





भैरव व्याख्या
भैरव, शिव के अंश है और उनका स्वरूप चार भुजा, खड्ग, नरमुण्ड, खप्पर और त्रिशूल धारण किये हुये गले में शिव के समान मुण्ड माला, रूद्राक्ष माला, सर्पों की माला, शरीर पर भस्म, व्याघ्रचर्म धारण किये हुये, मस्तक पर सिन्दूर का त्रिपुण्ड, ऐसा ही प्रबल स्वरूप है। जो कि दुष्ट व्यक्तियों को पीड़ा देने वाले, और अपने भक्तों, साधकों के हर प्रकार के संकट दूर कर, उन्हें अपने आश्रय में अभय प्रदान कर, बल, तेज, यश, सौभाग्य प्रदान करने में पूर्ण समर्थ देव हैं, भैरव-शिव समान ऐसे देव हैं, जो कि साधक किसी भी रीति से उनकी पूजा-साधना करे-प्रसन्न होकर अपने भक्त को पूर्णता प्रदान करते हैं, भैरव सभी प्रकार की योगिनियों, भूत-प्रेत, पिशाच के अधिपति है। भैरव के विभिन्न चरित्रों, विभिन्न पूजा विधानों, स्वरूपों के सम्बन्ध में शिवपुराण, लिंग पुराण इत्यादि में विस्तृत रूप से दिया गया है।
उच्चकोटि के तांत्रिक ग्रंथों में बताया गया है, कि चाहे किसी भी देवी या देवता की पूजा हो भैरव की पूजा आवश्यक है। जिस प्रकार से गणपति समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं, ठीक उसी प्रकार से भैरव समस्त प्रकार के शत्रुओं का नाश करने में पूर्ण रूप से सहायक है।
आज का जीवन जरूरत से ज्यादा जटिल और दुर्बोध बन गया है, पग-पग पर कठिनाइयां और बाधाएं आने लगी है, अकारण ही शत्रु पैदा होने लगे है, और उनका प्रयत्न यही रहता है कि येन-केन प्रकारेण लोगों को तकलीफ दी जाय या उन्हें परेशान किया जाय, इससे जीवन में जरूरत से ज्यादा तनाव बना रहता है।
इसीलिये आज के युग में अन्य सभी साधनाओं की अपेक्षा भैरव की साधना को ज्यादा महत्त्व दिया जाने लगा है। ‘देव्योपनिषद्’ में भैरव साधना क्यों की जानी चाहिये इसके बारे में विस्तार से विवरण है, उनका सारा मूल तथ्य निम्न प्रकार से है-
इसके अलावा हमारी अकाल मृत्यु न हो या किसी प्रकार का एक्सीडेन्ट न हो अथवा हमारे बालकों की अल्प आयु में मृत्यु न हो, आदि के लिये भी ‘भैरव साधना’ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। इसीलिये तो शास्त्रों में कहा गया है कि जो चतुर और बुद्धिमान व्यक्ति होते है, वे अपने जीवन में भैरव साधना अवश्य ही करते हैं। जो वास्तव में ही जीवन में बिना बाधाओं के निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहते हैं, वे भैरव साधना अवश्य करते हैं। जो अपने जीवन में यह चाहते हैं कि किसी भी प्रकार से राज्य की कोई बाधा या परेशानी न आवे वे निश्चय ही भैरव साधना सम्पन्न करते हैं। जिन्हें अपने बच्चे प्रिय है, जो अपने जीवन में रोग नहीं चाहते, जो अपने पास बुढ़ापा फटकने नहीं देना चाहते, वे अवश्य ही भैरव साधना सम्पन्न करते हैं।
उच्च कोटि के योगी, संन्यासी तो भैरव साधना करते ही है, जो श्रेष्ठ बिजनेस मेन या व्यापारी है, वे भी अपने पण्डितों से भैरव साधना सम्पन्न करवाते हैं। जो राजनीति में रूचि रखते है, और अपने शत्रुओं पर विजय पाना चाहते हैं, वे भी अपने विश्वस्त तांत्रिकों से भैरव साधना सम्पन्न करवाते है। यह अनुभव रहा है कि जीवन में सफलता और पूर्णता पाने के लिये भैरव साधना अत्यन्त आवश्यक है और महत्त्वपूर्ण है।
बावन भैरव साधना
भैरव का नाम भले ही डरावना और तीक्ष्ण लगता हो, परन्तु अपने साधक के लिये तो भैरव अत्यन्त सौम्य और रक्षा करने वाले देव है। जिस प्रकार हमारे बॉडी गार्ड लम्बे डील डौल वाले भयानक और बन्दूक या शस्त्र साथ में रखकर चलने वाले होते हैं, पर उससे हमें भय नहीं लगता। ठीक उसी प्रकार उनकी वजह से भैरव भी हमारे जीवन के बॉडी गार्ड की तरह हैं, वे हमें किसी प्रकार से तकलीफ नहीं देते अपितु हमारी रक्षा करते हैं, और हमारे लिये अनुकूल स्थितियां पैदा करते है। यह साधना सरल और सौम्य साधना है, जिसे पुरूष या स्त्री कोई भी बिना किसी अड़चन के सम्पन्न कर सकता है।
साधना के लाभ-
तांत्रिक ग्रंथों में इसे शत्रु स्तम्भन की श्रेष्ठ साधना के रूप में एकमत से स्वीकार किया गया है।
यदि शत्रुओं के कारण अपने प्राणों को संकट हो अथवा परिवार के सदस्यों या बाल-बच्चों को शत्रुओं से भय हो, तो यह साधना एक प्रकार से आत्म रक्षा कवच प्रदान करती है। शत्रु की बुद्धि स्वतः ही भ्रष्ट हो जाती है और वह परेशान करने की सोचना ही बन्द कर देता है।
यदि आप ऐसी जगह कार्य करते हैं, जहां हर क्षण मृत्यु का खतरा बना रहता हो, एक्सीडेण्ट, दुर्घटना, आगजनी, गोली-बन्दूक, शस्त्र से या किसी भी प्रकार की अकाल मृत्यु का भय हो, तो यह साधना अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध होती है। वस्तुतः यह काल को टालने की साधना है।
स्त्रियां इस साधना को अपने बच्चों एवं सुहाग की दीर्घायु एवं प्राणरक्षा के लिये भी सम्पन्न कर सकती हैं।
साधना विधान
कालाष्टमी की रात्रि कालचक्र को अपने अधीन करने की रात्रि है, काली और काल भैरव दोनों की संयुक्त सिद्धि रात्रि है। इस साधना को 12 नवम्बर 2025 काल भैरव जयंती के दिन या किसी भी मंगलवार या अष्टमी की रात्रि को प्रारम्भ करना चाहिये।
साधक रात्रि 10:00 बजे पश्चात् स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ काला वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर काला आसन बिछाकर पूजा स्थान में बैठ जायें। अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर काला वस्त्र बिछाकर ‘‘काल भैरव यंत्र’’ को किसी ताम्र पात्र में स्थापित कर ‘काल गुटिका व जीवन्त गुटिका’ को यंत्र के बायी ओर स्थापित करें। सर्वप्रथम संक्षिप्त गणेश/गुरू पूजन कर गुरू मंत्र की एक माला जप करें।
तत्पश्चात् यंत्र का पूजन कुंकुम, लाल पुष्प, तेल दीपक, अगरबत्ती व गुड़-घी का प्रसाद अर्पित कर सम्पन्न करें। फिर भैरव के निम्न स्तोत्र मंत्र का मात्र 108 बार उच्चारण करें-
यं यं यं यक्ष रूपं दश दिशि विदितं भूमि कम्पायमानं।
सं सं सं संहारमूर्ति शिर मुकुट जटाशेखरं चन्द्र बिम्बम्।
दं दं दं दीर्घ कायं विकृत नख मुखं ऊर्ध्वरोमं करालं।
पं पं पं पाप नाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।
दायें हाथ की मुट्ठी में काली सरसों लेकर निम्न मंत्र का 11 बार उच्चारण करें-
ऊँ काल भैरव, श्मशान भैरव, काल रूप काल भैरव! मेरी बैरी तेरो आहार रे। काढ़ि करेजा चखन करो कट कट। ऊँ काल भैरव, बटुक भैरव, भूत भैरव, महा भैरव, महा भय विनाशनं देवता। सर्व सिद्धिर्भवत्।
फिर अपने सिर पर से सरसों को तीन बार घुमाकर सरसों के दानों को एक कागज में लपेट कर रख दें। तत्पश्चात् ‘‘काली हकीक माला’’ से निम्न मंत्र की 1 माला जप 11 दिनों तक सम्पन्न करें।
मंत्र:
।। ऊँ भ्रं भैरवाय भ्रं नमः।।
मंत्र जप समाप्ति उपरांत गुरू मंत्र की एक माला जप करें। गुड़-घी का प्रसाद कुत्ते को अर्पित करें, ध्यान रखें प्रसाद स्वयं ग्रहण न करें है। साधना समाप्ति उपरांत यंत्र, गुटिका व सरसों के दानों को कपड़े में बांधकर दरवाजे के उपर लटका दें। माला को किसी नदी या पवित्र जलाशय में विसर्जित कर दें। साधना काल में शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करें व भूमि शयन करें। यह शत्रु बाधा निवारण का विशिष्ट प्रयोग है।
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