





उपनिषद मनुष्यों के दो विभाजन करते हैं। एक तो वे लोग जो आत्मा का हनन करने वाले हैं। अपनी ही आत्मा के हंता हैं और एक वे लोग जो अपनी ही आत्मा के विज्ञाता हैं, जानने वाले हैं। आत्मज्ञानी और आत्महंता।
ध्यान रहे, आत्महत्या शब्द का हम प्रयोग करते हैं, लेकिन ठीक अर्थो में उपनिषद ने प्रयोग किया है, हम ठीक अर्थो में प्रयोग नहीं करते। अगर कोई आदमी अपने शरीर को मार डाले, तो हम कहते हैं, आत्महत्या की है उसने, आत्महंता है वह, स्यूसाइड किया। ठीक नहीं है यह बात। क्योंकि शरीर को मार डालना आत्मा को मार डालना नहीं है, शरीर की हत्या आत्महत्या नहीं है। स्वयं ने की है, फिर भी स्वयं की नहीं है। वस्त्र का, आवरण का ही बदलाहट है। शरीर-घात है, आत्महत्या नहीं है।
उपनिषद तो उसे आत्महंता कहता है, जो अज्ञान से आच्छादित अपने को बिना जाने ही जी लेता है। वह आदमी अपनी आत्मा की हत्या कर रहा है। अपने को बिना जाने जीना आत्महत्या है।
और हम सब अपने को बिना जाने जीते हैं जरूर, लेकिन यह बिलकुल पता नहीं होता कि हम कौन है, कहां से है, क्यों है, किस लिये है? किस ओर हैं, कहां जाते हैं, क्या प्रयोजन है? क्या अर्थ है इस होने का? नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। हमें अपना कोई भी पता नहीं है।
हमें और बहुत सी बाते शायद पता है। एक बात तो सुनिश्चित पता नहीं है, वह अपना हमें कोई पता नहीं है। हमें उपनिषद कहेगा-हम आत्महंता लोग हैं, असुर हैं। हम अपने को जब तक जानते नहीं, तब तक हम जाने-अनजाने अपने को ही काटते हैं। अज्ञान दूसरे को तो बाद में पीड़ा देता है, पहले तो अपने को ही पीड़ा देता है। ध्यान रहे, अज्ञानी दूसरे पर हमला तो बाद में करता है, पहले तो अपने पर ही हमला करता है। असल में दूसरे पर हमला करना संभव ही नहीं है, जब तक हमने अपने पर हमला न कर लिया हो। और दूसरे को दुःख देना असंभव है, जब तक हमने अपने को दुःख न दे लिया हो। और जिसने अपने पैरों में कांटे न बो दिये हों, वह दूसरे के मार्गो पर कांटे बोने कभी नहीं जाता है। और जिसने अपने लिये आंसुओं की व्यवस्था न की हो, वह कभी दूसरों के दुःखों का इंतजाम नहीं करता है।
असल में सबसे पहले हम अपने लिये पीड़ा बोते हैं और जब पीड़ा इतनी घनीभूत होकर हम पर प्रगट होने लगती है तब हम उसे बांटना शुरू करते हैं। सिर्फ दुःखी लोग ही दूसरों को दुःख देते हैं। ठीक भी है, जो हमारे पास होता है वही हम दे सकते हैं। लेकिन वह नंबर दो की घटना है। नंबर एक की घटना तो अपने को ही पीड़ा देना है।
क्या हम सारे लोग अपने को पीड़ा नहीं देते? देंगे ही। चाहे हम कोशिश करते हो आनंद देने की, लेकिन सफल हो पाते हैं सिर्फ पीड़ा देने में। नरक का रास्ता बहुत शुभकामनाओं से भरा है। और अपने ही नरक का रास्ता अपने ही लिये किये गये शुभकामनाओं के प्रयासो से निर्मित हो जाता है।
असली सवाल नहीं है कि मेरी आकांक्षा क्या है। अपने को हम सभी आनंद चाहते हैं, लेकिन स्वयं को जाने बिना अपने को कोई आनंद दे नहीं सकता। क्योंकि जिसे यही पता नहीं है कि मैं कौन हूं, उसे यह कैसे पता होगा कि मेरा आनंद क्या है! मेरा आनंद क्या हो सकता है, यह तो मुझे तभी पता हो जब मेरा स्वभाव, मेरा स्वरूप, मेरी निजता मुझे पता हो जाये। जब तक मेरी गहरी जड़ों का मुझे कोई पता न हो जाये कि वे क्या हैं, तब तक मैं कैसे तय करूं कि कौन से फूलों के लिये मैं हूं, जो मुझ में लगेंगे। मेरा बीज जब तक पूरा निर्णीत मेरे लिये न हो जाये कि क्या है, तब तक मैं किन फूलों की आकांक्षा करूं?
अगर मुझे मेरे बीज का ही पता नहीं है, तो मैं जो भी बनना चाहूंगा उससे दुःख आयेगा। क्योंकि वह मैं बन नहीं पाऊंगा। और नहीं बन पाऊंगा तो पीड़ा पाऊंगा, संतापग्रस्त हो जाऊंगा, चिंता से भरूंगा, तनाव से भरूंगा। सारी जिंदगी एक दौड़ तो हो जायेगी, पहुंचना नहीं होगा। यात्रा तो बहुत होगी, मंजिल कहीं नहीं होगी। क्योंकि मंजिल मेरे स्वभाव में छिपी है, मेरी निजता में छिपी है।
पहले मुझे पता हो जाना चाहिये, मैं कौन हूं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि जो मैं हूं उसके लिये मैं कोई खोज ही नहीं कर रहा हूं। और जो मैं नहीं हूं उसके लिये मैं खोज कर रहा हूं। वह नहीं मिलेगा तो मैं दुःख पाऊंगा। और मिल जायेगा तो भी मैं दुःख पाऊंगा।
इस जीवन में वे लोग तो दुःखी होते ही हैं जो असफल हो जाते हैं, लेकिन उन लोगों के दुःख का भी कोई अंत नहीं जो सफल हो जाते हैं। असफल आदमी दुःखी हो जाये, समझ में आता है। लेकिन सफल आदमी भी दुःख को ही उपलब्ध होता है। पूछे, सफल लोगों से पूछें। तब तो जिंदगी बड़ी विडंबना मालूम पड़ती है। यहां असफल तो दुःखी होते ही हैं, उनका दुःखी हो जाना तर्कयुक्त मालूम होता है, न्यायसंगत दिखाई पड़ता है। लेकिन जो सफल होते हैं वे भी दुःखी होते हैं। तब तो यह जगत बहुत ही पागलपन मालूम होता है। अगर यहां सफल को भी दुःखी हो जाना है और असफल को भी दुःखी हो जाना है, तो फिर तो सुख का कोई उपाय नहीं है।
असफल लोगों के दुःखी हो जाने में कोई विशेषता नहीं हैं। पूछे सफल लोगों से, पूछें अरबपतियों से, पूछें उन लोगों से, जिन्होंने जो चाह था वह उन्होंने पा लिया है। फिर पूछें कि सुख मिला? तो बड़ी हैरानी की बात मालूम पड़ती है। वे कहते हैं, सफल तो हो गये, लेकिन सफल हुये सिर्फ दुःख पाने में।
असफल जो होते हैं, वे भी कहते हैं, असफल हुये सुख पाने में। दुःख हाथ आया। सफल जो होते हैं, वे कहते हैं, सफल हुये दुःख पाने में। दुःख हाथ आया। जो दौड़कर मंजिल पर पहुंचते हैं, वे भी दुःख में पहुंच जाते हैं। जो कहीं नहीं पहुंचते, भटकते हैं अरण्य में, वे भी दुःख में भटकते हैं। तो फिर मंजिल में और मार्ग में फर्क क्या है? फिर भटकाव में और पहुंचने में अतंर क्या है?
कोई अंतर नहीं मालूम पड़ता है। नहीं मालूम पड़ेगा। क्योंकि जिसने नहीं जाना कि मैं कौन हूं उसकी सफलता भी दुःख लायेगी। वह जिस दिन सफल हो जायेगा उस दिन पायेगा कि जो मकान उसने बनाया वह खुद के रहने के योग्य ही नहीं है। वह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। मकान तो बन गया, धन तो इकट्ठा हो गया, यश-कीर्ति तो अर्जित हो गई, लेकिन प्राणों का कोई हिस्सा उससे भरता नहीं, पूरा नहीं होता। यह तो पहले जान लेना था कि मेरी प्यास क्या है, अभीप्सा क्या है? मैं चाहता क्या हूं? कितनी चाहें हैं हमारी, बिना इस बात को जाने कि सच में मेरी चाह क्या है।
आदमी को उसके पहले यही पता नहीं है कि वह कौन है। मैं कपड़े बनवाने निकल जाऊं, मुझे यही पता नहीं है कि मैं कौन हूं। कपड़े बन जायेंगे। और मैंने कभी, मेरे शरीर का मुझे पता नहीं, मेरे शरीर के नाप का मुझे कोई पता नहीं, मेरे शरीर की जरूरत का मुझे कोई पता नहीं। मुझे मेरा कोई पता नहीं, कपड़े बनवाने निकल जाता हूं। एक दिन कपड़े बन जाते हैं और मैं पाता हूं कि वे मुझ पर नहीं आते। वह कहीं कुछ तालमेल टूटा हुआ मालूम पड़ता है।
कपड़े बनवाने जरूर निकल जाइये, लेकिन पहले उसकी तो जांच-परख कर लें कि वह कौन है जिसके लिये कपड़े है, जिसके लिये मकान है, जिसके लिये सुख खोजना है। जो व्यक्ति इसको जान लेता है कि मैं कौन हूं, उसके सारे जीवन की यात्रा और सारे जीवन की व्यवस्था रूपांतरित हो जाती है। हम जिन चीजों को खोजने जाते हैं उनको वह खोजने जाता ही नहीं। हम जिन चीजों को पाने के लिये श्रम करते हैं उनको पाने के लिये यह वह श्रम क्या अगर कोई हंसी के मूल्य पर भी देने को राजी हो तो हंसने को भी राजी नहीं होगा। अगर कोई मुफ्त में भी देने को राजी हो तो वह उस रास्ते से हट जायेगा कि कहीं इसमें कोई मेरे ऊपर डाल ही न दे। वे कुछ और ही खोजने निकल जाता है। वह कुछ और ही पाने निकल जाता है।
और बड़े मजे की बात है कि स्वयं को जानने वाले लोग कभी असफल नहीं होते। आज तक नहीं हुये। और स्वयं को न जानने वाले लोग कितने ही सफल हो जाये, फिर भी सफल नहीं होते मालूम पड़ते। आज तक नहीं हुये। स्वयं को जानने वाला सफल हो ही जाता है। क्योंकि स्वयं को जानते ही वह उस रहस्य और राज और उस द्वार को खोल लेता है-जहां आनंद है। वह स्वयं में ही कहीं छिपा है।
इसलिये उपनिषद कहते हैं, दो तरह के लोग हैं-आत्म-ज्ञानी, वे जो स्वयं को जान लेते है, और आत्म-अज्ञानी, वे जो स्वयं को नहीं जानते और नहीं जानने में ही दौड़े चले जाते हैं। नहीं जानने में ही कुछ न कुछ किये चले जाते हैं। नहीं जानने से कोई अंतर नहीं पड़ता, उनकी दौड़ और तेज होती चली जाती है।
उपनिषद कहते हैं, दो तरह के लोग हैं। आप ठीक से सोच लेना कि दो में किस तरह के लोग हैं? आप किसी कोटि में है? और ईमानदारी से निर्णय अपने बाबत लेना जरूरी है, तो ही अगला कदम ईमानदारी का उठ सकता है। आत्महंता है कि आत्मज्ञानी है?
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,