






अतः साधकों के जीवन में जो अभाव, दरिद्रता, पाप-ताप, कष्ट-पीड़ा, क्लेश-विकार, शत्रु बाधा, डर-भय, आदि समस्त प्रकार की भौतिक व दैवीक कुस्थितियां व्याप्त हैं, उनके पूर्णरूपेण नाश हेतु सद्गुरूदेव जी द्वारा यह दिव्य माला दस महाविद्या, नवदुर्गा युक्त सूर्यग्रहण की चैतन्य साधना, मंत्र-जप, हवन युक्त प्राण-प्रतिष्ठित की गयी है। इसे धारण करने से शत्रु दमन, ज्ञान, वाक् सिद्धि, कला, आत्म शक्ति, सौन्दर्य, सम्मोहन, धन, समृद्धि, शतायु सौभाग्यता व साधना सफलता की प्राप्ति उक्त नव स्वरूपों में होती ही है।
सूर्य तेजस्विता से युक्त नवदुर्गा व दस महाविद्या शक्ति प्राप्ति इच्छुक साधक द्वारा उक्त माला को धारण करने से जीवन की दुःख, रोग, कष्ट, प्रेत बाधा, शरीर बंधन, दारिद्रता, ऋण आदि अंधकारमय कुस्थितियां समाप्त हो सकेगी। अष्ट सिद्धि नवनिधि युक्त सर्व कामना पूर्ति की धरणायें सरलता से प्राप्त हो सकेगी। सरल स्वरूप में समझा जाये तो जीवन की समस्त भौतिक व दैविक इच्छाओं की पूर्णरूपेण प्राप्ति हेतु यह दिव्य माला पूर्णता से सहायक है।
यह दिव्य माला साधक को 22 सितम्बर से 01 अक्टूबर तक नित्य 08:16 AM से 10:11 AM के मध्य केवल 20 मिनट तक धारण करनी है।
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ऐसे जीवन से तो मृत्यु अच्छी है। जिनके जीवन में जोश नहीं है, आरोग्यता नहीं है, पौरूषता नहीं है, साहस नहीं है, अडिगता नहीं है, ऐसे व्यक्तियों को यह दीक्षा अवश्य ही ग्रहण करना ही चाहिये, जिससे वे अपने जीवन को शेर की तरह जी सकें। इस दीक्षा के द्वारा व्यक्ति शतायु जीवन से युक्त होता है और भय-डर का नाश होता है। साथ ही कमजोर से कमजोर व्यक्ति में भी चुनौती का सामना करने का साहस आ जाता है। जीवन में सर्वोच्चता पाने के लिये भी मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना आवश्यक है। क्योंकि बिना आरोग्य हुये जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ जा सकता है।
श्री हनुमान भूत-प्रेत, नजर दोष, काला जादू, मूठ, रोग, व्याधि से साधक की रक्षा करते हैं और जीवन को श्रेष्ठ सफलता प्रदान करते हैं। वहीं धनवन्तरी देव जीवन में आरोग्यता, पौरूषता, रस, वीर्य, ओज की वृद्धि प्रदान करते हैं। साथ ही साधक नव निधि स्वरूप शक्तियां पद्मावती, महान्, खैरब, कुण्डल, नील, शंख, कच्छप, मुकुण्ड, मकर से युक्त होकर महावीरमय बनने की ओर अग्रसर होता ही है।
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