





शास्त्रों में कहा गया है, कि भगवान गणपति समस्त विघ्नों को नाश करने वाले, कार्यो में सिद्धि देने वाले तथा जीवन में पूर्णता देने वाले, है, इसीलिये ‘कलौ चण्डी विनायकी’’ से कहा गया है, अर्थात् कलियुग में दुर्गा एवं गणेश ही पूर्ण सफलता देने में सहायक है।
विश्व के समस्त साधक इस बात पर एक मत है, कि प्रत्येक कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिये सर्व-प्रथम गणपति का ध्यान या उनकी पूजा आवश्यक है, देवताओं में भी गणपति की पूजा को सर्व प्रथम स्वीकार किया है, यहीं नहीं अपितु भगवान शिव ने भी कार्य की सफलता के लिये सबसे पहले गणपति की साधना को आवश्यक बताया है।
यों तो गणपति से संबंधित सैकडों, हजारों स्तोत्र है, परन्तु उनमें ‘‘मयूरेश-स्तोत्र’’ का महत्त्व सर्वोपरि है, यह स्त्रोत अपने आप में चैतन्य और मन्त्र सिद्ध है, अतः इसका पाठ ही पूर्ण सफलता देने में सहायक है।
घर में आने वाली बाधाओं, बच्चों के रोग निवारण घर में सुख-शांति, उन्नति तथा प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिये ‘मयूरेश स्तोत्र’ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, इन्द्र ने स्वयं इस स्तोत्र द्वारा गणपति को प्रसन्न कर विघ्नों पर विजय प्राप्त की थी।
इस स्त्रोत का पाठ पुरूष और स्त्री समान रूप से कर सकते है, हमारे जीवन में प्रत्येक दिन का प्रारम्भ मयूरेश स्तोत्र से होना चाहिये।
पूजा विधिः
सर्व प्रथम साधक को स्नान कर आसन पर बैठ जाना चाहिये, आसन ऊनी या सूती वस्त्र का हो सकता है, साधक को पूर्व की तरफ मुंह कर बैठना चाहिये, अपने सामने गणपति की मूर्ति या तस्वीर स्थापित कर देनी चाहिये इस प्रकार की पूजा या साधना किसी भी बुधवार से प्रारम्भ की जा सकती है।
सबसे पहले साधक या साधिका को भक्तिपूर्वक गणपति को प्रणाम करना चाहिये और निम्न ध्यान करना चाहिये।
सर्व स्थूलतनु गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं
प्रस्यन्दन्मधुगन्धलुवधमधुपव्यालोलगणडस्थलम्।
दन्ताधातविदारितारिरूधिरैः सिन्दूरशोभाकर
वन्दे शैलसुत गणपति सिद्धिप्रदं कामदम्।।
सिन्दूराभ त्रिनेत्र पृथुतरजठर हस्तपद्मैर्दधानं
दन्त पाशांकुशेष्टान्द्यु रूकरविलसद्वीजपूरा विरामम्
वालेन्दुद्यौतमौलिं करिपतिवदन दानपूरार्द्रगण्ड
भौगीन्द्रा बद्धभूष भजत गणपति रक्तवस्त्रांगरागंम्
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्ष्यो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशै तानि नामानि य पठच्छ्रणुयादपि।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।
इसके बाद गणपति की पूरी पूजा होनी चाहिये, देवताओं के षोडष पूजन में निम्नलिखित उपचार माने गये है-
(1) आह्वान, (2) आसन, (3) पाद्य, (4) अर्ध्य (5) आचमनीय, (6) स्नान, (7) वस्त्र, (8) यज्ञोपवीत (9) गध, (10) पुष्प, (दुर्वा) (11) धूप, (12) दीप, (13) नेवैद्य, (14) तांबूल, (15) प्रदक्षिणा, (16) पुष्पाजंली।
सावधानियां
(1) दही, (2) दुर्वा, (3) कुशा, (4) पुष्प, (5) अक्षत, (6) कुंकुम, (7) पीली सरसों और (8) सुपारी।
इन आठ वस्तुओं को एक पात्र में लेकर गणेश जी को अर्घ्य दिया जाता है।
(क) जो कीड़ों से दूषित हो,
(ख) बासी हो।
(ग) पेड़ से या पौधे से नीचे गिर हुए हो।
(घ) अधखिले पुष्प सर्वथा वर्जित है।
(च)देवता पर चढ़ा हुआ, बांये हाथ में रखा हुआ, पहनी हुई धोती के पल्ले में लाया हुआ अथवा जल से धोया हुआ पुष्प भी त्याज्य होता है, देवता लोग ऐसे पुष्प ग्रहण नहीं करते।
(छ)पुष्प देवता पर चढ़ाते समय अधोमुख नहीं होना चाहिये।
(ज) फूल तोड़ने का काम स्नान से पूर्व करना चाहिये तथा तुलसी दल का चयन स्नान के बाद उचित है।
(झ) फूल को वस्त्र या हाथ में लाना मना है।
(ट) शुष्क और अपवित्र पुष्प पूजा में सर्वथा त्याज्य है।
(ठ) कुशा या दुर्वा से देवता पर जल छिड़कना पापमय जाना जाता है ऐसा जल वजापात तुल्य माना गया है।
गणपति की पूर्ण पूजा कर साधक को चाहिये कि वह ‘मयूरेश स्तोत्र’ का पाठ करे, यह स्त्रोत समस्त प्रकार की चिन्ताओं तथा परेशानियों को दूर करने वाला, समस्त प्रकार के भौतिक सुख, आर्थिक व्यापारिक उन्नति व्यापार में लाभ, राज्य कार्य में विजय तथा समस्त उपद्रवों को नाश करने में पूर्ण समर्थ है।
स्त्री या बालक भी स्त्रोत का पाठ कर सकते है, किसी भी वर्ण या जाति का व्यक्ति इस पाठ को श्रद्धा पूर्वक कर सकता है, स्त्रियों को चाहिये कि वह रजस्वला दिन से सात दिन गणपति पूजन न करे, सात दिनों तक स्त्री पूजन कार्य या मांगलिक कार्य में अशुद्ध मानी जाती है।
गणपति की पूजा में सुगन्धित द्रव्य तथा घी का दीपक विशेष महत्त्वपूर्ण है, साधक को चाहिये कि वह नित्य अपने पूजा कार्य में इस स्तोत्र को सम्मिलित कर ले तथा सर्वप्रथम गणपति पूजन एवं मयूरेश स्तोत्र का पाठ करे, गायत्री स्मरण भी इसके बाद किया जाना चाहिये।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यह स्त्रोत अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण त्वरित सफलतादायक, विघ्नों, बाधाओं और कठिनाईयों को दूर करने तथा समस्त प्रकार की भौतिक सुविधाओं को प्रदान करने में समर्थ एवं सर्वश्रेष्ठ है।
चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये
मयूरेशस्तोत्रम्
ब्रह्मोवाच
पुराण पुरूषं देवं नाना क्रीडाकरं मुदा।
मायाविनं दुविभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
परात्परं चिदानन्दं निर्विकार हृदि स्थितम्।
गुणातीतं गुणाम मयूरेशं नमाम्यहम्।।
सृजन्तं पालयन्तं च सहयन्तं निजेच्छया।।
सर्व विघ्नहर देवं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि विभ्रतम्।
नानायुधधरं भक्त्वा मयूरेशं नमाम्यहम्।।
इन्द्रादिदेवतावृन्देरभिष्टुतमहर्निषम्।
सदसदृयक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम्।
सर्वशक्तिमयं देव सर्वरूपधरे नमाम्हम्।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यम्।।
पार्वतीनन्दन शम्भोरानन्दपरिवर्धनम्।
भक्तानदकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
मुनिध्येययं मुनिनुतं मुनिकामप्ररकम्।
समष्टिव्यष्टिरूप त्वां मयूरेशं नमाम्ययम्।
सर्वाज्ञाननिहन्तार सर्वज्ञानकरं शुचिम्।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।
अनेककोटिब्रह्माण्डनायक जगदीष्वरम्।
अनन्त विभवं विष्णु मयूरेशं नमाम्यम्।।
मयूरेशं उवाच
इदं ब्रह्मकर स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम्।
सर्वकामप्रदं नृणां सर्वाप्रदवनाशनम्।।
कारागृह गतानां च मोचनं दिनसप्ताकात।
आधिव्याधिहर चैत्र भुक्तिमुक्तिप्रद शुभम्।।
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