





अगहन माह मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और शक्तिमयी सीता का विवाह हुआ था। शास्त्रों ने इस दिवस को विवाह पंचमी नाम से सम्बोधित किया। सभी गृहस्थियों के लिए राम-सीता का वैवाहिक जीवन आदर्श स्वरूप है। इनका वैवाहिक जीवन इसलिए सर्वोच्च माना जाता है कि एकमात्र इनका ही जीवन पति-पत्नी युगल रूप में ऐसा है, जिसमें केवल कर्तव्य निर्वाह ही मुख्य रहा है, दोनों ने कभी भी अधिकारों की बात नहीं की।
माता सीता का आदर्शवान गृहस्थ जीवन श्रीरामचरित मानस में एक प्रसंग है, जब श्रीराम और सीता ने विवाह के पश्चात् पहली बार बात की तो राम ने सीता को वचन दिया कि वे जीवन भर उनके प्रति निष्ठावान रहेंगे। उनके जीवन में कभी कोई दूसरी स्त्री नहीं आयेगी। सीता ने भी वचन दिया कि हर सुख और दुख में वे उनके साथ रहेंगी। राम और सीता ने पहली बातचीत में भरोसे ओर समर्पण की प्रतिज्ञा ली थी। समर्पण राम का था तो सीता भी प्रत्येक कदम पर सहयोगी रहीं और यही कारण रहा कि इन दोनों के मध्य कभी व्यक्तिगत रूचियां अड़चन नहीं बनी और ना ही दोनों के बीच कभी अहंकार कोई कारण बना। दोनों एक-दूसरे के सुख की चिंता करते थे।
वर्तमान में सर्वाधिक रिश्ते व्यक्तिगत रूचि और अहंकार के कारण ही खण्डित होते हैं। रिश्तों में समर्पण की भावना समाप्त सी हो गई हैं और यदि हम वैवाहिक जीवन के मूल तत्व सर्मपण व भरोसे को पुनः जीवन्त बना लें, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से परे हटकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें, तो हमारा गृहस्थ जीवन राम-सीता की तरह सफल-सुखद और शांतिदायक हो सकता है।
इसी तरह जब श्रीराम वनवास जा रहे थे, तब उनकी इच्छा थी कि सीता माता कौशल्या के पास ही रुक जाएं। जबकि सीता श्रीराम के साथ वनवास जाना चाहती थीं और माता कौशल्या भी चाहती थीं कि सीता वनवास ना जाये। इस विषय पर सीता की इच्छा अलग और श्रीराम-कौशल्या की इच्छा अलग थी, लेकिन श्रीराम के धैर्य, सीता जी और कौशल्या जी की समझ से सभी मतभेद दूर हो गये, अंततः सीता जी श्रीराम के साथ वनवास गयीं।
वर्तमान में बहुत सी स्त्रियां ऐसी मिल जायेंगी, जो पति के आय पर संतुष्ट नहीं होती, उनकी इच्छाएं नित्य बढ़ती ही रहती है। सांस, बहू और बेटे के बीच मतभेद और कलह-क्लेश प्रतिदिन होते रहते हैं। इन सभी का कारण अधिकार और कर्तव्य निर्वाह मुख्य रूप से होता है, सभी लोग अपने-अपने अधिकार की बात करते हैं, परन्तु कर्तव्य निर्वाह की ओर कम ही ध्यान जाता है, ये बाते पति-पत्नी, सास सभी पर समान रूप से लागू होती है। यदि किसी में भी कर्तव्य निर्वाह की भावना प्रबल रूप से है, तो उसे अधिकार स्वतः ही धीरे-धीरे प्राप्त हो जाते हैं। अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किसी संघर्ष की आवश्यकता नहीं होती है। इसके लिये अनिवार्यता केवल इतनी ही है कि आप अपने कर्तव्य का निर्वाह निष्ठा पूर्वक करें।
केवट की नाव में जब सीता ने श्रीराम के चेहरे पर संकोच के भाव देखे तो सीता तुरंत ही समझ जाती हैं कि राम केवट को कुछ भेंट देना चाहते हैं, लेकिन उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था। यह बात समझते ही सीता ने अपनी अंगूठी उतारकर केवट को देने के लिए आगे कर दी। लेकिन केवट ने मना कर दिया और कहा वनवास पूर्ण होने पर आप मुझे जो भी उपहार देंगे, मैं उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लूंगा।
रामचरित मानस के इस प्रसंग में स्पष्ट उल्लेखित है कि पति-पत्नी के मध्य ठीक इसी प्रकार की समझ होनी चाहिये। दोनों के बीच अन्डर स्टैंडिग बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह एक ऐसा तथ्य है जो सम्पूर्ण गृहस्थ जीवन को एक अलग ही आनन्द से युक्त करता है। वैवाहिक जीवन में दोनों की आपसी समझ जितनी मजबूत होगी, गृहस्थ जीवन उतना ही मधुर आनन्ददायक होगा।
सीता जी और राम जी वन में साथ रहे, इनकी यह बात संदेश है कि पति-पत्नी गृहस्थी की धुरी होते हैं। सफल गृहस्थी ही सुखी परिवार का आधार है, यदि पति-पत्नी के रिश्ते में थोड़ी भी दूरी है तो फिर परिवार कभी खुश नहीं रह सकता, परिवार का सुख, गृहस्थी की सफलता पर निर्भर करता है।
राम-सीता के गृहस्थ जीवन में ऐसे कई तत्व हैं, जिसें सभी दाम्पत्य को अपने जीवन में सम्मिलित करना चाहिये, जिससे आपका गृहस्थ जीवन भी प्रभु श्रीराम और माता सीता के समान ही आत्मिक, मानसिक रूप से एकरस हो सकेगा और आप अपने गृहस्थ जीवन को पूर्ण सुख-शांतिमय व्यतीत कर सकेंगे।
आदर्श गृहस्थ जीवन और मनोनुकूल पति-पत्नी प्राप्ति के लिये राम-जानकी सौभाग्य साधना सर्वोत्तम है। 25 हजार साल बाद भी विवाह निमंत्रण पत्र में राम-सीता, शिव-पार्वती चित्र लगाते हैं की उनके जैसे हमारे भी नूतन गृहस्थ जीवन में सुख, सौभाग्य, शांति, आनन्द, प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास, आदर्श मर्यादा, सुआचरण, शालीनता, कार्य कुशलता, निरन्तर क्रियाशीलता आदि गुण हमें प्राप्त हो सके। अनेक-अनेक प्रकार की विसंगतियां, उत्थान-पतन, दुःख, कष्ट होते हुये भी भगवान शिव जी के और प्रभु श्रीराम जी के परिवार पूरे ब्रह्माण्ड में श्रेष्ठ और आदर्शमय माने जाते है। पाणिग्रहण के समय में भी पंडित-ब्राह्मण जन ‘यथा रामस्य सीता:’ आदि श्लोक मंत्र का भी उच्चारण करते हैं कि श्रीराम सीता जी का गृहस्थ जीवन का उपरोक्त सारे भाव गृहस्थ जीवन में आदर्श योग्य पति तथा सुलक्षणा पतिव्रता पत्नी के रूप में प्रतिफलित हो।
राम-जानकी साधना के माध्यम से हम अपने गृहस्थ जीवन में ऐसे सुन्दर और आदर्शमय पुरूषोत्तम भाव को प्राप्त कर सकते हैं। विवाह योग्य कन्या और युवको के लिये ये साधना अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होती है। वर कन्या के मांगलिक दोष, वैधव्य योग, विधुर योग, धन हीनता योग, व्यभिचारिणी योग, अलक्ष्मी योग, शनि, राहु, केतु, मंगल आदि के कारण विवाह में विलंब तथा दांपत्य जीवन में कलह अशांति, विच्छेद आदि बाधक योग- ग्रह दोष आदि इसी साधना के माध्यम से समाप्त होते है। सुयोग्य उच्चकुल वर की प्राप्ति और सर्वगुण सम्पन्न सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति के लिये राम-जानकी सौभाग्य साधना जिन्हें विवाह सम्पन्न हुये 14 वर्ष व्यतीत नहीं हुये हो अथवा विवाह योग्य कन्या और युवकों को अवश्य करनी चाहिये।
साधना विधान-
पूजन सामग्री- श्री फल, आचमनी पात्र, जल, अष्टगंध, कुंकुम, सिन्दुर, पुष्प, अगरबती, दीपक, अक्षत, मौली, सुपारी, फल, प्रसाद दक्षिणा आदि की व्यवस्था पूर्व में ही कर दें।
चेतन्य सामग्री- राम-जानकी वैवाहिक सुख वृद्धि यंत्र, राम-जानकी चेतना शक्ति प्राप्ति जीवट, विवाह सुख प्राप्ति सौभाग्य माला।
विवाह पंचमी दिवस 25 नवम्बर को प्रातः काल में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर अपने पूजा स्थान में पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ जायें। सर्वप्रथम ललाट पर सिन्दूर का तिलक लगायें। अब अपने सामने चावल की ढ़ेरी पर राम-जानकी वैवाहिक सुख वृद्धि यंत्र स्थापित कर दें। यंत्र के सामने राम-जानकी चेतना शक्ति प्राप्ति जीवट एक ताम्रपात्र में रखें, पश्चात् जीवट का धूप, दीप, अक्षत, पुष्प से पूजन करें और जीवन में तीन महत्वपूर्ण सुख आरोग्यता, संतान सुख, सुहाग सौभाग्य प्राप्ति हेतु यंत्र पर कुंकुम से तीन बिन्दी लगायें।
अब अपने गृहस्थ जीवन के सभी कलह-क्लेश, मतभेद, अभाव, हीनता की पूर्ण समाप्ति और सर्व गृहस्थ सुख प्राप्ति हेतु संकल्प लेकर जल भूमि पर छोड़ दें। फिर विवाह सुख प्राप्ति सौभाग्य माला से निम्न मंत्र का पांच माला मंत्र जप करें-
मंत्रः
।। ऊँ ह्रीं ऐं क्लीं विवाह संस्कार सुख प्राप्यर्थे ऊँ नमः ।।
उक्त मंत्र जप के पश्चात् एक माला गुरु मंत्र का जप करें, फिर राम चालीसा का पाठ कर गुरु आरती करें। साधना पूर्ण होने पर सभी सामग्री किसी नदी, जलाशय अथवा व्यक्तिगत रूप से गुरुदेव से मिलकर उनके चरणों में अर्पित कर आशीर्वाद् प्राप्त करें।
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