





कहते हैं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात ही गोपियों के साथ महारास के रूप में लीला रचाई थी। मान्यतानुसार जब श्रीकृष्ण महारास में निमग्न थे, उसी समय चंद्रदेव आकाश से मंत्रमुग्ध, लालायित हो भगवान की लीला निहार रहे थे। इसी क्रम में चंद्रमा इतने भाव विह्ल हो उठे कि उनको सुध ही नहीं रही और वे अपनी शीतल ज्योत्सना के साथ पृथ्वी के अत्यंत निकट आ गये और उस पर अमृत वर्षा करने लगे। तब से लेकर आज तक हर शरद पूर्णिमा को महारास के अवसर पर चंद्रमा की किरणें उसी प्रकार अमृत वर्षा करती हैं और सांसारिक प्राणियों को विविध प्रकार के वरदान-अनुदान से परिपूर्ण करती हैं।
चंद्रमा को वेद, पुराण, ग्रंथों में मन के तुल्य स्वीकार किया जाता है- ‘चंद्रमा मनसो जातरू’। वैदिक मनीषा में यह स्पष्टतः उल्लिखित है कि षोडश कलाओं से युक्त अमृत वर्षा करने वाले शरद चंद्र की पवित्र शीतलता मनुष्य के शरीर एवं मन दोनों को ही शीतल कर जाती है। यही कारण है कि इस रात्रि को सकारात्मकता प्रदान करने वाली तथा आरोग्यवर्धनकारी कहा गया है। उपनिषदकार जब कहते हैं कि चंद्रमा मन का कारक है तो स्वाभाविक रूप से विचार आता है कि मनुष्य के मन की अवस्थाएं भी तो घटती बढ़ती रहती हैं। चंद्रमा की षोडश कलाएं वस्तुतः मन की ही तो विविध दशाओं की प्रतीक हैं।
वस्तुतः शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी पूजन, चंद्र दर्शन का विशेष महत्त्व है। परिवार के साथ जब खीर का भोग लगाया जाता है तो इससे हमारे परंपरागत संयुक्त पारिवारिक मूल्यों को सहज बढ़ावा मिलता है।
जिसके जीवन में लक्ष्मी हो, मेधा अर्थात् प्रत्युत्पन्नमति हो, वरा अर्थात् वरदायक प्रभाव हो, शिष्टि अर्थात् सर्वरूपेण मंगलमयता हो, शिष्टता हो, गौरी अर्थात् शक्ति तत्व हो, तुष्टि अर्थात् परिपूर्णता का वातावरण हो, प्रभा अर्थात् शुभ्रता का एक आभामंडल हो तथा मति अर्थात् उचित-अनुचित का भेद करने की सामर्थ्य हो, उसका जीवन किस प्रकार से न्यून रह सकता है।
इसी प्रकार का जीवन संतुलित होता है और जहां संतुलित जीवन होगा, वहां संतुलित मन-मस्तिष्क होगा ही। केवल संतुलित मन-मस्तिष्क से युक्त स्त्री-पुरूष ही अपने जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
और यहां पूर्णता प्राप्त करने का तात्पर्य स्वयं अपने आपको इसी जीवन में ज्ञान के दोनों स्वरूप अर्थात् धन-सम्पदा और श्रेष्ठ मति के साथ शुभ्रता से आलोकित करना है। मनुष्य स्वयं में ही अपना मित्र हो सकता है और स्वयं में ही शत्रु होता है। चन्द्रमा अपनी सोलाह कलाओं की शक्तियों द्वारा उसके भीतर की विनाशकारी बुद्धि को शांत कर उसे संरचनात्मक कार्यों की ओर ले जाता है।
जीवन की संरचना आपकी उत्पत्ति है, लेकिन उस संरचना में विशुद्ध भाव को जाग्रत करना और उसके साथ ही दुर्बल, क्षीण व दरिद्र मानसिकता को समाप्त करना, व्यक्ति के स्वयं के भीतर में निहित रहता है। जब व्यक्ति साधक बन जाता है तो अपनी जड़ता को समाप्त कर चैतन्यता की ओर अग्रसर होता है। चन्द्रमा की षोड़श कलाओं की अमृत वर्षा से जीवन में सौन्दर्य, राग, संगीत की उत्पति होती है और जीवन में शुष्कता समाप्त होती है। केवल धन प्रबलता के रूप में जीवन को न देखकर धन को अपने अधीन कर जीवन को नये रूप में देखने की क्रिया केवल शरद पूर्णिमा के दिन ही हो सकती है।
साधना विधान
भगवती धन संपदा की साधना पूर्ण रूप से एक सात्विक साधना है, इस साधना को कोई भी स्त्री या पुरूष सम्पन्न कर सकता है। गृहस्थ सुख के आकांक्षी साधक-साधिकाओं के लिये यह एक अत्यंत उपयोगी साधना विधि है। उपरोक्त दिवस को प्रातः काल शीघ्र उठकर नित्य कर्मों से मुक्त हो, स्नान कर, पीले वस्त्र धारण कर लें। साधना स्थान धुला व स्वच्छ होना आवश्यक है। साधक अथवा साधिका के पास ताम्र पत्र पर अंकित ‘धन सम्पदा यंत्र’, ‘आठ लघु नारियल’, ‘धन सम्पदा माला’ आवश्यक साधना सामग्री के रूप में विद्यमान होनी चाहिये।
समस्त साधना सामग्री प्राप्त कर किसी ताम्र पात्र या स्टील की थाली में कुंकुंम से स्वस्तिक का अंकन करें-
स्वस्तिक के ऊपर ‘धन सम्पदा यंत्र’ स्थापित कर उसके चारों ओर अष्ट सम्पदा के प्रतीक रूप में ‘आठों लघु नारियलों’ की स्थापना करें तथा यंत्र एवं लघु नारियलों का पूजन श्वेत चंदन, अक्षत, श्वेत पुष्प, सुगन्धित अगरबत्ती या धूप तथा दीपक से करें। इनमें से यदि कोई वस्तु उपलब्ध न हो सके, तो मन में कोई संशय लाने की आवश्यकता नहीं है, उस वस्तु का मानसिक रूप से स्मरण कर थोड़े से अक्षत चढ़ा दें। दीपक का सम्पूर्ण पूजन काल में प्रज्जवलित रहना अति आवश्यक है। इस संक्षिप्त पूजन को करने के उपरांत भगवती लक्ष्मी से अष्टरूपेण जीवन में समाहित होने की प्रार्थना कर तथा अपनी एक मनोकामना का स्मरण कर जिसकी पूर्ति तत्काल रूप से आवश्यक हो, ‘धन सम्पदा माला’ से निम्न मंत्र की पांच माला मंत्र जप सम्पन्न करे-
मंत्र
।। ऐं श्रीं धन सम्पदा धनदायै प्राप्यै श्रीं ऊँ नमः।।
मंत्र जप के बाद समस्त पूजन सामग्री को उसी प्रकार रहने दे तथा ‘क्षमस्व परमेश्वरी’ कहकर स्थान को छोड़ नित्य का कार्य व्यापार, नौकरी आदि सम्पन्न करें। सायं काल यंत्र माला व लघु नारियलों को किसी नदी, सरोवर, मन्दिर या पवित्र स्थान पर विसर्जित कर दें। उपरोक्त साधना शरद पूर्णिमा अथवा किसी भी गुरूवार की प्रातः भी सम्पन्न की जा सकती है। धन संपदा साधना जीवन को सौन्दर्य युक्त करने की साधना है, अतः यह साधना श्रेष्ठ जीवन साथी प्राप्त करने के लिये की जा सकती है, क्योंकि प्रेम और सौन्दर्य धन सम्पदा भी श्रेष्ठ कर्म और साधना के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
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