप्रदा यंत्र’ स्थापित कर कूष्माण्डा का ध्यान करें-
सूरासम्पूर्णकलशं रूधिरप्लुतमेव च।
दधना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डेति नमो नमः।।
फिर यंत्र का संक्षिप्त पूजन कर, नैवेद्य अर्पण कर, 108 सफेद पुष्प चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का जप करें-
मंत्र
।। ऊँ क्री कूष्माण्डायै क्रीं ऊँ।।
प्रयोग समाप्ति पर भगवती की आरती सम्पन्न कर प्रसाद का वितरण करें।
न्यौछावर 1800/-
पंचम दिवस 27.09.2025 स्कन्दमाता दिवस
ऊँ द्विभुजां स्कन्दजननीं वराभययुतां स्मरेत्।
गौरवर्णां महादेवीं नानालंकारभूषिताम्।।
दिव्य वस्त्र परिधानं वामक्रोड़े सुपुत्रिकाम्।
प्रसन्नवदनां नित्यं जगद्धात्री सुखप्रदाम।।
सर्वलक्षण सम्पन्नां पीनोन्नत पयोधराम।
एवं स्कन्दमातरं ध्यायेत् विन्ध्यवासिनीम्।।
गृहस्थ सुख-शांति में वृद्धि तथा कलह समाप्ति हेतु
नवरात्रि के पांचवें दिन भगवती जगदम्बा के ‘स्कन्द माता’ स्वरूप की साधना सम्पन्न होती है। गृहस्थ सुख में न्यूनता हो या घर में कलह निरन्तर बना रहता हो या घर के सभी सदस्यों के मध्य कटुता और द्वेष उत्पन्न हो गया हो, तो उन सब में आपस में परस्पर प्रेम की वृद्धि तथा सुख-शांति के लिये इस प्रयोग को सम्पन्न किया जाता है।
साधना विधानः अपने सामने लकड़ी का बाजोट रख कर उसके ऊपर पीले रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर कुंकुम से ‘ऊँ’ लिखें, फिर उस पर किसी ताम्रपात्र में मंत्र सिद्ध ‘प्राण प्रतिष्ठा युक्त गृहस्थ सुख यंत्र’ को स्थापित कर भगवती जगदम्बा के स्कन्द दैवीय स्वरूप का ध्यान करें-
सिंहासनगता नित्यं पद्माचिकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी । ।
यंत्र का पूजन कर नैवेद्य अर्पित करें तथा 101 लाल रंग के फूल निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चढ़ायें-
मंत्र
।। ऊँ स्कन्दायै दैव्यै ऊँ।।
प्रयोग समाप्ति पर भगवती की आरती सम्पन्न करें तथा प्रसाद का वितरण करें।
न्यौछावर 1800/-
षष्ठम दिवस 28.09.2025 कात्यायनी दिवस
ऊँ गरूड़ोत्पलसन्निभां मणिमय कुण्डलमंडिताम्।
नोमि भावविलोचनां महिषोत्तमांगनिषेदुशीम्।।
शंख, चक्र, कृपाण-खेटक-वाण-कार्मुक शूलकाम्।
तर्जनीमपि विभ्रती निजबाहुभिः शशिखेराम् । ।
शत्रु समाप्ति तथा अनुकूलता प्राप्ति हेतु
यदि व्यक्ति के आसपास विपरीत वातावरण निर्मित हो रहा हो और उसके शत्रु दिन-प्रतिदिन उसे हानि पहुंचाने के उपाय करते जा रहे हो, तो उसके लिये ‘कात्यायनी प्रयोग’ सर्वश्रेष्ठ प्रयोग है। कात्यायनी रौद्र स्वरूपा हैं और इनको भगवती दुर्गा का छठा स्वरूप माना जाता है।
साधना विधानः सामने रखे बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछा कर उस पर काजल से गोल घेरा बनाकर उसमें अपने शत्रु का नाम लिखें तथा उस पर ‘शुत्र मर्दन यंत्र’ स्थापित करें, इसके बाद कात्यायनी देवी का ध्यान करें-
चन्द्रासोज्ज्वकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यात् देवी दानवघातिनी।।
ध्यान के बाद यंत्र का पूजन कर नैवेद्य अर्पित करें तथा ‘काली हकीक माला’ से यंत्र के समक्ष निम्न मंत्र का 13 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ क्रौं क्रौं कात्यायन्यै क्रौं क्रौं फट्।।
मंत्र जप के पश्चात् आरती सम्पन्न कर प्रसाद का वितरण करें।
न्यौछावर 1800/-
सप्तम दिवस 29.09.2025 कालरात्रि दिवस
सा भिन्नांजन संकाश दंष्ट्राचिंत वरानना।
विशाल लोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।
खड्ग-पात्र-शिर: खेटैरलंकृत चतुर्भुजा।
कबंध-हारमुरसा विभ्राणा शिरसास्त्रजाम्।।
अकाल मृत्यु भय निवारण तथा व्यापार वर्द्धन हेतु
‘कालरात्रि’ की साधना सम्पन्न करने से व्यक्ति के मन से अकाल मृत्यु भय समाप्त होता है तथा यह प्रयोग व्यापार करने वालें के लिये भी अत्यन्त उपयोगी है, इसे सम्पन्न करने पर उनके व्यापार में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती ही है।
नवरात्रि के सातवें दिन इस साधना को सम्पन्न करने से साधक अवश्य सफलता प्राप्त करता ही है।
साधना विधानः इस दिन साधक लाल रंग का वस्त्र बिछाकर ‘कालरात्रि यंत्र’ का स्थापन कर कालरात्रि का ध्यान करें-
करालरूपा कालब्जा समानाकृतिविग्रहा।
कालरात्रि शुभं दद्याद् देवी चण्डाट्टहासिनी।।
फिर यंत्र का संक्षिप्त पूजन कर नैवेद्य चढ़ायें तथा धूप-दीप-अगरबत्ती लगा कर ‘हकीक माला’ से निम्न मंत्र की 9 माला मंत्र जप करें-
काल रात्रि मंत्र
।। लीं क्रीं हुं।।
दक्षिण काली मंत्र
।। ऊँ क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा।।
प्रयोग समाप्ति पर भगवती की आरती सम्पन्न कर प्रसाद का वितरण करें।
न्यौछावर 1800/-
अष्टम दिवस 30.09.2025 महागौरी दिवस
ऊँ गौरीं रत्न-निबद्ध-नूपुर लसत पादाम्बुजाभिष्टदां।
कांचीरत्न दुकुल हार ललितां नीलां त्रिनेत्रोज्जवलाम्।।
शूलाद्यस्त्र-सहस्त्रमण्डिलत भुजामुदवक्त्र पीनस्तनीं।
आबद्धामृतरश्मि रत्नमुकुटां वंदे महेशप्रियाम्।।
श्रेष्ठ पति या पत्नी प्राप्ति तथा पूर्ण सौन्दर्य प्राप्ति हेतु
नवरात्रि के आठवें दिन ‘महागौरी’ की साधना की जाती है। महागौरी परम सौभाग्य प्रदायक देवी है। स्त्रियां श्रेष्ठ पति प्राप्ति के लिये तथा पुरूष श्रेष्ठ पत्नी प्राप्ति के लिये इनकी उपासना करते हैं। इसके साथ गृहस्थ सुख में वृद्धि हेतु यह साधना आवश्यक है। अप्रतिम दिव्य सौन्दर्य प्राप्त करने के लिये साधक या साधिका इनकी साधना अवश्य सम्पन्न करें।
साधना विधानः अपने सामने बाजोट पर श्वेत रेशमी वस्त्र बिछाकर उस पर ताम्रपात्र में ‘महागौरी यंत्र’ का स्थापन कर भगवती महागौरी का ध्यान करें-
श्वेतहस्तिस्मारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा।।
यंत्र का संक्षिप्त पूजन कर दूध से बना हुआ नैवेद्य अर्पित कर ‘हकीक माला’ से निम्न मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ श्रीं महागौर्ये ऊँ।।
प्रयोग समाप्ति पर आरती सम्पन्न करें।
न्यौछावर 1800/-
नवम दिवस 01.10.2025 सिद्धिदात्रि दिवस
ऊँ उद्यदादित्य-रागरंजितां योगमायां मोहस्तनी।
शिव विरचिं के शव-मुकुट-सेवित-चरणां।
सूर्य शशांक-स्पंदनानंद-स्फुरण मंडितां।
नित्यां स्थिरां सिद्धिदामरवेष्टितां।
पूत प्रणव-रागरचित चमत्कृत-विकसित विन्दुः।
दिग्वासिनीं प्रपूजितां अभ्यां वरदां विश्व जननीं।
शिवमातरं शिवानीं च ब्रह्माणीं ब्रह्म जननीं।
वैष्णवीं विष्णु प्रसुतिं त्रिपुरां त्रिपुरेश्वरीं।
नमामि मातरं सिद्धिदात्रीम्।
समस्त साधनाओं में सिद्धि प्राप्त करने हेतु
नवरात्रि का अंतिम दिन ‘सिद्धिदायिनी दुर्गा’ का है। इस दिन साधक जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से पूर्णता प्राप्त करने के लिये सिद्धिदायिनी की साधना करता है। इस दिन साधना करने से समस्त साधनाओं में सफलता प्राप्त होने लग जाती है। इस प्रयोग को सम्पन्न करने के बाद साधक वर्ष भर तक जितनी साधनायें करता है, उनमें उसे सफलता प्राप्त होती ही है। यदि पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ साधना सम्पन्न की जाय, तो भगवती जगदम्बा के प्रत्यक्ष बिम्बात्मक दर्शन भी संभव होते हैं।
साधना विधानः सफेद रंग का वस्त्र बिछाकर उस पर ‘सिद्धिदायिनी दुर्गा यंत्र’ स्थापित करें। दुर्गा का ध्यान करें-
सिद्धि गन्धर्व यक्षायैः असुरैरमरैरपि।
साध्यमाना सदाभूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
यंत्र का पूजन कर, नैवेद्य अर्पित कर ‘सर्व सिद्धि माला’ से 31 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ शं सिद्धि प्रदायै शं ऊँ।।
प्रयोग समाप्ति पर आरती करें।
न्यौछावर 1800/-
यह सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति करने वाली देवी हैं। साधकों की यही चरम और परम गति है। महागौरी ही सिद्धिदात्री हैं। साधक इनकी आराधना कर दिव्य लोक की शक्तियां प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नवदुर्गा की उपासना की परम्परा भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। वैदिक युग से अद्य पर्यन्त इनकी उपासना के अनेक रूप मिलते है, भारत से बाहर के देशों में भी नवदुर्गा की पूजा होती है।
साधक को तो इन सभी अद्वितीय प्रयोगों को नवरात्रि के अवसर पर अवश्य सम्पन्न करना चाहिये। प्रत्येक प्रयोग अपने आप में साधक के जीवन को परिवर्तित करने वाला प्रयोग है। साधक चाहे तो प्रत्येक प्रयोग अथवा अपनी आवश्यकतानुसार किसी भी प्रयोग को सम्पन्न कर सकता है। इतना अवश्य ध्यान रखे, कि यंत्र स्थापन आप नवरात्रि के निश्चित दिवस पर ही करें तथा नित्य दैनिक पूजन कर निर्धारित दिवस पर साधना सम्पन्न करें तथा नवें दिन आरती कर पूर्णाहुति करें तो अत्यधिक फलप्रद होगा। साधक प्रत्येक दिन किये गये प्रयोगों की सामग्री को नवरात्रि की समाप्ति के बाद किसी भी सोमवार के दिन नदी में प्रवाहित कर दें।
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