





होली का पर्व मात्र एक त्यौहार ही नहीं अपितु साधकों के लिये स्वर्णिम वरदान स्वरूप दिवस है, इस एक रात्रि में साधक कई-कई साधनायें सम्पन्न कर अपने पूरे वर्ष को सफल और आनन्द युक्त बनाने में सफल होते हैं। भगवान शिव ने इस पर्व के प्रश्न के उत्तर में बताया है, कि जो कठिन और दुर्लभ साधनायें सामान्य दिनों में सिद्ध नहीं होती, वे होली की रात्रि को करने पर अवश्य ही सफलता प्रदान करती है।
गुरु गोरखनाथ ने तो होली के पर्व को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ तंत्र सिद्धि पर्व कहा है, उन्होंने तो यहां तक कहा है कि इस दिवस पर साधनायें अपना पूर्ण प्रभाव निश्चित रूप से छोड़ती हैं, अनेक साधनायें तो ऐसी होती हैं, जो केवल होली की रात्रि ही सम्पन्न की जाती है। चैतन्य जाग्रत साधक होली के तांत्रोक्त सिद्ध दिवस की महत्ता को समझते हैं और वे अपने गुरु के निर्देश अनुसार साधनाओं में अनुरक्त भी होते हैं।
होली उल्लास और रंगों का पर्व है, ये रंग हमारे जीवन में स्थायी रूप से तभी घुल खिल सकते हैं, जब हम उन्हें आत्मसात करने के लिये क्रियात्मक रूप से सक्रिय हों। क्योंकि रंग-गुलाल उड़ाकर मस्ती की जा सकती है, परन्तु जीवन में सुनहरे रंगो का लेपन तब ही संभव हो पाता है जब साधक अपने गुरु के निर्देशानुसार साधनात्मक चेतना को आत्मसात करे। ऐसे ही साधनात्मक भाव को आत्मसात करने हेतु होली महापर्व पर आप एक-दो या अनेक साधनायें सम्पन्न कर अपने जीवन को सप्त रंगो से युक्त धन, कामना, सुख, सम्मोहन, सौन्दर्य से युक्त बना सकेंगे।
तंत्र के आदि रचयिता भगवान शिव हैं और समस्त तांत्रिक विद्याओं की रचना उन्हीं के द्वारा हुई है। बाद के विद्वानो ने शिव रचित विद्याओं में शोध कर उनमें निहित अनेक नवीन रहस्यों को खोज निकाला और अपने शिष्यों में उस ज्ञान का संचरण कर आने वाली पीढ़ियों के लिये एक अमूल्य थाती के रूप में उन्हें सौंप दिया।
भगवान शिव ने पार्वती को योगिनी साधना के विषय में पूर्ण उपदेश दिये है। जब भगवान शिव से पार्वती ने पूछा, कि देवताओं के लिये तो स्वर्ग में सभी प्रकार के सुख उपलब्ध हैं, अप्सराएं नित्य उनकी सेवा करती रहती हैं, उन्हें अक्षुण्ण यौवन प्राप्त है और उनकी समस्त प्रकार की इच्छाएं पूर्ण होती हैं, जबकि पृथ्वी लोक में रहने वाले मनुष्यों की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं हो पातीं और वे अपनी अपूर्ण इच्छाओं के जाल में उलझे जन्म-मरण के चक्र में फंसे रहते हैं। अतः आप ऐसा उपाय बतायें, जिससे मनुष्य भी देवताओं के समान तेजस्वी और पराक्रमी बन सकें और अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं को पूर्णता प्रदान करते हुये दिव्यता के पथ पर अग्रसर हो सकें।
भगवान शिव ने उत्तर दिया-योगिनी साधना ही एकमात्र ऐसा उपाय है, जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी समस्त प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति करते हुए, भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है। योगिनी साधना सम्पन्न करने से भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। ये योगिनियां तत्काल फल देने वाली और समस्त प्रकार की अतृप्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली होती हैं।
शिव-पार्वती के इस संवाद से स्पष्ट हो जाता है, कि मानव जीवन में योगिनी साधना का महत्व क्या है। वास्तव में योगिनियां अर्द्ध देवियां हैं, देव वर्ग से इतर यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि योनियों के समान ही योगिनियों का महत्त्व है। ये तंत्र साधनाओं की आधारभूता देवियां है, अपूर्व सौन्दर्य की स्वामिनी होने के साथ ही साथ इन्हें तंत्र के गोपनीय और दुरुह रहस्यों का भी ज्ञान होता है। ये मात्र नारी आकृति ही नहीं होती, अपितु पूर्ण चैतन्यता से आपूरित एक विशिष्ट सौन्दर्य की स्वामिनी होती हैं, जिनके रोम-प्रतिरोम में साधनात्मक बल समाया होता है और नेत्रों में समाई होती है तंत्र की प्रखरता, जो कि आधार है तांत्रिक साधनाओं का।
इनके सौन्दर्य में साधना की प्रखरता भी होती है और मोहन, वशीकरण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि के साथ-साथ तंत्र की अनेक दुरूह और गोपनीय क्रियाओं में ये सहायता प्रदान करती हैं और अपने साधक को खेचरी विद्या (वायु गमन) रस सिद्धि, भू-गर्भ सिद्धि, वशीकरण, शत्रु स्तम्भन, मनोकामना पूर्ति, दिव्य रसों की सिद्धि, अदृश्य होने की शक्ति, यौवन और बल की प्राप्ति आदि सिद्धियां प्रदान कर उसे पल मात्र में ही सम्पूर्ण विश्व का एक अद्वितीय व्यक्तित्व बना देने में समर्थ होती हैं।
जीवन में योगिनी साधना की पूर्ण प्रखरता केवल प्रिया रूप में ही सम्पन्न करने पर सम्भव है। प्रेमिका के रूप में सिद्ध होने पर वे प्रतिपल साधक पर प्रेम और स्नेह की वर्षा करने के साथ-साथ उसका मार्गदर्शन भी करती रहती हैं और साधक की साधनात्मक सहचरी मात्र न होकर उसके सम्पूर्ण जीवन को गति प्रदान करने में समर्थ होती है।
तंत्र की पूर्णता को प्राप्त करने के लिये इस प्रकार की साधनाओं में भी दक्ष होना भी आवश्यक है। तांत्रिक ग्रंथों में कुल चौसठ प्रकार की योगिनियों का विवरण प्राप्त होता है। यों तो सभी का अपना अलग महत्त्व है और उसी के अनुरूप उनके अलग-अलग मंत्र व साधना विधान है, परन्तु जो प्रथम बार इस साधना को सम्पन्न करने का विचार करते हैं, उनके लिये सभी ग्रंथों ने एक मत से सर्वप्रथम जिन षोड़श योगिनियों की साधना सम्पन्न करने की आवश्यकता पर बल दिया है, वे निम्न है-
1- दिव्ययोगा 2- महायोगा
3- सिद्धयोगा 4- माहेश्वरी
5- कालरात्रि 6- हुंकारी
7- भुवनेश्वरी 8- विश्वरूपा
9- कामाक्षी 10- हस्तिनी
11- मंत्रयोगिनी 12-चक्रिणी
13- शुभ्रा 14- शंखिनी
15- पप्रिनी 16- वैताली
ये सभी योगिनियां अपने आप में दिव्य और अलौकिक क्षमताओं से युक्त होती हैं और सिद्ध होने के साथ ही अपने साधक को भी अलौकिकता, दिव्यता और अद्वितीयता प्रदान कर उसे पल भर में ही उस श्रेष्ठता पर ले जाकर खड़ी कर देती हैं, जहां पहुंचना साधक के स्व के प्रयास से असम्भव ही है।
नीचे साधक की जानकारी हेतु उपरोक्त षोड़श योगिनियों से सम्बन्धित संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है- दिव्य योगा- इस योगिनी का साहचर्य प्राप्त करने के उपरान्त ही योग विद्या को पूर्णता से समझा कर खेचरी विद्या में पारंगत हुआ जा सकता है व जीवन में उतारा जा सकता है।
महायोगा-योगिनी महायोगा का स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी है और वह अपने साधक को मान-सम्मान से सम्बन्धित अनेक सिद्धियां और पूर्ण वैभव देने में समर्थ है। इसे सिद्धि करने पर साधक चतुर्दिक, सम्पूर्ण विश्व में कीर्तिवान होता है।
सिद्धयोगा- इस योगिनी को जीवन में उतारने के उपरान्त किसी भी साधना में असफलता का प्रश्न ही नहीं रह जाता, साथ साधक त्रिकालदर्शी बनने में समर्थ होता है।
माहेश्वरी – योगिनी माहेश्वरी की साधना के फलस्वरूप जीवन की सभी समस्याएं, विघ्न, बाधाएं आदि दूर हो जाते हैं और साधक अनेक गोपनीय विद्याओं को जानने में समर्थ होता है।
कालरात्रि- इस योगिनी का आश्रय लेने पर अकाल मृत्यु, किसी गुप्त शत्रु द्वारा किये गये तांत्रिक प्रयोग आदि का निराकरण होता है व किसी के भी भूत-भविष्य-वर्तमान को जाना जा सकता है।
हुंकारी- योगिनी हुंकारी की साधना सिद्धि से साधक अकेला ही अपने शत्रु की पूरी सेना का विनाश करने में समर्थ होता है।
भुवनेश्वरी – इस योगनी के वरदायक प्रभावों से साधक वाक् सिद्धि प्राप्त करने में समर्थ होता है।
विश्वरूपा- इस योगिनी की साधना के उपरान्त साधक को भू-गर्भ सिद्धि तथा विपुल धन वैभव की प्राप्ति होती है और वह समस्त भौतिक सुखों को प्राप्त करने में समर्थ होता है। साथ ही उसकी विषय-वासना समाप्त हो कर ज्ञान की उत्पत्ति होती है।
कामाक्षी- इस योगिनी का पूजन सिर्फ केशर से किया जाता है। इसे सिद्ध करने पर साधक को कायाकल्प, कामदेव के समान यौवन व पौरुष तथा असीम बल की प्राप्ति होती है और उसके समस्त प्रकार के रोगों का नाश होता है।
हस्तिनी-हस्तिनी योगिनी की साधना के फलस्वरूप साधक उच्चाटन, स्तम्भन आदि के साथ-साथ मनुष्य, पशु, पक्षी चराचर विश्व को सम्मोहित और वशीभूत करने में सक्षम होता है।
मंत्र योगिनी-इस योगिनी के सानिध्य में साधक को मांत्रिक साधनाओं में शीघ्र ही पूर्ण सफलता प्राप्त होती है और वह अदृश्य होने की विद्या का ज्ञाता हो जाता है।
चक्रिणी- यह योगिनी योग तथा दिव्य रसों की अनेक सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ और आनन्द प्रदान कराने वाली है।
शुभ्रा-इस योगिनी की साधना से कुण्डलिनी जाग्रत होती है और साधक पदम पद प्राप्त करने की ओर अग्रसर होता है।
शंखिनी- इस योगिनी साधना से साधक को समस्त विपत्तियों, बाधाओं, शत्रुओं आदि से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है और साधक आनन्द पूर्वक साधनाओं से सफलता की ओर अग्रसर होता है।
पप्रिनी-इस योगिनी की साधना से साधक पूर्ण कायाकल्प, पौरुष व अतीन्द्रीय क्षमताएं प्राप्त करते हुये साधनात्मक पूर्णता की ओर अग्रसर होता है।
वैताली-इस योगिनी की साधना के उपरान्त साधक अत्यन्त तेजिस्वता प्राप्त करता हुआ अपने समस्त शत्रुओं का नाश करने में सक्षम होता है। साथ ही साथ उसे मंत्र साधनाओं में भी सफलता प्राप्त होती है।
इस साधना को कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, युवा हो या वृद्ध सम्पन्न कर सकता है।
साधना विधान
इस साधना में षोड़श योगिनी यंत्र व योगिनी माला की आवश्यकता पड़ती है, जो योगिनी तंत्र के अनुसार मंत्र सिद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठित हों।
इस साधना को होली पर्व या किसी भी सोमवार से प्रारम्भ किया जा सकता है।
यह ग्यारह दिवसीय साधना है।
रात्रि में नौ बजे बाद स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर बैठें।
सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा कर गुलाब की पखुंड़ियो पर षोड़श योगिनी यंत्र स्थापित करें।
मानसिक गुरु पूजन कर गुरु मंत्र की चार माला मंत्र जप करने के उपरान्त गुरुदेव से इस साधना को सम्पन्न करने की आज्ञा व इसमें पूर्ण सफलता हेतु आशीर्वाद प्राप्त करें।
फिर हाथ में जल लेकर साधना के प्रथम दिन संकल्प करें, नित्य संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं है-
मैं अमुक गौत्र में उत्पन्न अमुक नाम का व्यक्ति, अमुक पिता का संतान अपने आध्यात्मिक जीवन में षोड़श योगिनी साधना को सम्पन्न कर रहा हूं, मुझे इस साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त हो, जिससे कि मैं साधनाओं में तीव्रता के साथ आगे बढ़ कर सफलता प्राप्त कर सकूं।
यंत्र के समक्ष योगिनी का ध्यान करते हुये यंत्र का पूजन कुंकुम, अक्षत, केशर, पुष्प, धूप-दीप व नैवेद्य से करें।
फिर योगिनी माला से षोड़श योगिनी मंत्र का 4 माला मंत्र जप करें।
मंत्र
।। ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं व्रं श्रौं घह्न षं दृं क्रीं ह्लीं नृं प्रों यं शं गुं षोड़श योगिन्यै नमः।।
|| Om Aem Hreem Kleem Shreem Vram Shraum Ghahn Sham Dwam Kreem Hleem Nrum Prom Yam Sham Goom Shodash Yoginayae Namah ||
मंत्र जप की समाप्ति पर संभव हो तो साधक साधना कक्ष में ही सोयें, बारहवें दिन पीले वस्त्र सहित यंत्र और माला को नदी में प्रवाहित कर दें।
साधना काल में कम से कम बोलने का प्रयास करें, शुद्ध शाकाहारी अल्प भोजन करना उत्तम होगा, ब्रह्मचर्य का पालन करें, साथ ही साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व षोड़श योगिनी दीक्षा साधक प्राप्त करें, तो वह अतिरिक्त ऊर्जा शक्ति से युक्त हो जाता है, जिससे सफलता के प्रतिशत में वृद्धि होती है।
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