





खगोल शास्त्रियों के अनुसार केवल सूर्य के प्रकाश से ही आकाश मंडल के सारे ग्रह प्रभायुक्त हैं। पृथ्वी और चन्द्रमा को सूर्य से ही प्रकाश प्राप्त होता है। सामान्यतः पूर्णमासी को चन्द्रमा सम्पूर्ण रूप में पृथ्वी से दिखाई देता है। जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है और किसी पूर्णमासी के दिन चन्द्रमा और सूर्य के बीच में पृथ्वी का कोई भू-भाग आ जाता है तो उस कालखण्ड के दौरान सूर्य की किरणें चन्द्रमा तक नहीं पहुँच पाती हैं और उतना हिस्सा कटा हुआ दिखाई देता है, उसे चन्द्रग्रहण कहा जाता है।
चन्द्रग्रहण के दिन का विशेष समय साधक के लिये महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि उन क्षणों में साधना सम्पन्न करने पर साधक की अन्तः स्थिति विशेष तरंगों द्वारा ग्रहों से जुड़ जाती है और जिस व्यक्ति का भी इन तरंगों से सामंजस्य हो जाता है वह अपने जीवन में सफल हो जाता है।
चन्द्रग्रहण के समय साधना सम्पन्न करने पर व्यक्ति अपनी बाधाओं, समस्याओं और परेशानियों से हमेशा के लिये छुटकारा पा सकता है क्योंकि समय का अपने आप में विशेष महत्त्व होता है और इस दिन का भलीभांति उपयोग कर वह अपने लिये सफलता के द्वार खोल लेता है।
वास्तविक साधक जानता है कि उसे किस क्षण कौन-सी साधना करनी चाहिये और वह प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के प्रति चौकन्नी दृष्टि रखते हुये सामान्य साधनाओं की अपेक्षा तंत्र की साधनाओं को प्रमुखता देता है।
तांत्रोक्त साधनायें भी जहाँ एक ओर सौम्य हैं, वहीं अपने प्रवाह में झटके से विशाल वृक्ष को भी उखाड़ कर गिरा देने की क्षमता से युक्त भी हैं, और बिना विनाश के नव-निर्माण संभव भी तो नहीं। प्रकृति की यह उग्रता और तंत्र की प्रचण्डता के सभी तालमेल का दिन कालरात्रि, दीपावली की रात्रि या होलिका दहन की रात्रि होती है। प्रकृति इस दिन सामान्य स्थिति में नहीं होती। इन दिवसों में कण-कण पूरी क्षमता से कम्पनमय रहता है।
चन्द्रग्रहण युक्त होलिका दहन के रात्रि का संयोग तंत्र साधनाओं के लिये विशेष व दुर्लभ समय खण्ड है। इस काल का पूर्णतः लाभ प्राप्त करने हेतु तंत्र साधनायें सर्वोत्तम हैं। भैरूण्डा तंत्र जीवन के सभी स्वरूपों को स्पष्ट करते हुये प्रत्येक स्वरूप व्यक्तित्व, शौर्य, आनन्द, गृहस्थ सुख, मानसिक सुख, शत्रु विजय, वशीकरण, कामनापूर्ति, काम-विकास, परिपूर्णता आदि प्रत्येक के सम्बंध में विकास किस प्रकार से सम्भव है, स्पष्ट करता है, और इस विशेष तंत्र के जितने भी योगी हैं, वे पूर्ण पुरूष हैं, उनकी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति इतनी अधिक प्रबल रहती है कि वे अपनी इच्छानुसार जीवन जीते हैं।
भैरूण्डा तंत्र व्याख्या
भैरूण्डा तंत्र ऐसी विशेष शक्तियों के स्वरूप की साधना है, जो कि पूर्ण विधि-विधान सहित, साधक द्वारा साधना करने पर सिद्ध होती है, और साधक जिस समय अपने विशेष कार्य के लिये जिस भैरूण्डा शक्ति की विशेष साधना करता है, वह उसमें समाहित होकर उसका कार्य पूर्ण कर देती है, अलग-अलग प्रकार के कार्यों के लिये अलग-अलग शक्तियों का उपयोग आवश्यक है, और यही भैरूण्डा तंत्र की विशेषता भी है, भैरूण्डा की विशेष शक्तियां-
कामेश्वरी, महाविद्येश्वरी, भगमालिनी, नित्य-क्लिनना, वन्निवासिनी, शिवदूती, त्वारिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताकिनी, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी, विचित्रा है।
इस प्रकार के चौदह शक्तियां, भैरूण्डा शक्तियां कही जाती हैं, इनमें से प्रत्येक शक्ति का कार्य, साधना, प्रभाव, मंत्र, अलग-अलग है, ये प्रचण्ड शक्तियां नियमित पूर्ण साधना करने से ही साधक के वश में हो जाती है, फिर साधक स्वयं शक्तिपुंज बन जाता है।
भैरूण्ड शक्तियों की साधना के लिये यह आवश्यक है, कि साधक इनकी साधना बिना किसी को बताये करें, किसी भी रूप में मजाक में लेते हुये अथवा केवल आजमानें के लिये इसकी साधना नहीं करें, और न ही इसका प्रचार व्यंग के रूप में करें, शक्ति उसे ही प्राप्त होती है, जो कि पूर्ण श्रद्धा से शक्ति को अपने भीतर समाहित करना चाहता है।
भैरूण्डा महाविद्येश्वरी साधना
जब बुद्धि, ज्ञान और परिश्रम का संयोग नहीं बन पाता है, तो कार्य सफल नहीं होते हैं, वाणी ऐसी होनी चाहिये, जिससे कोई बात कहें, वह पूर्ण रूप से प्रभावित हो जाये कहने पर कार्य होना ही चाहिये, साथ ही बुद्धि में इतनी तीव्रता होनी चाहिये, कि दूसरे के विचारों को, भावों को भांप लें, और किस क्षण क्या करना है, ऐसा होना चाहिये, जीवन में उन्नति शरीर-बल के माध्यम से नहीं अपितु बुद्धि-बल के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।
गुप्त भैरूण्डा तंत्र में महाविद्येश्वरी साधना का विशेष स्थान है, इसके बीज मंत्र में कुछ ऐसा अक्षर-विन्यास है, कि साधक चैतन्य हो जाता है, उसकी मानसिक-शक्तियों का विकास तीव्र होने लगता है, किसी भी बात को समझने में उसे समय नहीं लगता।
यह साधना होलिका दहन के दिन अथवा कृष्ण पक्ष के गुरूवार को सम्पन्न की जा सकती है, इस साधना में विशेष रूप से ‘भैरूण्डा चैतन्य महाविद्येश्वरी शंख’ तथा ‘दो भैरूण्डा चक्र’’ आवश्यक है।
साधक प्रातः सूर्योदय से पहले ही स्नान कर, श्वेत वस्त्र धारण कर, अपने पूजा स्थान में बीचोबीच सामने बाजोट पर श्वेत वस्त्र बिछाकर, चावलों की ढेरी बना कर, उस पर भैरूण्डा महा शंख स्थापित करें और उसके दोनों ओर एक-एक चक्र स्थापित करें, इस साधना में विशेष बात यह है कि साधक अपने और पूजन सामग्री के बाजोट के चारों ओर श्वेत वस्त्र अथवा धोती इस प्रकार बांध दें, जिससे कि एक कक्ष समान बन जाये, सर्वप्रथम सुगन्धित अगरबत्ती और घी का दीपक चला दें, अब एक जलपात्र में थोड़ी केसर तथा चन्दन डाल कर, दाहिने हाथ की उंगलियों से भूमि पर सब दिशाओं में छींटा मारें, फिर स्थान ग्रहण करें।
स्थान पर बैठने के पश्चात भैरूण्डा चक्र के बीच में कुंकुंम से टीकी लगायें तथा महाशंख के भीतर अष्टगन्ध, चावल तथा लौंग अर्पित करें, अब शंख के दोनों ओर केसर से ‘‘ह्रीं’’ लिखें और पूजन का संकल्प करते हुये दायें हाथ में जल लेकर भूमि पर छोड़ दें।
महाविद्येश्वरी मंत्र
।। ऊँ ह्रीं फ्रें सः नित्यक्लिन्ने मदद्रवे स्वाहा ।।
|| Om Hreem Phrem Saha Nityakleenne Maddrawe Swaha ||
अब अपने हाथ में चावल के दाने लेकर, एक मंत्र का जप कर, एक दिशा में चावल फेंक दें, इस प्रकार इस मंत्र का जप 108 बार करना है।
मंत्र जप के पश्चात शंख में अर्पित किया हुआ अष्टगंध अपने कंठ में, दोनों कानों पर, मस्तक पर, हृदय स्थान पर, तथा दोनों बाहों पर लगायें, और देवी का ध्यान एवं आशीर्वाद की कामना करते हुये स्थान छोडें।
दूसरे दिन प्रातः शंख को हटा कर अपने पूजा स्थान में रख दें, तथा दोनों भैरूण्डा चक्रों को पूजा स्थान में ही आसन के नीचे जहाँ मूर्ति, चित्र, कुल-देवता इत्यादि स्थापित किये हुये हो, वहाँ स्थापित कर दें, प्रतिदिन प्रातः पूजन में एक बार मंत्र का जप अवश्य करना चाहिये।
यह मंत्र साधना एक प्रकार से बुद्धि, ज्ञान का कपाट खोल देती है, और साधक की स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती है, उसे अपने आप पर विशेष आत्मविश्वास आ जाता है, उसके सोचने-समझने का ढंग ही बदल जाता है, प्रत्येक कार्य में हर दृष्टिकोण से सोचने-समझने की क्षमता प्राप्त होती है।
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