





हम अपने मुंह से जो शब्द निकालते हैं, वह वायुमण्डल में गुंजरित रहता है, क्योंकि इस वायुमण्डल से उत्पन्न ध्वनि कभी भी समाप्त नहीं होती। इसीलिये आज वैज्ञानिक इस बात के लिये प्रयत्नशील हैं कि यदि ध्वनि समाप्त नहीं होती, वह शाश्वत रहती है तो श्री कृष्ण और अर्जुन का संवाद तथा वह ध्वनि भी वायुमण्डल में ही गतिशील होगी। यदि ध्वनि की उस वेव को पकड़ा जा सके तो उस संवाद को भी सुना जा सकता है।
इसीलिये जब हम किसी विशेष देवता को प्रसन्न करने के लिये तथा मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिये स्त्रोत पाठ करते हैं तो उस शब्द संयोजन से एक विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है जो इस जगत में स्थित सम्बन्धित देवताओं की भावनाओं को उद्वेलित या आन्दोलित करता है और देवता उस प्रभाव से हमारे अनुकूल हो कर हमें मनोवांछित फल देने में सहायक हो जाते हैं।
तारा साधना के विषय में कहा गया है कि जो साधक जीवन में अतुलनीय उन्नति करना चाहता है उसे अवश्य एक बार यह साधना सम्पन्न करनी चाहिये। बुद्धि, ज्ञान, शक्ति, विजय तथा पूर्णत्व प्राप्त हेतु तथा अकाल मृत्यु एवं दुर्घटना निवारण हेतु यह साधना लक्षित की जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि आकस्मिक धन प्राप्ति एवं अतुलनीय व्यापार वृद्धि हेतु इस साधना से उत्तम दूसरा नहीं।
मुण्डमाला तंत्र में तारिणीशतनाम स्त्रोत है। इसमें तारा के विभिन्न रूपों की चर्चा है। उपासना के प्रसंग में उनकी महिमा का गायन है। साधना सम्पन्न कर इस स्त्रोत का पाठ करें-
स्त्रोत
तारिणी तरला तन्वी तारा तरूण वल्लरी।
तीर रूपा तरश्यामा तनुक्षीण पयोधरा।।
तुरीया तरला तीव्र गमना नीलवाहिनी।
उग्रतारा जया चण्डी श्रीमदेक जटाशिवा।।
तरूणी शम्भवी छिन्नमाला च भद्रतारिणी।
उग्रा चोग्रप्रभा नीला कृष्णा नील सरस्वती।।
द्वितीया शोभिनी नित्य नवीना नित्य नूतना।
चण्डिका विजयाराध्य देवी गगन वाहिनी।।
अटट्हास्या करालास्या चरास्या दितिपूजिता।
सुणा सगुणाराध्यां हरीन्द्र देव पूजिता।।
रक्त प्रिया च रक्ताक्षी रूधिरासवभूषिता।
बलप्रिया बलिरता दुर्गा बलवती बला।।
बलप्रिया बलरता बलराम प्रपूजिता।
अर्द्वकेशेश्वरी केशा केशवेश विभूषिता।।
पद्ममाला च पद्माक्षी कामाख्या गिरिनन्दिता।
दक्षिणा चैव दक्षा च दक्षला दक्षिणेतरा।।
वज्रपुष्प प्रिया रक्तप्रिया कुसुमभूषिता।
माहेश्वरी महादेवप्रिया पद्मविभूषिता।।
इड़ा च पिड़ला चैव सुषुम्ना प्राणरूपिणी।
गांधारी पंचमी पंचानना दि वरि पूजिता।।
इत्येतत् कथितं देवि रहस्यं पदमद्भुतम्।
श्रुत्वा मोक्षमवाप्नोति तारादेव्याः प्रसादतः।।
यः इदं पठति स्त्रोतं तारास्तुति रहस्यकम्।
सर्वसिद्धि युतो भूत्वा विहरेत क्षितिमंडले।।
तस्मैवं मंत्रसिद्धिः स्यान्मम सिद्धिरनुत्तमा।
भवत्येयं महाभागे सत्यं सत्यं न संशय।।
मन्दे मंगलवारे च य: पठेन्निशि संयत:।
तस्मैव मंत्रसिद्धि स्यादगानयत्मं लभेत्तुस:।
श्रद्धयाऽनद्धया वापि पठेन्तारारहस्यकम्।
अचिरनैव कालेन जीवन्मुक्तः शिवो भवेत।।
सहस्त्रावर्तनाद्देवी पुरश्चर्या फलं लभेत्।
एवं सतत युक्ता ये ध्यायन्तस्त्वामुपासते।
ते शिवो भवेत सहस्त्रावर्त्तनाद्देविपुरश्र्याफलं लभेत।
भगवती तारा अपने भक्तों को भवसागर से पार करने वाली है, चंचला, सुन्दर अंगों वाली, यौवन से भरपूर, सब को सहारा देने वाली, अत्यन्त सौम्यमयी, सुन्दर और सुखद सर्वागों से युक्त है। भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
मोक्ष स्वरूपा गतिमयी सर्वत्र गमनशीला नील अंगो वाली, आकाशीय तारा की तरह चमकने वाली, विजय प्रदान करने वाली, क्रोध, स्वरूपा एक वेणी से युक्त कल्याणदायिनी है। भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
भरपूर यौवन से युक्त, शिव स्वरूपों, शत्रुओं के मस्तक को काटने वाली, सुगम मार्ग से भक्तों को पार करने वाली, उग्र स्वभाव वाली, अत्यन्त दीप्त युक्त, नील और कृष्ण रंगों से युक्त होने के कारण नील सरस्वती कही जाती है। हे! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
अत्यन्त शोभामयी, नित्य नवीन, नित्य नये रूप में दर्शन देने वाली, शत्रुओं के लिये भय स्वरूपा विजय देने वाली, वह आकाश मंड़ल में विचरण करने वाली है। हे! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
शत्रुओं के रक्त को पीने वाली, लाल नैत्रों वाली रूधिर मज्जा आदि से लिप्त बलि चाहने वाली, शत्रुओं की बलि देने वाली और दुर्गास्वरूपा बल और अनेक कलाओं से युक्त है। हे! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
कमल पुष्प की माला पहनी हुई, कमल के समान नेत्रों वाली, कामाख्या नाम वाली, पर्वतों पर विचरण करने वाली, साधकों को धन देने वाली, अत्यन्त चतुर भगवती तारा है। है! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
वज्ररूपी पुरूष को चाहने वाली, शत्रुओं के खून से प्यास बुझाने वाली, फुलों से सुशोभित, शिव स्वरूपा भगवान शंकर की प्रिया तथा लक्ष्मी स्वरूपा है। हे! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
इड़ा, पिंगला तथा सुष्मना नाड़ियों को प्राण देने वाली, अष्टगंध से भरपूर पांच स्वरूपों वाली, सिंहों से युक्त भगवती तारा दस महाविद्याओं में अत्यन्त उग्र और तेजस्विनी है। हे! भगवती तारा आपको बारम्बार नमन्।
भवगती तारा के इस रहस्यपूर्ण स्त्रोत को जो सुनता है। सभी सिद्धियों से युक्त होकर पृथ्वी तल पर विचरण करता है। ये श्रेष्ठतम सिद्धियां उसी पुरूष को प्राप्त होती है जिनमें कोई संशय नहीं है। जो साधक शनि और मंगलवार की रात्रि को संयमित होकर स्त्रोत का पाठ करता है उसको शीघ्र ही तारा सिद्धि प्राप्त होती है।
जो भक्तगण श्रद्धा से इस रहस्य स्त्रोत्र का पाठ करता है वह शीघ्र ही जीवन मुक्त शिव स्वरूप हो जाता है। जो साधक इस स्त्रोत का पुरूश्चरण करता है वह शिव स्वरूप को प्राप्त करके जीवन मुक्त हो जाता है।
तारा शक्ति पूजा की परम्परा में सर्वपूज्या है। तारा के शतनाम स्त्रोत में प्रत्येक नाम की व्याख्या के मूल में ऐतिहासिक सन्दर्भ की सत्ता विद्यमान है। तारा शक्ति पूजा की लोकप्रिय देवी हैं इसका पाठ शक्ति साधक को अवश्य ही करना चाहिये।
इस स्त्रोत को सिद्ध करने की विधि अत्यंत सरल है। इसे आप किसी भी मंगलवार अथवा अष्टमी को 11 दिन तक नित्य 5 बार लयपूर्वक पाठ करें।
मां तारा का यह स्त्रोत सभी के लिये आवश्यक है और गृहस्थ व्यक्ति को इसका नियमित पाठ करना ही चाहिये जिसका जीवन परिस्थितियों और दुर्भाग्य के कारण असहाय, दीन, जर्जर बन गया है, जीवन उस समय इस विजय तीव्र तारा स्त्रोत द्वारा संभव हो जाता है।
साथ ही कार्य व्यापार रोजगार धनदा वृद्धि तारा शक्ति माला उन साधकों के लिए उत्तम है जो अत्यंत दरिद्रता से युक्त हैं, तथा जिनका रोजगार, कार्य, व्यापार आदि बहुत मंद चल रहा हो चूकि तारा धन प्रदायक देवी है, अतः अपने साधकों को स्वर्ण प्रदान करती है।
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर साधक कार्य व्यापार रोजगार उन्नति हेतु विशिष्ट मंत्रों से सिद्ध तथा प्राण प्रतिष्ठित कार्य व्यापार रोजगार वृद्धि तारा शक्ति माला को सर्वप्रथम अपने पूजा स्थान पर रख कर उसका पंचोपचार पूजन करें। उसके बाद उपर्युक्त दिये गये तारा शक्ति स्त्रोत का ग्यारह बार पाठ करें। साथ ही साथ महाविद्या भगवती महातारा से अपने कार्य व्यापार तथा रोजगार में अतुलनिय वृद्धि की प्रार्थना करें जिससे भगवती महातारा आपको आपकी इच्छा के अनुकूल वरदान दे सकें। तत्पश्चात साधक उस दिव्य तथा पवित्र माला को प्रतिदिन कम से कम एक घण्टा अवश्य धारण करें।
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