





ललिताम्बा साधना अपने आप में एक गोपनीय साधना है। जिसका ज़िक्र कई तंत्र ग्रंथों में आया है और इसे संसार की अद्वितीय साधना की श्रेणी में स्थान प्रदान किया गया है। विभिन्न ग्रन्थों में इस साधना की विशेषतायें प्रस्तुत की गई हैं जो इस प्रकार हैं।
गोरक्ष संहिता – में बताया गया है कि ललिताम्बा साधना अपने आप में गोपनीय अतिगोपनीय है और इसे भूल कर के भी अपने पुत्र या अपने शिष्य को नहीं देनी चाहिये।
शंकरभाष्य- में कहा गया है कि ललिताम्बा सिद्ध करने के बाद साधक पूरे संसार में विजयी होता ही है। वह व्यक्ति जिस भी किसी से मिलता है उस पर अपना पूर्ण प्रभाव डालता ही है और उस पर विजय प्राप्त करता है।
तंत्र संसार- में बताया गया है कि सौभाग्यशाली साधक ही ललिताम्बा यन्त्र प्राप्त कर सकते हैं, इसे सिद्ध करने पर उसके शत्रु स्वतः समाप्त हो जाते हैं और उसके जीवन में किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
रसतंत्र-में बताया गया है कि ललिताम्बा साधना कायाकल्प साधना है। इसके मंत्र के द्वारा नपुन्सक व्यक्ति भी पूर्ण यौवनवान एवम् कामदेव के समान सुन्दर बन जाता है । यह साधना व़ृद्धावस्था को समाप्त कर पुनः यौवन प्रदान करने में समर्थ है।
मंत्र विज्ञान- में यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि एक तो ललिताम्बा यंत्र और उससे सम्बन्धित मंत्र अत्यधिक दुर्लभ है पर यदि यह किसी को प्राप्त हो जाती है तो उसे शून्य सिद्धि स्वतः सिद्ध हो जाती है। उसे वायु से कोई भी वस्तु प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है और ऐसा व्यक्ति सिद्ध महायोगी कहलाता है।
विश्वामित्र संहिता- में ललिताम्बा साधना की प्रशंसा करते हुये बताया गया है कि गुरु अपनी तेजस्विता से इस यन्त्र को सिद्ध कर के अपने शिष्य को प्रदान करें और जब शिष्य ऐसा यन्त्र धारण कर साधना करता है तो उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और वह एक क्षण में किसी को भी भस्म करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
व्यास समुच्चय- ग्रन्थ में यह बताया गया है कि हजारों कार्यों को भी छोड़ कर इस साधना को करना चाहिये क्योंकि यह साधना कई कई जन्मों के पुण्यों से प्राप्त होती है। इसके अलावा भी कई अन्य ग्रन्थो में ललिताम्बा साधना की प्रशंसा की गई है पर किसी भी ग्रन्थ में ललिताम्बा यन्त्र को बनाने की विधि, साधना सूत्र या फ़िर मन्त्र के बारे में प्रमाणिक ज्ञान प्रदान नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में यह हमारी पीढ़ी का सौभाग्य है कि महायोगी त्रिजटा अघोरी ने साधना विधि को ढूंढ निकाला, यन्त्र को बनाने और उसे सिद्ध करने की प्रक्रिया स्पष्ट की और ललिताम्बा मन्त्र को पूर्णता के साथ स्पष्ट किया।
साधना विधि
यह मात्र तीन दिवसीय रात्रिकालीन साधना है। साधक अपने पूजा स्थान को सर्वप्रथम धो लें। उसके बाद स्नान कर पीली धोती पहन कर उत्तराभिमुख हो कर बैठ जायें।
अपने सामने मन्त्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित ललिताम्बा यन्त्र को स्थापित करें। इसके बाद यन्त्र का धूप-दीप से पूजन करें। सबसे पहले हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि मैं अमुक गोत्र, अमुक नाम का साधक भगवती ललिताम्बा के प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूं और साथ ही साधना सम्बन्धित सभी सिद्धियां भी प्राप्त करना चाहता हूं। इसके बाद गुरु पूजन सम्पन्न करें और उनसे साधना में पूर्ण सफ़लता के लिये प्रार्थना करें। इसके बाद ललिताम्बा शक्ति माला गुरु मन्त्र का जाप करें। अब ललिताम्बा मन्त्र का 21 बार पाठ करें। ऐसा नित्य तीन दिनों तक करें और इसके बाद यन्त्र को धागे में पिरो कर गले में पहन लें या बांह में धारण कर लें। ऐसा करने पर साधक को यह साधना सिद्ध हो जाती है और साधक को ऊपर बताये गई सभी सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।
ललिताम्बा मन्त्र
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं हंसः ऊँ नमो भगवति, अक्षोभ्ये रूक्ष-कणं, राक्षसि, पक्ष-त्रणे, क्षपे, पिंगंलाक्षि, अरुणे, क्षये लीले, लोले ललिते, लुते, लुलिने, लुम्बिके लंकेश्वरि लासे, विमले, हुताशिनि, विशालाक्षि, हूंकारे, वडवामुखि महा-रवे, महा-क्रोड-क्रोधिनि, खरास्ये, सर्वज्ञे, तरले, तारे, द़ृष्टि-हृ्ष्टे, खग-कन्धरे सारसि, रस-रस-संग्रहिणि, ताल जन्ग, करंकिंणि, मेघनादे, प्रचण्डोग्रे, काल-कर्णि, चौल-प्रदे, चम्पे, चम्पावति, प्रचम्पे, मलयान्तकि, पितृ-वक्ते, पिशाचाक्षि पिशुनि, लोलुपे, वानति, वानरि, वायु-विकृतास्ये, वायु-वेगे, ब़ृहत्-कुक्षि-विकृते, रिश्य रूपिणि।
कामाकर्षिणि (बुद्धयाकर्षिणि, अहंकाराकर्षिणि, शब्दाकर्षिणि, स्पर्शाकर्षिणि, रूपाकर्षिणि, रसाकर्षिणि, गन्धाकर्षिणि, चित्ताकर्षिणि, धैर्याकर्षिणि, स्मृत्याकर्षिणि, नामाकर्षिणि, बीजाकर्षिणि, आत्माकर्षिणि, अनात्माकर्षिणिद्ध, अम़ृताकर्षिणि, शरीराकर्षिणि, गुप्त-योगिनीशि, बौद्धदर्शनांगि, सर्वाशा-पूरक-चक्र-स्वामिनि।
अनंग-कुसुमे, अनंग-मेखले, अनंग-मदने, अनंग-मदनातुरे, अनंग-रेखे, अनंग-वेगिनि अनंगकुशे, अनंग-मालिनी, अति-गुप्त-योगिनीशि, रौद्र-दर्शनांगि, सर्व संक्षोभिणि-चक्र स्वामिनि, पूर्वाम्नाये श स़ृष्टि-प्रदे।
सर्व-सिद्धि-प्रदे, सर्व-सम्पत-प्रदे, सर्व-प्रियन्करि सर्व-मंगल कारिणि, सर्व-काम-प्रदे, सर्व दुःख विमोचनि, सर्व-म़ृत्यु-प्रशमनि, सर्व-विघ्न-निवारण सर्वांगसुन्दरी, सर्व-सौभाग्य-दायिनि, कुल-कौल-योगिनीशि, सर्वार्थ-साधक-चक्र-सेवामिनी।
वास्तव में ही यह साधना अदभुत और अद्वितीय साधना है। एक प्रकार से देखा जाये तो यह मन्त्र सर्वथा गोपनीय ही रहा है। यह हमारे जीवन का सौभाग्य है कि हमे इस उच्चकोटि की साधना करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। यह प्राण संजीवन काल सिद्धि मन्त्रों से आपूरित ललिताम्बा सिद्धि यन्त्र तो सर्वाधिक दुर्लभ और अप्राप्य है, अत्यधिक व्यय करने पर भी ऐसा यन्त्र प्राप्त होना कठिन ही है।
यह साधना अपने आप में एक विशिष्ट साधना है जिसको सिद्ध करने से धन धान्य की निरन्तर व़ृद्धि होने लगती है, जीवन में किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता वहीं दूसरी ओर उसके शत्रु स्वतः समाप्त हो जाते हैं और वह त्रिकालदर्शी बन जाता है। किसी का भी भूत और भविष्य उसके सामने स्पष्ट हो जाता है और ललिताम्बा की कृपा से उसका तीसरा नेत्र खुल जाता है और उसमें श्राप और वरदान देने की क्षमता आ जाती है।
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