





कुबेर धनाध्यक्ष है, और इनकी साधना दरिद्र को करोड़पति, नवनिधि का स्वामी बना सकती है, तो फिर क्यों न यह साधना सम्पन्न की जाय? और वह भी मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त कुबेर यंत्र स्थापित कर-
कुबेर देव की महत्ता तो निराली ही है। ब्रह्मा और शिव द्वारा विशेष रूप से आशीर्वाद युक्त होने के कारण इनका स्थान शिव के साथ ही है तथा सूर्य के समान तेज है। विशेष बात यह है कि देवताओं को भी धन के लिये कुबेर की ही प्रार्थना करनी पड़ती है। कुबेर का जहां स्थान होता है वहां साक्षत् महालक्ष्मी ‘राज्यश्री’ के रूप में निवास करती है।
कुबेर नवनिधियों, पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और वर्चस्व के स्वामी हैं। यक्ष, गुयिक, किन्नर, देवनियों के अधिपति हैं तथा अप्सराएं इनकी सेविकाएं हैं।
एक-एक निधि, अनन्त वैभव प्राप्त करा सकती है, और कुबेर तो नवनिधियों के स्वामी है, कुबेर के साधक पर शिव- कृपा विशेष रूप से रहती है, और गृह रक्षा ब्रह्मा द्वारा अवश्य की जाती है, शुक्र अर्थात् सौन्दर्य, सौभाग्य, सांसारिक सुख, गृहस्थ-आनन्द, मदन, यात्रा, संगीत के देव, कुबेर के सहयोगी हैं, अतः कुबेर साधना से शुक्र का सौभाग्य भी पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
कुबेर साधना
कोई भी यज्ञ, पूजा, उत्सव, कुबेर की पूजा के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता। उत्तर दिशा के अधिपति कुबेर का पूजन मध्य में तो होता ही है, किसी भी पूजन के अन्त में जब मंत्रों द्वारा पुष्पांजलि अर्पित की जाती है, तो वह मूल रूप से कुबेर का प्रार्थना मंत्र ही है।
जिसने कुबेर साधना और उपासना नियमित रूप से सम्पन्न की है, उसे जीवन में जो चाहा वह मिला है, जिस व्यापार में, कार्य में हाथ डाला, उसी में सफलता प्राप्त की है, और धन-लाभ अर्जित किया है।
आकस्मिक धन प्राप्ति तथा गुप्त धन प्राप्ति हेतु भी कुबेर साधना का ही विधान है, क्योंकि कुबेर सिद्धि बिना धन आ ही नहीं सकता, और यदि आ भी जाता है तो वह स्थिर नहीं रह सकता।
कुबेर साधना शिव-साधना तथा शुक्र साधना का भी फल देती है। कुबेर साधना बालकों के लिये आरोग्य लाभ एवं चिरायु की साधना भी है। यदि घर परिवार में बच्चे बार-बार अस्वस्थ होते हों, तो कुबेर की विधिवत पूजा करके बालकों को पूजन का जल पिलाने से स्वास्थ्य लाभ होता है।
साधना विधान
सत्य तो यह है कि साधनाएं जटिल और कष्टप्रद होती ही नहीं हैं। मूल रूप से तो साधक पर निर्भर है कि वह किस भाव से, किस रूप में, किस समर्पण से, किस विधि से साधना सम्पन्न करता है। मंत्र जप करते समय ध्यान कहीं और होता है, तो फिर साधना में सफलता कैसे मिलेगी?
कुबेर भी शिव के समान सरल देव हैं और इस साधना को तो प्रतिदिन के पूजा क्रम का अंग ही बना लेना चाहिये।
इस वर्ष कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी कुबेर सिद्धि दिवस है। इस दिन घर में मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त धनत्रयोदशी यंत्र अवश्य ही स्थापित करना चाहिये। यदि आपके पास पहले से धनत्रयोदशी यंत्र है तो उसे जल में विसर्जित कर दें और नया प्राणप्रतिष्ठा युक्त धनत्रयोदशी यंत्र स्थापित कर दें।
प्रतिमाह शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी कुबेर त्रयोदशी ही मानी जाती है, इस दिन साधक बिना मुहुर्त देखे कुबेर धनत्रयोदशी साधना सम्पन्न कर सकता है।
इस साधना में मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त शुद्ध रूप से अंकित धनत्रयोदशी यंत्र तथा कमलगट्टा माला आवश्यक है, इसके साथ ही नारियल, कुंकुम, केशर, मौली, ताम्रपात्र में जल, दूध, पुष्प, प्रसाद इत्यादि की व्यवस्था पहले से ही कर लेनी चाहिये। इस त्रयोदशी के दिन स्नान कर, शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर, उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठें, और अपने सामने धनत्रयोदशी यंत्र को चावलों पर स्थापित करें। पति-पत्नी दोनों साथ में यह साधना कर सकते हैं। सर्वप्रथम कुबेर का ध्यान करें-
ध्यान
मनुजबाह्यविमान वरस्थितं गरूड़रत्ननिभं निधिनायकम्।
शिवसखं मुकुटादिविभूषितं वरगदे दधतं भज तुंदिलम्।।
तत्पश्चात् न्यास सम्पन्न करें।
करन्यास
ऊँ यक्षायांगुष्ठाभ्यां नमः। ऊँ कुबेराय तर्जनीभ्यां नमः। ऊँ वैश्रवणाय मध्यमाभ्यां नमः। ऊँ धनधान्यधिपतये अनामिकाभ्यां नमः। ऊँ देहि दापय स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः। इति करन्यासः ।
इसके बाद 108 बार यंत्र पर पुष्प चढ़ाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
मंत्र
।। ऊँ श्रीं ऊँ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।।
अब अपने दायें हाथ में कमल गट्ठे की माला लेकर निम्न मंत्र का जप करें। शास्त्रोक्त विधान सवा लाख मंत्र जप का है परन्तु 5 माला प्रतिदिन मंत्र जप अवश्य ही करें।
मंत्र
।। ऊँ क्षं क्षीं क्षमाधिपतिः आगच्छ यक्षाय कुबेराय फट्।।
जप समाप्त होने पर पुष्पाजंलि अर्पित करते हुये साधना में हुई त्रुटियों के लिये क्षमा मांग लें।
यदि आपका भवन या व्यापारिक स्थल का निर्माण हो रहा हो, तो अगले दिन यंत्र को उसमें स्थापित कर दें अथवा लाल वस्त्र में बांधकर तिजोरी में रख दें।
माला को लाल कपड़े में बांधकर नदीं में प्रवाहित कर दें। सवा महीने के बाद यंत्र को भी नदी में प्रवाहित कर दें।
वास्तव में यह साधना अद्वितीय है, तांत्रिक ग्रंथों में इन साधना का विशेष महत्त्व है। जिस स्थान पर यह साधना सम्पन्न की जाती है, वह स्थान भी लक्ष्मी का प्रिय स्थान बन जाता है।
विश्रवा ऋषि के पुत्र होने से कुबेर वैश्रवण कहलाये और बचपन से शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव की कठिन तपस्या में लग गये। अनेकों वर्ष बीत जाने पर उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान महादेव मां पार्वती सहित प्रकट हुये और कहने लगे- हे वैश्रवण! तुम्हारी तपस्या से मैं परम प्रसन्न हूं, तुम अपना अभीष्ट वर मांगो। ऐसा वचन सुनते ही उन्होंने अपनी आंखे खोली लेकिन भगवान शिव के तीव्र प्रकाश से उनकी आंखे फिर बन्द हो गई। कुबेर ने कहा कि मुझे ऐसी शक्ति दीजिये जिससे मैं आपको निरन्तर पा सकूं। भगवान ने कृपा पूर्ण हाथ से कुबेर को स्पर्श किया और कुबेर को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई। नेत्र खुलते ही उसकी पहली दृष्टि परम सुन्दरी मां पार्वती पर पड़ी और मोहवश उन्हें ही देखने लगे। उसी समय पार्वती की नेत्र ज्वाला से उनकी बाई आंख ज्योतिविहीन हो गई और शरीर कुबड़र हो गया। तदन्तर भगवान शिव ने कहा कि यह तो तुम्हारे पुत्र समान है, तुम्हारे तेज को देखकर आश्चर्य से निहार रहा है। भगवान शिव ने वर दिया कि तुम निधियों के स्वामी हो और गुह्यक, यक्ष, किन्नर के अधिपति हो, देवताओं के कोषाध्यक्ष हो और तुम अलकापुरी में सदैव निवास करोगे। इस प्रकार कुबेर को भगवान शिव की कृपा से यह महापद प्राप्त हुआ।
व्यक्ति अपने पुरूषार्थ से काम करता है, किन्तु वह यदि दैविक शक्ति की सहायता मंत्रों के माध्यम से प्राप्त कर लेता है, तो शीघ्रता से वह अपने अभीष्ट की पूर्ति कर सकता है। अतः साधना व्यक्ति सम्पन्न करे और शीघ्र उसे साधना का प्रभाव दिखाई देने लगे, ऐसी ही साधना है इस युग के लिये सर्वश्रेष्ठ धनत्रयोदशी साधना
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,