


रोचकता, मौलिकता, उत्साह, तरंग, उमंग यह सब चंद्रमा के कारण ही प्राप्त होती है, सूर्य या अन्य क्रूर ग्रहों के कोप से निवृत्ति भी चंद्रमा की अभ्यर्थना से संभव है। हमारी सृष्टि मैथुनी सृष्टि कहलाती है, जिसका आधार पति-पत्नी, भोग-आनन्द युक्त जीवन की अनुकूलता है। यह अनुकूलता उच्चतम सोपान की स्थिति तक चंद्रमा की अनुकूलता से ही पहुँच पाती है। अतः अनुकूल वर या वधू प्राप्त करने के लिये चंद्रमा की अनुकूलता अनिवार्य है।
यक्षिणियों की गणना देव वर्ग में होती हैं, जिनकी सानिध्यता प्राप्त करने से साधक के भीतर देवमय भावों का जागरण होता है। इनके द्वारा आनन्दप्रद जीवन, प्रचुर मात्रा में धन की उपलब्धता, गृहस्थ जीवन में मधुरता, अन्न भण्डार व आर्थिक आय में स्थायित्व की सुस्थितियों का लाभ प्राप्त होता है। इसके साथ ही साधक में सम्मोहन, वशीकरण, आकर्षण आदि की चेतना व्याप्त होने लगती है, उसके व्यक्तित्व में प्रखरता व दिव्यता का संचार हो जाता है और सभी प्रकार के सुख, भोग-विलास का अधिकारी बन जाता है। सांसारिक जीवन में ऐसी दिव्य चेतना आत्मसात करने से दैवीय स्वरूपिणी यक्षिणी चैतन्य भाव में साधक के जीवन को निरन्तर सभी दृष्टियों से उच्चता प्रदान करने में सहायक बनी रहती है।
अतः चन्द्रग्रहण युक्त होलिका पर्व के विशिष्ट युग्म काल में अपने गृहस्थ जीवन को उक्त सुस्थितियों से परिपूर्ण करने हेतु सद्गुरूदेव जी विशेष मुहूर्त काल में चन्द्रमा की चेतना से युक्त यक्षिणी साधना, पूजा, हवन सम्पन्न कर दिव्यपात दीक्षा प्रदान करेंगे। जिससे आपके जीवन में सहजता से सुमंगलमय स्थितियों का विस्तार हो सकेगा। अतः यह चैतन्य दीक्षा परिवार के सभी सदस्यों को ग्रहण करायें, तब ही सम्पूर्ण परिवार धन, यश, लक्ष्मी वृद्धिमय बन सकेगा।
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