





जिस प्रकार पारस पत्थर सामान्य धातु को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देता है उसी प्रकार लक्ष्मी की स्वरूप स्वर्णाकर्षण गुटिका मनुष्य के जीवन की दीनता, हीनता से मुक्ति दिलाकर उसे लक्ष्मी युक्त बना देती है।
लाभ पंचमी पर्व एक महत्त्वपूर्ण त्योहार है। इस पर्व की विशेषता है कि, इस दिन भगवान शिव-गौरी, गणपति, लक्ष्मी जी की शुद्ध भावना से अभ्यर्थना-आराधना सम्पन्न करने से जीवन में समृद्धि, विकास और नई शुरुआत, सफलता की प्राप्ति होती है। इस दिन को विशेष रूप से व्यवसाय और आर्थिक समृद्धि के लिए शुभ माना जाता है।
यह प्रयोग जो कि लक्ष्मी से संबंधित है, कोई भी व्यक्ति आर्थिक लाभ, स्थाई सम्पत्ति, नौकरी लगने, प्रमोशन या व्यापार करने, ऋण मुक्ति, व्यापार में बिक्री की बढ़ोतरी तथा गृहस्थ सुख, वैभव-विलास प्राप्त करने हेतु सम्पन्न कर सकता है, आवश्यकता केवल शुद्ध रूप से साधना करने की है।
यह साधना लाभ पंचमी पर्व पर या किसी भी बुधवार को शुभ नक्षत्र में प्रारंभ की जा सकती है, साधना के लिये किसी पंडित को बुलाने की आवश्यकता नहीं है, स्वयं प्रयोग करने तथा मंत्र जप करने से सफलता शीघ्र प्राप्त होती है। साधना प्रारंभ करते समय गुरू का ध्यान कर आशीर्वाद प्राप्त कर जिस विशेष उद्देश्य हेतु प्रयोग सम्पन्न कर रहे हैं, उस उद्देश्य की पूर्ति करने का संकल्प अपने दायें हाथ में जल लेकर अवश्य ही करना चाहिये।
लक्ष्मी केवल धन की देवी ही नहीं अपितु यह तो सुख-सौभाग्य, कामना पूर्ति, यश वृद्धि की देवी है।
साधना प्रयोग
स्नान कर साधक पीला वस्त्र धारण कर अपने सामने लक्ष्मी चित्र स्थापित करें, कुंकुंम, पुष्प, नैवेद्य चढ़ायें तथा सामने किसी भी प्रकार के तेल का दीपक लगा लेना चाहिये, दीपक के पास (दीपक के किसी भी तरफ) ‘स्वर्णाकर्षण गुटिका’ स्थापित कर देनी चाहिये, यह गुटिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है और इस पर कई प्रयोग सिद्ध किये जाते हैं।
इस स्वर्णाकर्षण गुटिका को सामने रख कर निम्न मंत्र की ‘कमलगट्टे की माला’ से 11 मालायें फेरने से ही लक्ष्मी साधना सम्पन्न की जाती है और शीघ्र ही इसके आश्चर्यजनक परिणामों से प्रभावित होता है।
मंत्र
।। ऊँ हृीं ऐं अष्टलक्ष्म्यै धन धान्य समृद्धिं देहि देहि ऋणमोचन व्यापारोन्नति प्राप्त्यर्थ हृीं ऐं महालक्ष्म्यै नमः ।।
साधना के बाद प्रातः काल उस गुटिका को अपनी तिजोरी या पूजा स्थान में रख देनी चाहिये, इसके बाद नित्य इसकी पूजा आवश्यक नहीं होती। ऐसा करने पर यह गुटिका विशेष प्रभाव युक्त होकर साधक को मनोवांछित फल देने में सहायक होती रहती है।
भविष्य में यदि साधक चाहे तो इस गुटिका पर अन्य प्रयोग भी सम्पन्न कर सकता है, ऐसा करने पर पहले किये गये अनुष्ठान में कोई न्यूनता नहीं आती, इस प्रकार यह गुटिका 108 प्रकार की साधनाओं के लिये उपयुक्त मानी गई है।
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