





सृष्टि की उत्पति के साथ ही यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे, और विघ्नकर्ता न आये-यह भगवान श्री गणेश का कार्य है, विघ्नकर्ता और विघ्न हर्ता दोनों ही गणेश है, आसुरी प्रकृति के दुष्टों के लिये गणेश विघ्नकर्ता हैं, तो उनकी पूजा उपासना करने वाले भक्तों के लिये विघ्नहरण, सर्व कामनाफलप्रद अनन्तान्तसुखद और सुमंगल सुमंगला प्रदाता कहा गया हैं।
गणपति स्वयं ज्ञान और निर्वाण को देने वाले हैं। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में कहा गया है, कि गणपति ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो सभी दृष्टियों से पूर्णता प्रदान करने वाले हैं, ‘लिंग पुराण’ में भी सभी देवताओं ने विचार करने के बाद यही निर्णय सर्वमान्य बताया है, कि जीवन में पूर्ण सफलता वर-वरद विजय श्री गं साधना के द्वारा ही संभव हो पाती हैं।
साधना विधानः नित्य कर्म से प्रातः निवृत होकर शुद्ध आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें, सामने चौकी पर श्वेत लाल वस्त्र बिछाकर, गुरू चित्र स्थापित कर प्रार्थना करें। हे! गुरूदेव मेरी यह साधना आपकी कृपा से सफल हो जिससे मैं ज्ञान चेतना को आत्मसात् कर सकूं और परिवार सहित सुखी जीवन निर्विघ्न रूप से बिता सकूं। इसके बाद धूप, दीप, पुष्प आदि से पंचोपचार पूजन करके संकल्प करें।
कामनाफलप्रद गणपति विग्रह को स्थापित कर सामने ताम्बे की प्लेट रख कर उसमें कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर दाये और बांयी तरफ दोनों ‘वर-वरदो गुटिका’ भी स्थापित करें। फिर यथा विधि स्नान, तिलक, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप आदि सम्पन्न कर मूर्ति पर सिन्दूर का तिलक कर निम्न मंत्र की 4 माला ‘रावण कृत स्वर्ण खप्पर विजयश्री माला’ से जाप करें।
मंत्र
ऊँ गं वरदाय सुमंगलाये सर्वविजयाये गणपतये धारयामी नमः
जप के पश्चात् लड्डू का भोग लगायें। और दुर्गा आरती सम्पन्न करें। विजय दशमी के दिन 11 कन्याओं का मीठा भोजन दान दक्षिणा सहित कराएं।
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